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राजनीति के किरदार और किस्से- 10:3 रुपए की किताब से आइडिया लेकर इलाहाबाद में होटल खोलने वाले थे चंद्रशेखर, फैसला बदलकर लेखक बनने पहुंचे पर शर्त से पीछे हट गए

एक महीने पहलेलेखक: राजेश साहू
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर देश की राजनीति के सबसे अनोखे राजनेता थे। हमेशा अपने मन की ही उन्होंने की। छात्र राजनीति से संघर्ष शुरू हुआ और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जाकर खत्म हुआ। यूनिवर्सिटी के दौर में चंद्रशेखर का विजन तो क्लीयर था लेकिन वह पैसों की कमी से जूझते रहे। कभी होटल खोलना चाहा तो कभी पैसे कमाने के लिए लेखक बनना चाहा। हालांकि, बन नहीं सके।

राजनीति के किरदार और किस्से की सीरीज में आज से पूर्व पीएम चंद्रशेखर की बात होगी। जब वह होटल खोलने और लेखक बनने निकले थे।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आए लेकिन दोस्ती के कारण वापस चले गए
21 साल की उम्र में चंद्रशेखर बलिया के इब्राहिम पट्टी गांव से 1948 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ने इलाहाबाद आए। अब इस शहर का नाम प्रयागराज हो गया है। चंद्रशेखर जब बलिया से यहां आ रहे थे, तभी बलिया में सतीश चंद्र कॉलेज खुल गया। इनके दोस्त गौरीशंकर राय ने वहीं बीए में एडमिशन ले लिया। गौरीशंकर ने चंद्रशेखर से कहा, राजनीति में पूरा हिस्सा लेना है तो बलिया वापस आ जाओ। चंद्रशेखर को बात सही लगी और वह वापस चले गए।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एम.ए की पढ़ाई के साथ चंद्रशेखर ने राजनीति शुरू की। कुछ दिन बाद ही वह पढ़ाई छोड़कर पूरा वक्त राजनीति में देने लगे थे।
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एम.ए की पढ़ाई के साथ चंद्रशेखर ने राजनीति शुरू की। कुछ दिन बाद ही वह पढ़ाई छोड़कर पूरा वक्त राजनीति में देने लगे थे।

वापस पढ़ने आए पर नेता बन गए
रामबहादुर राय की किताब "रहबरी के सवाल" में चंद्रशेखर बताते हैं, 1951 में राजनीति शास्त्र से एमए करने फिर से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी पहुंचा। हिन्दू हॉस्टल को ठिकाना बनाया। शुरु में थोड़ी बहुत दिक्कत हुई लेकिन जल्द ही वहां के माहौल में रम गया। इसी साल मैं सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गया और समाजवाद के लिए काम करने लगा।

होटल की कमाई देखकर प्रभावित हुए और किताब खरीद ली
चंद्रशेखर का मन पढ़ाई में नहीं लगा। उन्होंने तय किया कि अब फुल टाइम पॉलिटिक्स करनी है। पॉलिटिक्स के लिए पैसे भी चाहिए थे इसलिए उन्होंने होटल खोलने का मन बनाया। होटल खोलने का मन उन्हें बलिया के ही विश्वनाथ तिवारी को देखकर आया था। विश्वनाथ जिला बोर्ड में क्लर्क थे। सिविल लाइंस इलाके में होटल खोल रखा था। आंदोलनकारी नेताओं की वजह से बढ़िया चलता था।

10 लाख होते तो होटल खोल लेते
चंद्रशेखर हिन्दू हॉस्टल से निकले और कटरा मार्केट टहल रहे थे तभी उन्हें सड़क किनारे केन पार्कर की लिखी "हाउ टु रन ए स्माल होटल" किताब दिखी। कीमत तीन रुपए थी इसलिए चंद्रशेखर ने उसे खरीद लिया। हॉस्टल पहुंचे और पढ़ना शुरू किया। चंद्रशेखर बताते हैं कि, किताब बहुत दिलचस्प थी। हालांकि, पढ़ने के बाद पता चला कि छोटा होटल खोलने के लिए 1 मिलियन डॉलर चाहिए। उस वक्त यह 10 लाख रुपए के बराबर थी। इतने पैसे नहीं थे इसलिए होटल खोलने का इरादा छोड़ दिया।

