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राजनीति के किरदार और किस्से-30:इमरजेंसी के वक्त संजय गांधी ने मीडिया संस्थानों की बिजली कटवा दी, लोगों को घेरकर नसबंदी करवाई गई

उत्तर प्रदेश3 महीने पहलेलेखक: राजेश साहू
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संजय गांधी की कल यानी 23 जून को पुण्यतिथि है। हम उनसे जुड़ी तीन कहानियां लेकर आएंगे। कल आपने उनकी लव स्टोरी पढ़ी। आज इमरजेंसी में उनकी भूमिका पढ़ेंगे। इंदिरा गांधी को इस्तीफा देने से उन्होंने ही रोका था। बड़े नेताओं के साथ राजघराने की महारानियों को जेल में डाला था। नसबंदी के कानून को सख्ती से लागू किया था।

संजय की इस कहानी में हम पहले इमरजेंसी की बात करेंगे। फिर उनके सख्त फैसलों और नसबंदी कानून की बात करेंगे। संजय से जुड़ी पहली कहानी आप यहां पढ़ सकते हैं।

संजय गांधी और मेनका की लव स्टोरी: इंदिरा नहीं चाहती थीं कि दूसरा बेटा भी विदेशी बहू लाए

कोर्ट ने इंदिरा का चुनाव रद्द कर दिया
12 जून 1975, पीएम इंदिरा गांधी अपने सलाहकार डीपी धर की मौत के बाद उनके परिवार को सांत्वना देकर ऑफिस लौटी थीं। दोपहर तीन बजे राजीव गांधी एक कागज लेकर इंदिरा के पास पहुंचे और बताया कि आपका 1971 के चुनाव में प्रतिबंधित साधनों का प्रयोग करने का दोषी पाते हुए चुनाव रद्द कर दिया गया है। इंदिरा ने एक लंबी सांस ली, लेकिन कुछ बोला नहीं।

इंदिरा ने 1971 के चुनाव में सरकारी संसाधनों का प्रयोग किया था। जिसके कारण केस दर्ज हुआ था।
इंदिरा ने 1971 के चुनाव में सरकारी संसाधनों का प्रयोग किया था। जिसके कारण केस दर्ज हुआ था।

इंदिरा ने इस्तीफा देने का मन बनाया तो संजय ने रोक दिया
कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा का पीएम पद छोड़ना तय था। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और कानून मंत्री एचआर गोखले घर पहुंच गए। कुछ देर बाद ही कृषि मंत्री जगजीवन राम, पार्टी अध्यक्ष देवकांत बरूआ, उमाशंकर दीक्षित भी पहुंच गए। इंदिरा ने चेहरे पर गहरी थकान के साथ कहा, "मुझे इस्तीफा देना होगा।" सिद्धार्थ शंकर रे ने कहा, "एक बार विचार कर लें।"

द रेड साड़ी में स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो लिखते हैं, "इंदिरा इस्तीफा देना चाहती थीं, लेकिन तभी संजय पहुंचे और उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। यदि इंदिरा ऐसा करती तो संजय के बड़ा आदमी बनने के सारे सपने बिखर जाते। मां को दूसरे कमरे में लगे गए और कहा, ''अगर आप इस्तीफा देंगी तो विपक्ष आपको किसी न किसी बहाने आपको जेल में डाल देगा। इंदिरा को संजय की बात ठीक लगी।"

पूरे देश में इंदिरा के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गया
जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश में प्रदर्शन शुरू हो गया। दूसरी तरफ संजय और पीएम के सचिव आरके धवन ने डीटीसी बसों से लोगों को बुलाकर इंदिरा के समर्थन में रैलियां की। जेपी भारी पड़ रहे थे। 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की रैली होनी थी, जिसे लेकर इंटेलिजेंस ब्यूरो को विद्रोह के इनपुट मिल चुके थे। उन्होंने सिद्धार्थ शंकर रे से बात करने के बाद इमरजेंसी का ऐलान कर दिया।

जेपी के नेतृत्व में आंदोलन बड़ा होता गया तो गिरफ्तारियां शुरू हो गई।
जेपी के नेतृत्व में आंदोलन बड़ा होता गया तो गिरफ्तारियां शुरू हो गई।

जिसने भी विरोध किया जेल में डाल दिया गया
संजय जहां इमरजेंसी के पक्ष में थे, वहीं राजीव इसके खिलाफ थे। उन्हें लगता था कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों को मानना नेहरू खानदान की परंपरा रही है। दूसरी तरफ संजय इससे इत्तेफाक नहीं रखते थे। उन्होंने मुख्यमंत्रियों को उन लोगों की लिस्ट सौंप दी, जो विरोध कर रहे थे। विपक्षी नेताओं को चुन-चुनकर गिरफ्तार किया गया और जेल में डाला गया। राजीव ने जब यह बात मां को बताई, तब भी उन पर कोई विशेष असर नहीं पड़ा।

संजय ने मीडिया की बिजली आपूर्ति रोक दी
देश के अखबार इंदिरा के खिलाफ खबर न चलाएं, इसलिए देश के सभी अखबारों की बिजली आपूर्ति को रोक दिया गया। संजय ने कोर्ट को बंद करने के लिए जरूरी कदम उठा लिए। मीडिया और कोर्ट पर बंदिश को लेकर बंगाल के सीएम सिद्धार्थ रे संजय से सहमत नहीं थे। उन्होंने इंदिरा से यह बात बताई तो संजय और रे के बीच बहस हो गई। संजय ने कह दिया, ''आपको क्या पता कि देश कैसे चलता है।''

