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गंगा किनारे मौजूद पहले और आखिरी आदिशक्तिपीठ की यात्रा:विंध्यवासिनी की ब्रह्मा-विष्णु-महेश ने की पूजा; दिन में कन्या, रात में वृद्ध हो जाती हैं माता

2 महीने पहलेलेखक: देवांशु तिवारी
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मिर्जापुर से 8 किलोमीटर दूर पड़ता है विंध्याचल शहर। गंगा के तट पर बसा यह शहर शक्ति स्वरूपा मां विंध्यवासिनी का घर है। उन्हें मां का दर्जा देकर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा जी ने पूजा की थी।

मान्यता है कि धरती पर जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। लेकिन विंध्याचल वह आदि शक्तिपीठ है, जिसे भगवती ने अपने जन्म के बाद रहने के लिए खुद चुना।

विंध्याचल धाम में मां के बाल रूप से लेकर वृद्धावस्था तक के दर्शन होते हैं। नवरात्र में यहां हर रोज आने वाले भक्तों की संख्या 10 लाख के पार हो जाती है।

  • चलिए मां विंध्यवासिनी देवी के आदिशक्तिपीठ के दर्शन करते हैं...

धरती के निर्माण से पहले मां विंध्यवासिनी ने दिया त्रिदेवों को ज्ञान
मां विंध्यवासिनी देवी आदिशक्तिपीठ के मुख्य पुजारी पंडित ईश्वर दत्त त्रिपाठी ने बताया, "दुर्गा सप्तशती से लेकर ऋग्वेद में विंध्यवासिनी देवी का वर्णन मिलता है। भगवत पुराण में देवी को भगवान कृष्ण की बहन नंदजा कहा गया, तो शिव पुराण में मां को सती का अंश बताया गया।"

पंडित ईश्वर दत्त कहते हैं, "महिषासुर को मारने के बाद मां विंध्य पर्वत पर चली आई थीं। तब से वो यहां विराजने लगीं। मां विंध्यवासिनी ने ही महालक्ष्मी, महाकाली और महा-सरस्वती को बनाया। उन्होंने ही धरती के निर्माण से पहले ब्रह्मा, विष्णु और महेश को ज्ञान दिया था। इसलिए सृष्टि के आरंभ होने से पहले और प्रलय के बाद भी इस स्थान का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता।"

विंध्यवासिनी देवी मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित ईश्वर दत्त त्रिपाठी।
विंध्यवासिनी देवी मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित ईश्वर दत्त त्रिपाठी।

आदिशक्तिपीठ में पूरे शरीर के साथ विराजती हैं भगवती
विंध्यवासिनी मंदिर के सेवादार रितेश त्रिपाठी कहते हैं, “सभी 51 शक्तिपीठों में कहीं भी माता पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं। लेकिन, विंध्याचल ही ऐसा स्थान है, जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। वैष्णो देवी में महालक्ष्मी, महाकाली और महा-सरस्वती की पिंडियों की पूजा होती है। लेकिन, यहां तीनों देवियों के विग्रहों की पूजा होती है।”

विंध्यवासिनी के दरबार में होती हैं 4 आरतियां

मंदिर सेवा समिति के अनुसार, पूरे भारत में देवी का यही एकमात्र मंदिर है, जहां दिन में 4 बार आरती होती है।

सुबह 5 बजे: मंगला आरती होती है, जिसमें मां के कन्या रूप की पूजा होती है।
दोपहर 12 बजे: राजश्री आरती में मां के प्रौढ़ रूप के दर्शन होते हैं।
रात 8:30 बजे: दीपदान आरती में मां का रूप वृद्धावस्था की तरह लगता है।
रात 10:30 बजे: शयन आरती में भगवती के देवी स्वरूप की पूजा होती है।

इस बार 15 लाख से ज्यादा भक्तों के आने की उम्मीद
मंदिर सेवा समिति के सदस्य रितेश बताते हैं, “ बीते 2 साल में कोरोना प्रतिबंधों की वजह से नवरात्र के 9 दिनों में यहां 3 लाख लोगों ने देवी के दर्शन किए। कोरोना से पहले नवरात्र में यह संख्या 10 लाख तक पहुंच जाती थी। अब हालात नॉर्मल हो गए हैं। इसलिए हमें उम्मीद है कि नवरात्र में यहां आने वाले भक्तों की संख्या 15 लाख के पार पहुंच सकती है।"

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विंध्याचल से गुजरते हुए गंगा शिव की नगरी काशी में प्रवेश करती है।
विंध्याचल से गुजरते हुए गंगा शिव की नगरी काशी में प्रवेश करती है।

देवी के सभी 51 शक्तिपीठ गंगा के किनारे नहीं बने हैं। लेकिन विंध्याचल में गंगा नदी मंदिर से सटकर बहती है। मान्यता है कि गंगा स्नान के बाद मां विंध्यवासिनी का दर्शन करने से हर मनोकामना पूरी होती है। पुजारी ईश्वर दत्त ने बताया, “नवरात्र में पूरे मंदिर को गंगाजल से धुल कर फूलों और झालरों से सजाया जाता है। गुलाब, गेंदा, लाल गुड़हल के फूलों और सोने के जेवरातों से मां का श्रृंगार किया जाता है। देवी को चढ़ाए जाने वाले महा प्रसाद में मुख्य रूप से चना, खीर और पुआ शामिल हैं।”

8 महापुरुषों की तपस्थली रहा विंध्याचल क्षेत्र
विंध्यवासिनी मंदिर के त्रिकोण पथ पर मां काली और अष्टभुजा देवी विराजमान हैं। इसी रास्ते पर संत देवरहा बाबा, नीम करौरी बाबा, गीता स्वामी, माता आनंदमयी, बाबा नरसिंह, अवधूत भगवान राम, पगला बाबा, बंगाली माता जैसे कई साधकों ने तपस्या कर देवी को खुश किया था। इन सभी संतों के आश्रम आज भी यहां मौजूद हैं।

  • अब...यहां तक आपने मां विंध्यवासिनी देवी के भव्य मंदिर के बारे में जाना। आगे इस मंदिर तक कैसे पहुंचे और इससे जुड़ी कुछ रोचक बातें जान लेते हैं...
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