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राजनीति के किरदार और किस्से- 13:चंद्रशेखर कहते थे- मैंने प्रधानमंत्री रहते कमीशनखोरी रोकने के लिए कुछ नहीं किया, रक्षा समझौतों में कमीशन लेना नियम है

एक महीने पहलेलेखक: राजेश साहू
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बात 11 नवम्बर 1990 की है। जिस कांग्रेस पार्टी के खिलाफ 1 साल पहले चंद्रशेखर ने चुनाव लड़ा था, उसी के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अगले चार महीने बाद ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। चंद्रशेखर ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा वापस लेने की मांग हुई तो चंद्रशेखर ने कहा था, 'मैं राजीव गांधी नहीं हूं जो एक दिन में तीन बार फैसला बदल लूं।'

इस खबर में पोल भी है, आगे बढ़ने से पहले सवाल का जवाब देते चलिए।

राजनीति के किरदार और किस्से सीरीज की 13वीं कहानी में चंद्रशेखर की बेबाकी के तीन किस्से बताएंगे। जिन्होंने सबको हैरान कर दिया था। आइए एक-एक करके जानते हैं।

किस्सा 1: वित्त सचिव ने कहा कि अर्थव्यवस्था खराब है तो PM ने उसे पद से हटा दिया
11 नवंबर को प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर ने 13 नवंबर को अर्थव्यवस्था को लेकर वित्त विभाग के अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई। उस वक्त के वित्त सचिव बिमल जालान ने एक पेज का नोट चंद्रशेखर को थमाया। जिसमें लिखा था कि देश की अर्थव्यवस्था के हालात इतने खराब हो गए हैं कि हम कुछ भी नहीं कर सकते। वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर निर्भर रहना पड़ेगा।

बिमल जालान को पहले पद से हटाया, लेकिन जब उनका पक्ष सुना तो चंद्रशेखर ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया।
बिमल जालान को पहले पद से हटाया, लेकिन जब उनका पक्ष सुना तो चंद्रशेखर ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया।

चंद्रशेखर ने पेज पढ़ने के बाद कहा, "इस नोट को पढ़ने के बाद आपके वित्त सचिव की कुर्सी पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। यह स्थिति एक दिन में नहीं पैदा हुई। महीनों में बनी होगी। पिछले दिनों आपने क्या काम किया?" PM के सवाल का विमल जालान के पास कोई जवाब नहीं था। चंद्रशेखर ने वित्त सचिव को अगले दिन पद से बर्खास्त कर दिया।

स्थिति ऐसी बनी की वित्त सचिव को राज्यमंत्री बना दिया
पद से हटाए गए बिमल जालान ने PM से मिलकर अपना पक्ष रखने का वक्त मांगा। अगले दिन वह PM के सामने पहुंचे। चंद्रशेखर अपनी आत्मकथा 'जीवन जैसा जिया' में लिखते हैं, "बिमल उस दिन अपना पक्ष नहीं रख पाए थे। उस दिन जब आए तो पूरा कागज लेकर आए और बताया कि पुराने PM और मंत्रियों से भी अर्थव्यवस्था को लेकर बात की थी।"

चंद्रशेखर ने सारा कागज देखने और पूरी बात सुनने के बाद बिमल को हिदायत दी कि आगे से आप पूरी बात रखेंगे। आपका जो भी फर्ज है उसे ईमानदारी से करिए। यह अर्थव्यवस्था का सवाल व्यक्तिगत नहीं है देश का सवाल है। कुछ दिन बाद ही बिमल जालान को चंद्रशेखर ने राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया।

किस्सा 2: चंद्रशेखर ने कहा- मैंने कमीशनखोरी रोकने का कोई प्रयास नहीं किया
चंद्रशेखर ने रहबरी के सवाल किताब में राम बहादुर राय के सवालों का जवाब देते हुए कहा, "झूठ बोलने की मेरी आदत नहीं, मैं यह बात मानता हूं कि मैंने कमीशनखोरी पर रोक लगाने का कोई प्रयास नहीं किया था।" उन्होंने आगे कहा, "एक बार राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण भाषण दे रहे थे। मैं वहीं मौजूद था। मैंने कमीशन में मिलने वाले पैसे के जरिए एक नेशनल रिकंस्ट्रक्शन फंड बनाने का प्रस्ताव रखा था, ताकि कमीशन के पैसों को कानूनी रूप दिया जा सके।"

कमीशनखोरी की जांच संसद का नहीं, जांच एजेंसियों का काम है
चंद्रशेखर का मानना था कि कमीशनखोरी या भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में संसद का काम नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों का काम है। बोफोर्स मामले पर पत्रकारों ने चंद्रशेखर से सवाल पूछा तब उन्होंने कहा, "दिस इज ए पुलिस सब-इंस्पेक्टर्स जॉब, प्राइम मिनिस्टर हेज नथिंग टू डू विथ इट।" मतलब यह पुलिस के लेवल की बात है इसका प्रधानमंत्री से कोई मतलब नहीं। चंद्रशेखर के इस बयान से बवाल मच गया था।

किस्सा 3: रक्षा सौदे में तो कमीशन लेना सरकार का नियम बन गया है
चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे उस वक्त बोफोर्स का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में था, लेकिन तब चंद्रशेखर इस पर टिप्पणी करने से बचते थे। सत्ता से हटने के बाद उन्होंने कहा, रक्षा सौंदो में कमीशन लिया जाता है और दिया जाता है। सिर्फ भारत नहीं बल्कि दुनिया के सभी देशों में ऐसी प्रथा कायम है। भारत में यह प्रथा 1947 से चली आ रही है।

चंद्रशेखर कहते हैं, "यह कमीशन कौन लेता है, कितना लेता है, हजारों करोड़ रुपए की राशि कहां जाती है। इसका कोई भी आधिकारिक लेखा-जोखा नहीं रखा जाता। इस प्रथा को इसलिए भी समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि दुनिया की सभी बड़ी रक्षा कंपनियां और सरकारों ने वैधता प्रदान कर रखी है। इसलिए किसने कितना कमीशन खाया इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं।"

चंद्रशेखर PM बने तो बोफोर्स के बारे में जो भी सवाल पूछा जाता, उसका जवाब देने से वह बचने लगे थे।
चंद्रशेखर PM बने तो बोफोर्स के बारे में जो भी सवाल पूछा जाता, उसका जवाब देने से वह बचने लगे थे।

चंद्रशेखर आखिर में कहते हैं, "मेरे कार्यकाल में कोई रक्षा समझौता नहीं हुआ इसलिए मैं कह सकता हूं कि मैंने कोई कमीशन नहीं खाया है, लेकिन यह कहना कि कमीशन नहीं लिया जाता, सरासर झूठ है।"

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