26 जून 1975 को सूचना मंत्री आई.के गुजराल कार्यालय पहुंचे तो संजय ने कहा, "सभी न्यूज बुलेटिन प्रसारित होने से पहले उन्हें दिखाए जाएं।" गुजराल ने कहा, "यह संभव नहीं।" इतने में इंदिरा भी आ गईं। पूछा, "क्या चल रहा है?" तब गुजराल ने पूरे मामले पर सफाई दी। इंदिरा ने कहा, "मैं आपकी स्थिति समझती हूं। आप एक क्लर्क से रोज सुबह बुलेटिन भेज दिया करें, ताकि मैं उन्हें देख सकूं।" गुजराल ने इस्तीफा दे दिया।

संजय गांधी ने सख्त आदेश दिया था कि सभी बुलेटिन चेक होकर ही जाएंगे, इंदिरा की भी सहमति थीं।
संजय गांधी ने सख्त आदेश दिया था कि सभी बुलेटिन चेक होकर ही जाएंगे, इंदिरा की भी सहमति थीं।

राजघराने की महारानियों को बंदी बना लिया गया
जेवियर मोरो लिखते हैं, "देश में जिसने भी इंदिरा गांधी का विरोध किया, उसे गिरफ्तार कर लिया गया। जयपुर और ग्वालियर की राजमाताओं को भी नहीं छोड़ा गया, क्योंकि इन्होंने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इन दोनों महारानियों को तिहाड़ जेल में अपराधियों और वैश्याओं के साथ रखा गया। जयपुर की राजमाता गायत्री देवी की कोठरी से बदबू आती थी। जेल में भारी शोर रहता था।"

जबरन नसबंदी पर जोर
मोरो लिखते हैं, "संजय गांधी ने बढ़ती जनसंख्या को ही देश की समस्या की वजह माना। उसके पहले परिवार नियोजन को लेकर कंडोम की उपयोगिता बताई गई, लेकिन इसका असर नहीं पड़ा। उन्होंने मुख्यमंत्रियों को आदेश दिया कि सख्ती के साथ नसबंदी करवाई जाए। हरियाणा में उस वक्त के मुख्यमंत्री बनारसी दास गुप्ता ने तीन हफ्ते में ही 60 हजार नसबंदी ऑपरेशन करवा दिया। दूसरे राज्यों पर प्रेशर बढ़ा तो उन्होंने अधिकारियों को टारगेट दे दिया।"

120 रुपए का लालच देकर नसबंदी करते थे
उस वक्त सरकार की तरफ से नसबंदी करवाने वालों के लिए तीन ऑप्शन थे। वह 120 रुपया ले सकते हैं। एक टीन खाद्य तेल ले सकते हैं या फिर एक रेडियो ले सकते हैं। इन सभी ऑप्शन के बीच हल्ला मची कि नसबंदी करवाते ही इंसान नपुंसक हो जाएगा। लोग सरकारी अस्पतालों से बचकर भागने लगे। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों पर दबाव था, जब तक कोटा नहीं पूरा होगा सैलरी नहीं मिलेगी।

संजय गांधी जनसंख्या को हर समस्या की जड़ मानते थे, इसलिए उन्होंने नसबंदी के नियम पर सख्ती दिखाई।
संजय गांधी जनसंख्या को हर समस्या की जड़ मानते थे, इसलिए उन्होंने नसबंदी के नियम पर सख्ती दिखाई।

डॉक्टर प्रशासन के साथ गरीब गांवों को चिन्हित करते और वहां घेरकर लोगों की नसबंदी कर देते। राजीव उसी वक्त भोपाल से दिल्ली लौटे थे, उन्होंने इंदिरा से बताया कि भोपाल में मुस्लिम वर्ग भयभीत है। अगर इसे रोका नहीं गया तो सांप्रदायिक दंगे हो सकते हैं। इंदिरा ने उनकी बातों को अनसुना कर दिया।

एक युवक रोते हुए आया और कानून बदल गया
एक व्यक्ति जो पेशे से अध्यापक था। पांच दिन की पैदल यात्रा के बाद इंदिरा गांधी के दिल्ली कार्यालय पर पहुंचा। उस व्यक्ति ने इंदिरा से कहा, "नसबंदी करवाने के लिए मेरे साथ प्रशासन ने सख्ती दिखाई। पुलिस ने मुक्कों से मारा, मैं बताता रहा कि मुझे सिर्फ एक बेटी है लेकिन वह नहीं माने और मेरी जबरन नसबंदी कर दी।" उस युवक ने आगे बताया कि गांव में पुलिस रात को ग्रामीणों को घेरती है और उसे नसबंदी के लिए उठा ले जाती है। इतना कहने के बाद वह युवक रोने लगा।

इंदिरा पहली बार आहत हो गईं। उनके ही सामने सिस्टम की मार झेल चुका व्यक्ति रोते हुए खड़ा था। इंदिरा ने आदेश दिया, ''अगर कोई सरकारी कर्मचारी परिवार नियोजन के लिए लोगों के साथ सख्ती से पेश नहीं आएगा।'' जिस वक्त वह यह आदेश दे रही थी उस वक्त संजय गांधी घर पर नहीं थे।

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