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28 साल से रामपुर तिराहा कांड में न्याय का इंतजार:मुजफ्फरनगर के फास्ट ट्रैक कोर्ट में 27 जून को सुनवाई, CBI का वकील नियुक्त नहीं

मुजफ्फरनगरएक महीने पहले
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मुजफ्फरनगर में लगभग 28 साल बीतने के बावजूद उत्तराखंड गठन आंदोलन में शहीद हुए लोगों के स्वजन इंसाफ को भटक रहे हैं। मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर हुए भी सात महीने से ज्यादा समय हो गया है, लेकिन सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। कोर्ट में सोमवार को फिर तारीख है, लेकिन सीबीआई की और से पैरवी के लिए अधिवक्ता नियुक्त न होने के चलते कार्यवाही आगे बढ़ने में संशय है।

मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर अलग उत्तराखंड के लिए हुए संघर्ष में गोलीकांड के बाद का दृश्य। फाइल फोटो।
मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर अलग उत्तराखंड के लिए हुए संघर्ष में गोलीकांड के बाद का दृश्य। फाइल फोटो।

27 जून है मुकदमों की सुनवाई की तारीख
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान संघर्ष हत्या तथा महिलाओं से ज्यादती के मामले में 4 मुकदमे फास्ट ट्रैक कोर्ट में विचाराधीन हैं। जिनमें सीबीआई बनाम मिलाप सिंह, सीबीआई बनाम राधा मोहन द्विवेदी तथा सीबीआई बनाम एसपी मिश्रा एवं सीबीआई बनाम ब्रजकिशोर सिंह शामिल हैं। सभी मुकदमों की सुनवाई के लिए 27 जून की तिथि निर्धारित की गई है।

उत्तराखंड निर्माण को लेकर हुआ था आंदोलन
तीन दशक पहले पहाड़ों में अलग उत्तराखंड की मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। अक्टूबर 1994 में उत्तराखंड निर्माण के लिए दिल्ली कूच का कार्यक्रम रखा गया था। एक अक्टूबर को मौजूदा उत्तराखंड से गाड़ियों में भरकर आंदोलनकारियों ने दिल्ली के लिए कूच किया था। शाम के समय जैसे ही आंदोलनकारियों की गाड़ियां जिले के छपार थाना क्षेत्र के रामपुर तिराहे पर पहुंची, तो उन्हें बेरीकैड कर रोक लिया गया।

उत्तराखंड गठन के लिए दिल्ली में हुई एक सभा में काफी संख्या में महिलाएं भीं पहुंची थीं। -फाइल फोटो।
उत्तराखंड गठन के लिए दिल्ली में हुई एक सभा में काफी संख्या में महिलाएं भीं पहुंची थीं। -फाइल फोटो।

विरोध उग्र होता देख पुलिस ने फायरिंग कर दी। इसमें सात आंदोलकारियों के शहीद होने की बात सामने आई है। महिलाओं के साथ अभद्रता हुई, लेकिन स्थानीय निवासियों ने आंदोलनकारियों की भरपूर मदद की।

CBI ने की थी जांच, दर्ज कराए थे सात मुकदमे
उत्तराखंड की मांग को हुए संघर्ष में सात लोगों की जान चली गई थी। इनमें देहरादून नेहरू कॉलोनी निवासी रविंद्र रावत उर्फ गोलू, भालावाला निवासी सतेंद्र चौहान, बदरीपुर निवासी गिरीश भदरी, अजबपुर निवासी राजेश लखेड़ा, ऋषिकेश निवासी सूर्यप्रकाश थपलियाल, ऊखीमठ निवासी अशोक कुमार और भानियावाला निवासी राजेश नेगी की मौत की पुष्टि हुई थी।

इसके बाद 1995 में पूरे घटनाक्रम की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। जांच कर सीबीआई ने 7 मामलों में चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की थी। इनमें अलग-अलग कारणों से 3 मुकदमे खत्म हो चुके हैं और 4 मुकदमे अभी भी विचाराधीन हैं। इन मामलों में तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह और एसपी आरपी सिंह आज भी आरोपित हैं।

मारे गए लोगों को इंसाफ दिलाने को रामपुर तिराहा स्थित शहीद स्मारक पर एसआईटी गठन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया गया था।- फाइल फोटो
मारे गए लोगों को इंसाफ दिलाने को रामपुर तिराहा स्थित शहीद स्मारक पर एसआईटी गठन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया गया था।- फाइल फोटो

फास्ट ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर हुए थे मुकदमे
उत्तराखंड आंदोलन में शहीद हुए लोगों तथा महिलाओं के साथ अभद्रता के मुकदमों की सुनवाई एसीएजेएम-2 कोर्ट में विचाराधीन थी। नवंबर 2021 में सभी मुकदमे अपर सिविल जज सीनियर डिवीजन मयंक जयसवाल की फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित हो गए थे। उत्तराखंड आंदोलनकारी संघर्ष समिति की और से पैरवी के लिए पैनल में रखे गए एडवोकेट अनुराग वर्मा कहते हैं कि एफटीसी में मुकदमे ट्रांसफर होने के बाद पीड़ितों को लगा था कि शायद उन्हें अब शीघ्र न्याय मिल जाएगा। सीबीआई की और से अधिवक्ता नियुक्त न होने के कारण सुनवाई आज तक अटकी हुई है।

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