1951 में इसी हिन्दू हॉस्टल में रहने के लिए चंद्रशेखर बलिया से आए। लंबे वक्त तक इसी हॉस्टल में रहकर राजनीति की।
1951 में इसी हिन्दू हॉस्टल में रहने के लिए चंद्रशेखर बलिया से आए। लंबे वक्त तक इसी हॉस्टल में रहकर राजनीति की।

होटल खोलने का इरादा छोड़ा तो लेखक बनना तय किया
चंद्रशेखर रुकने वाले नेताओं में नहीं आते थे। होटल खोलने का इरादा छोड़ा तो तुरंत ही लेखक बनने का फैसला कर लिया। उस वक्त इलाहाबाद में गोरखनाथ चौबे नाम के लेखक हुआ करते थे। नई किताबों के अलावा अंग्रेजी किताबों का अनुवाद भी करते थे। चंद्रशेखर उनके घर पहुंचे और मन में चल रहे लेखक के ख्वाब को बता दिया। गोरखनाथ ने कागज पर एक विषय लिखा और चंद्रशेखकर को थमाते हुए बोले, "इस विषय पर लिखो और कल लेकर आना।"

किताब आप लिखिए लेकिन नाम मेरा रहेगा सुनकर चौंक गए चंद्रशेखर
चंद्रशेखर अगले दिन गोरखनाथ के दिए टास्क को पूरा करके उनके पास पहुंच गए। गोरखनाथ ने पढ़ा तो बहुत खुश हुए। उन्होंने चंद्रशेखर से कहा, "आप किताब लिखिए।" किताब लिखने के लिए उन्होंने चंद्रशेखर को विषय भी दे दिया। चंद्रशेखर वहां से निकलने लगे तभी गोरखनाथ ने कहा, “देखिए, किताब तो लिखेंगे आप। इसके लिए मैं पैसा भी दूंगा लेकिन वह किताब छपेगी मेरे नाम से।” चंद्रशेखर चौंक गए। बिना कुछ बोले वह हॉस्टल पहुंच गए।

चंद्रशेखर कहते हैं, "यह कितना अजीब है। समाजवादी समाज बनाने के संघर्ष के लिए नौकरी नहीं कर रहा हूं। शोषण रोकने की बात कर रहा हूं। लेकिन यहां तो मेरा ही शोषण शुरू हो गया। इसलिए मैने लेखक बनने का इरादा भी छोड़ दिया।"

आर्थिक संकट ने घेरा तो मेस वाले ने संभाल लिया
चंद्रशेखर फुल टाइम लीडर बन चुके थे। लेकिन खर्च के लिए पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया। आर्थिक संकट गहरा गया। बाहर का खाना खा-खाकर परेशान हो गए। तभी बस्ती जिले के पृथ्वीराज मिल गए। पृथ्वीराज हिन्दू हॉस्टल में ही मेस चलाते थे। चंद्रशेखर बताते हैं कि वह बड़े ही प्यार से हम लोगों को खाना खिलाते थे। दाल में घी डाल देते तो आरएसएस वाले इसका विरोध करते थे। पृथ्वीराज पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

चंद्रशेखर से मेस वाले पृथ्वी राज इसलिए खुश रहते थे क्योंकि चंद्रशेखर से जितना पैसा मांगा जाता था वह दे देते थे।
चंद्रशेखर से मेस वाले पृथ्वी राज इसलिए खुश रहते थे क्योंकि चंद्रशेखर से जितना पैसा मांगा जाता था वह दे देते थे।

पृथ्वीराज से पूछा गया ऐसा क्यों करते हैं तब उन्होंने जवाब दिया, "इतने दिन से एक ही तो बाबू साहब मिले जिनको जो भी बिल मैने दिया उसको लेकर कोई सवाल नहीं किया। जितना मांगता हूं वे उतना ही पैसा दे देते हैं। इसलिए इनके लिए मेरे मन में बहुत इज्जत है।" उस वक्त मेस का चार्ज 25 रुपए महीने का लगता था।

होटल खोलने, लेखक बनने और आर्थिक संकट से घिर जाने के अलावा भी चंद्रशेखर से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं जो रोमांचित करते हैं। अगले एक हफ्ते हम रोज चंद्रशेखर से जुड़ी कहानी लेकर आएंगे।

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