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भक्तों पर कृपा बरसाने वाली हैं माता कात्यायनी VIDEO:धरा के केंद्र बिन्दु पर विराजमान होकर जगत का विभिन्न रूपों में कल्याण कर रही माता विंध्यवासिनी

मिर्जापुर2 महीने पहले
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आदिशक्ति जगत जननी मां विंध्यवासिनी की नवरात्र में नौ रूपों की आराधना की जाती है। आदिशक्ति का छठवें दिन सिंह पर सवार चार भुजा वाली माता "कात्यायनी" के रूप में पूजन किया जाता है। मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है। यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है।‌ अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है। अपने भक्तों पर कृपा बरसाने वाली माता कात्यायनी बड़ी दयालु है। भक्त की जो भी कामना होती हैं। उसे वह वरद रूपी मुद्रा से वरदान देकर पूर्ण करती हैं।

माता विंध्यवासिनी के दरबार में दर्शन के कतार में खड़े श्रद्धालु
माता विंध्यवासिनी के दरबार में दर्शन के कतार में खड़े श्रद्धालु

संकट नाशक है माता कात्यायनी

देवी कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है। मां कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं। देवी कात्यायनी के पूजन से भक्त के भीतर शक्ति का संचार होता है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं। साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है। माता कात्यायनी का पूजन दर्शन करने से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के साथ ही भक्त, रोग, शोक, संताप से मुक्ति प्राप्त करता है।

विंध्याचल धाम में झांकी से दर्शन करने के उमड़ी भीड़ और सुरक्षा के लिए मौजूद सिपाही
विंध्याचल धाम में झांकी से दर्शन करने के उमड़ी भीड़ और सुरक्षा के लिए मौजूद सिपाही

मनचाहा जीवनसाथी प्रदान करती है माता कात्यायनी

माता कात्यायनी की आराधना करने से मनचाहा पति व स्त्री की प्राप्ति भी होती है। विन्ध्य और मां गंगा के तट पर विराजमान मां विंध्यवासिनी कात्यायनी का दिव्य रूप धारण कर भक्तों का कष्ट दूर करती है।

माता के दर्शन के लिए धाम में कतार में लगे भक्त गण।
माता के दर्शन के लिए धाम में कतार में लगे भक्त गण।

धरा के केंद्र बिन्दु पर विराजमान है माता विंध्यवासिनी
विन्ध्य पर्वत पर विराजमान माँ विंध्यवासिनी का छठवे दिन "कात्यायनी" के रूप में पूजन व अर्चन किया जाता है। महिषासुर के वध के लिए उत्पन्न हुई देवी की सर्व प्रथम पूजा महर्षि कात्यायन ने किया। इससे देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। विन्ध्यक्षेत्र में मां को विन्दुवासिनी अर्थात विंध्यवासिनी के नाम से भक्तों के कष्ट को दूर करने वाला माना जाता है।

दूर दराज से आने वाले भक्त माता विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए कतार बद्ध खड़े भक्तगण
दूर दराज से आने वाले भक्त माता विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए कतार बद्ध खड़े भक्तगण

यं यं चिंतयते कामं, तं तं प्राप्नोति निश्चित़ं
भक्त जिस कामना से पूजन अर्चन कर मंत्रो का जप करते है। वह उन्हें प्रदान करती है। धाम में आने पर ममता बरसाने वाली माता का दर्शन पाकर भक्त विभोर हो जाते है। माता के ममतामयी छवि को निहार वह इस कदर निहाल होते है की उन्हें सब कुछ मिल जाता है।

जगत जननी माता विंध्यवासिनी के दरबार में कतार बद्ध अपनी बारी की प्रतीक्षा करते भक्त
जगत जननी माता विंध्यवासिनी के दरबार में कतार बद्ध अपनी बारी की प्रतीक्षा करते भक्त

सब पर दया बरसाती है माता रानी

दरभंगा से आए भक्त शक्ति कुमार ने बताया कि देश के कोने कोने से श्रद्धालु मां विंध्यवासिनी के दर्शन के लिए लंबी लंबी कतारों में खड़े होकर जयकारा लगाते हुए दर्शन पाने के लिए बेताब रहते हैं। श्रद्धालु का कहना है कि मां की ममता सभी पर बरसती है।

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