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किसानों के लठैत राकेश टिकैत:किसानों की आवाज को बुलंद करते हुए 11 साल में 44 बार जेल गए, पुलिस की नौकरी छोड़कर पिता की विरासत को संभाला

लखनऊएक महीने पहलेलेखक: रक्षा सिंह
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राकेश टिकैत, वो नेता जिसके पिता महेंद्र टिकैत ने 1 मार्च 1987 को BKU यानी भारतीय किसान यूनियन की स्थापना की। इसका मकसद था किसानों के हक के लिए आवाज उठाना। महेंद्र की मौत के बाद उनके बड़े बेटे नरेश को BKU का अध्यक्ष और राकेश को राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया। लेकिन सारे अहम फैसले राकेश ही लेते थे।

11 सालों से राकेश किसानों के हक के लिए लड़ाई लड़ते आ रहे हैं। कुल 44 बार जेल भी गए। चलिए राकेश की जिंदगी के अलग-अलग पहलुओं को शुरू से देखते हैं। ये भी जानेंगे कि ऐसा क्या हुआ कि किसान नेता ही राकेश के विरोध में आ गए।

साल 1969 से 1988: MA किया फिर LLB, उसके बाद दिल्ली पुलिस में भर्ती हो गए
4 जून 1969. राकेश का जन्म मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव में हुआ। उन्होंने मेरठ यूनिवर्सिटी से MA की पढ़ाई की। फिर LLB किया। साल 1985 में 2 बड़ी चीजें हुईं। एक तरफ राकेश टिकैत दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर भर्ती हो गए। दूसरी तरफ यूपी में एक बड़ा आंदोलन जन्म ले रहा था, जिसे बाद में दिल्ली तक पहुंचना था।

3 साल गुजर गए। अपने आंदोलन को लेकर अक्टूबर 1988 में राकेश के पिता महेंद्र सिंह टिकैत BKU समर्थकों और यूपी के 5 लाख किसानों के साथ दिल्ली पहुंच गए। मुद्दा था किसानों के बकाए का भुगतान और गन्ने की फसल के लिए बेहतर पेमेंट की मांग का।

तस्वीर में राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत।
तस्वीर में राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत।

साल 1988 से 2011: राकेश पर पिता महेंद्र के आंदोलन को रोकने का दबाव बना तो नौकरी ही छोड़ दी
एक हफ्ते तक दिल्ली में लाखों किसानों ने आंदोलन किया। विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक किसानों का कब्जा था। दिल्ली किसानों की ट्रैक्टर-ट्रॉली और बैलगाड़ियों से भर गई। दिल्ली पुलिस ने धारा 144 लगा दी। बदले में किसानों ने धारा 288 लगा दी, जिसमें पुलिस आंदोलन कर रहे किसानों के पास नहीं आ सकती।

पुलिस को पता था उनके यहां काम करने वाले राकेश के पिता ही इस आंदोलन को लीड कर रहे हैं। राकेश पर अपने पिता से कहकर इस आंदोलन को खत्म करने का दबाव बनाया गया। राकेश आंदोलन की जगह पहुंचे भी। पर आंदोलन खत्म कराने नहीं उसमें शामिल होने। उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और किसानों के साथ खड़े हो गए।

साल 2011 से 2020: राकेश टिकैत की किसान राजनीति की शुरुआत हुई
यहीं से राकेश भी किसान राजनीति का हिस्सा बन गए। 22 सालों तक वो अपने पिता महेंद्र के साथ मिलकर आंदोलन करते और किसानों के हक के लिए लड़ने लगे।

महेंद्र टिकैत को कैंसर हुआ। साल 2011 में उनकी मौत हो गई। अब BKU को नए उत्तराधिकारी की जरूरत थी। राकेश को ही इसका वारिस माना जाने लगा। लेकिन BKU का नियम था कि बड़े बेटे को ही उत्तराधिकारी बनाया जाता है। इस नाते अध्यक्ष की पगड़ी नरेश टिकैत के सिर पर रखी गई और राकेश राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाए गए। लेकिन इसके बाद भी सभी जरूरी फैसले राकेश ही लेते रहे।

तस्वीर में नरेश टिकैत के साथ राकेश टिकैत।
तस्वीर में नरेश टिकैत के साथ राकेश टिकैत।

