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UP में 84 कोसी परिक्रमा वाले गांव पर कलंक:लोग कहते हैं - इसी गांव से कोरोना फैला ; नाम जानकर भड़क जाते हैं बाराती

4 महीने पहले
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दिसंबर की ठंड भरी शाम थी, खचाखच भरी बस में आलोक त्रिवेदी (49) अपना काम निपटाकर शहर से अपने गांव लौट रहे थे। गांव आया तो बस रुकी… कंडक्टर ने जोर से आवाज लगाई- एक-एक करके कोरौना वाले उतरें। कंडेक्टर की आवाज सुनकर बस में बैठे लोग ऐसे खिलखिलाकर हंसे, मानो कोई चुटकुला सुना दिया गया हो। तभी पीछे से एक और आवाज आई… जल्दी उतरो-जल्दी उतरो, पूरी बस में वायरस फैलाओगे क्या?

ये दास्तान है उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की मिश्रिख तहसील में कोरौना गांव की। यह गांव UP के प्रमुख तीर्थ स्थल नैमिषारण्य धाम के पास है। यह 84 कोसी परिक्रमा का पहला पड़ाव भी है, लेकिन लोग अब इसकी पहचान कोरोना से जोड़कर करते हैं।

उत्तर प्रदेश में सीतापुर का कोरौना गांव अपने नाम को लेकर बेवजह बदनाम हो रहा है।
उत्तर प्रदेश में सीतापुर का कोरौना गांव अपने नाम को लेकर बेवजह बदनाम हो रहा है।

नाम के चलते बेटियों की शादी भी नहीं हो पा रही
कोरौना गांव के रहने वाले आलोक बताते हैं, “ गांव के एक घर में तो शादी का रिश्ता लेकर आए बारातियों ने यह तक कह दिया था कि ये कैसा नाम है … क्या हम ‘कोरोना’ की लड़की घर ले जाएंगे। लोगों को गांव का नाम सुनकर लगता है कि यहां से ही देश में कोरोना फैला है, लेकिन असल में तो यहां पर एक भी आदमी संक्रमित नहीं है।”

लोग फोन कर पूछते हैं, जिंदा हो कि मर गए
सलमान सिद्दीकी (24) लखनऊ में नौकरी करते हैं, लेकिन हैं तो कोरौना के ही रहने वाले। यह बात उनके रिश्तेदार अक्सर उन्हें बातों-बातों में याद दिला देते हैं। हल्का मुस्कुराते हुए वो बताते हैं, 'दूसरों की क्या कहें भइया जी, हमारे रिश्तेदार भी गांव का नाम सुनकर फोन पर कहते हैं कि पहले गांव का नाम बदलो, तब हम तुम्हारे घर आएंगे।’ गांव के ही आनंद दीक्षित (40) ने बताया कि हमारे दोस्त हम से फोन पर अक्सर मजाक में पूछ लेते हैं कि कोरौना वाले भइया, अभी जिंदा हो कि निकल लिए।

कोरौना गांव के लोगों से उनके रिश्तेदार ही मजाक में पूछते हैं कि वे जिंदा हैं या मर गए।
कोरौना गांव के लोगों से उनके रिश्तेदार ही मजाक में पूछते हैं कि वे जिंदा हैं या मर गए।

गांव में एक भी संक्रमित नहीं, दूसरे गांवों से बेहतर सुविधाएं
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सीतापुर जिले में बीते सात दिनों में 7,700 कोविड-19 संक्रमित मामले मिले हैं, लेकिन इनमें कोरौना गांव से एक भी मामला सामने नहीं आया है। गांव में आयुर्वेदिक चिकित्सालय, पक्की सड़क, सरकारी नल, तीन इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज भी है।

सोशल मीडिया पर मजाक बना - चीन बेकार में बदनाम, कोरोना तो यहां है
गांव का रहने वाला दीपक (25) ऑनलाइन काफी एक्टिव है। देश के साथ साथ अमेरिका और अफगानिस्तान में क्या चल रहा है, उसको सबकी खबर रहती है। दीपक ने बताया, 'हमारा घर रोड के किनारे ही है, जहां कोरौना गांव का बोर्ड लगा है। इसे देखकर लोग रुक जाते हैं, मजाक बनाते हैं कि यहीं से कोरोना निकला है, यहां से बचकर निकलना। आसपास के गांव के लड़के इस कोरौना गांव नहीं कोविड के नाम से बुलाने लगे हैं।'

‘कोरौना’ नाम ही ऐसा है कि लोगों को सोशल मीडिया पर मजाक बनाने का मसाला मिल गया है। कई छुटभैया यूट्यूबर्स तो शहर से यहां आकर 'कोरौना' साइनबोर्ड के आगे सेल्फी ले चुके हैं और वीडियो भी बना बना डाला है। कहते हैं... चीन तो बेकार ही में बदनाम है, कोरोना तो यहां है।

देखिए वीडियो-

जिस गांव की परिक्रमा कर दशरथ को राम मिले, उसे झेलनी पड़ रही जिल्लत
कोरौना गांव यूपी के प्रमुख तीर्थ स्थल नैमिषारण्य धाम के पास है। यह 84 कोसी परिक्रमा का पहला पड़ाव भी है। ऐसा माना जाता है कि राजा दशरथ ने देवताओं से पुत्र प्राप्ति के लिए अयोध्या से लगभग 20 किमी की यात्रा कर मनोरमा नदी के किनारे पुत्रयष्ठी यज्ञ किया था। इसके बाद उन्हें तीन पत्नियों से चार पुत्र मिले थे। इस यात्रा को अब 84 कोसी परिक्रमा के नाम से जाना जाता है।

‘कोरौना’ नाम की वजह 150 साल पुरानी
श्रीकृष्ण त्रिवेदी (86) का परिवार 90 साल से कोरौना में रह रहा है। उनके बुजुर्ग बताते थे कि इस गांव को 150 साल पहले ‘कारंडव वन’ के नाम से जाना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, इसका नाम बदल कर कोरौना रख दिया गया। कोरौना गांव में भगवान श्री कृष्ण ने भी प्रवास किया था, जब वे अपने गुरू महर्षि गर्ग से मिलने आए थे। इसी वजह से गांव में द्वारकाधीश का प्राचीन मंदिर भी है।

हम तो कोरौना गांव के लोगों से बस यही कहना चाहते हैं कि कोरौना को लेकर हो रहे मजाक पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है , क्योंकि … कुछ तो लोग कहेंगे …लोगों का काम है कहना। और वैसे भी यह नाम ही तो है, जो उनके गांव को चर्चा में ला रहा है।

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