दो बार चुनाव लड़ा, दोनों में जमानत जब्त हो गई
राकेश टिकैत दो बार राजनीति में भी उतर चुके हैं। पहली बार साल 2007 में। यूपी विधानसभा चुनाव थे। मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से टिकैत ने पर्चा भरा। निर्दलीय सीट थी। चुनाव लड़ा। लेकिन जमानत जब्त हो गई। टिकैत चुनाव हार गए। दूसरी बार साल 2014 में लोकसभा चुनाव थे। अमरोहा जनपद से पर्चा भरा। राष्ट्रीय लोक दल पार्टी से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। दोबारा जमानत जब्त हो गई। सिर्फ 9 हजार वोट मिले।

किसानों के लिए 44 बार जेल जा चुके हैं राकेश टिकैत
किसानों की लड़ाई के चलते राकेश टिकैत 44 बार जेल जा चुके हैं। मध्य प्रदेश में एक समय किसान के भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ उनको 39 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। इसके बाद दिल्ली में संसद भवन के बाहर किसानों के गन्ना मूल्य बढ़ाने के लिए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया, गन्ना जला दिया था। इसकी वजह से उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। राजस्थान में भी किसानों के लिए सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था, जिसके बाद उन्हें जयपुर जेल में जाना पड़ा था।

साल 2021 से अबतक: जब राकेश टिकैत के आंसुओं ने रातों-रात हजारों किसानों की भीड़ जुटा दी

किसान आंदोलन में फूट-फूटकर रोए थे राकेश टिकैत।
किसान आंदोलन में फूट-फूटकर रोए थे राकेश टिकैत।

दिन था 28 जनवरी 2021. दिल्ली-यूपी को जोड़ने वाला गाजीपुर बॉर्डर। राकेश टिकैत की अगुवाई में किसान आंदोलन चल रहा था। मांग थी तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की। दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन को 31 दिन हो चुके थे। शाम ढलते ही आंदोलन की जगह बड़ी संख्या में लाठियों, डंडों से लैस पुलिस जुटने लगी। खबरें आईं कि रात में बॉर्डर पर कुछ भी हो सकता है। क्योंकि पूरा आंदोलन राकेश ही लीड कर रहे थे इसलिए उनकी गिरफ्तारी की भी चर्चाएं थीं।

पुलिस चाहती थी किसानों का ये धरना खत्म हो और टिकैत आत्मसमर्पण कर लें। लेकिन यहां से स्टोरी में एक बड़ा ट्विस्ट आ गया। राकेश आंदोलन में बने मंच पर चढ़े। सबको लगा आत्मसमर्पण करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वो बोले, “आत्मसमर्पण नहीं करूंगा, पुलिस चाहे तो गिरफ्तार कर ले।”

थोड़ी देर बाद राकेश फूट-फूटकर रो रहे थे। उन्होंने कहा मैं आत्महत्या कर लूंगा पर ये आंदोलन खत्म नहीं होगा। उनके रोने से पुलिस को पीछे हटना पड़ा। राकेश टिकैत के आंसुओं के अगले दिन ही उनके गांव सिसौली में भीड़ जुट गई। महापंचायत बुलाई गई। ट्रैक्टर भर-भरकर किसान गाजीपुर बॉर्डर पहुंच गए। टिकैत की एक रुलाई के बाद पुलिस की पूरी प्लानिंग गड़बड़ा गई।

पिता की बनाई BKU से बेटे राकेश और नरेश को निकाल दिया गया
साल 2022 आया। यूपी विधानसभा चुनाव होने वाले थे। जो मुद्दा कृषि कानूनों का था वो अब बीजेपी का विरोध करने का बनने लगा। विधानसभा चुनाव में BKU की तरफ से बीजेपी को वोट ना देने की बातें की गई। इन्हीं सब चीजों को लेकर किसान नेता नाराज हो गए कि यह संगठन अब किसानों के मुद्दों को छोड़कर राजनीति की तरफ जा रहा है। संगठन में फूट पड़ गई। इसलिए 15 मई 2022 को BKU दो हिस्सों में बंट गई। BKU अराजनैतिक के नाम से नया संगठन बना, जिसके राजेश सिंह चौहान राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए।

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