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​​​​​​​कोरोनाकाल में मुरझाए फूलों की त्योहारों में बढ़ी मांग:फूलों की खेती के लिए मेरठ की मिट्‌टी मुफीद, किसान बोले- लॉकडाउन में फसल को ट्रैक्टर से नष्ट करना पड़ा था, अब डिमांड बढ़ी

मेरठ4 महीने पहले
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मेरठ में लहलहाती गेंदा की फसल।

फूलों के कारोबार में सबसे सदाबहार फसल गेंदा एक बार फिर से गंगा-यमुना के दोआबा मेरठ में खिलखिलाने लगा है। मार्च 2020 में पूरे देश में जब कोरोना महामारी की दस्तक के बाद लॉकडाउन लगा तो गेंदे की फसल पर अचानक से संकट आ गया। धार्मिक-राजनीतिक और शादी समारोह के कार्यक्रम एक साथ बंद हुए तो किसानों को गेंदा की फसल को खेत में ही नष्ट करना पड़ा, लेकिन जैसे ही अब कोरोना महामारी का असर कम पड़ा तो फिर से वेस्ट यूपी में गेंदा लहलहाने लगा है।

वेस्ट यूपी के लिए मुफीद है गेंदे की फसल

कृषि विश्वविद्यालय मोदीपुरम के वरिष्ठ प्रोफेसर एमएस राणा का कहना है कि वेस्ट यूपी में मिटटी अधिक उपजाऊ है। गंगा यमुना के दोआबा क्षेत्र में सिंचाई के पर्याप्त साधन होने के कारण यहां गन्ना, धान, सब्जी के अलावा फूलों की खेती भी पर्याप्त तौर पर की जाती है। वेस्ट यूपी के जिलों की मिट्टी अधिक उपजाऊ होने के साथ मौसम भी अनुकूल रहता है।

जहां किसान फूलों की खेती कर अधिक पैसा कमा रहे हैं। वेस्ट यूपी में गेंदे की उन्नत किस्मों को बोया जाता है। यहां से पैदा होने वाले फूलों की डिमांड यूपी के अलावा हरियाणा, पंजाब, राजस्थान में भी है। मथुरा और आगरा में भी गेंदे की फूल की डिमांड अधिक है।

गेंदे के हल्के पीले फूल की डिमांड अधिक

मेरठ के लावड़ के रहने वाले श्यौदान सिंह ने बताया कि वह पिछले 10 साल से गेंदे की फसल बो रहे हैं। मार्च 2020 में लॉकडाउन लगा तो गेंदे की फसल में नुकसान उठाना पड़ा। बाजार बंद हो गए, सभी धार्मिक व वैवाहिक और अन्य कार्यक्रमों पर रोक लग गई। इसके बाद गेंदे की फसल को खेत में ही ट्रैक्टर से नष्ट करना (जोतना पड़ा)।

मौसम में नमी आने के साथ ही गेंदा की फसल लहलहाने लगी है।
मौसम में नमी आने के साथ ही गेंदा की फसल लहलहाने लगी है।

उसके बाद 2020 में अगस्त व सितंबर में भी गेंदे की फसल की बुआई नहीं की गई, क्योंकि किसान मार्च व अप्रैल 2020 में ही नुकसान उठा चुके थे। गेंदे में कई उन्नत किस्में हैं, लेकिन हल्के पीले रंग के फूल की डिमांड अधिक है। माला के लिए छोटा फूल पंसद किया जाता है। अन्य कार्यक्रमों के लिए बड़े आकार का फूल अधिक पसंद किया जाता है।

कोरोना के जाते ही आई बहार

मेरठ के ही महेंद्र सैनी पिछले दो दशक से गेंदे की बुआई कर रहे हैं। महेंद्र का कहना है कि इस बार जुलाई में जैसे ही कोरोना के मरीजों की संख्या न के बराबर रह गई तो कुछ किसानों ने जुलाई के आखिरी माह व अगस्त में गेंदे की बुआई की। अब गेंदे पर फूल आने लगा। कोरोना के जाते ही सभी कार्यक्रमों के आयोजन होने लगे हैं। गेंदा ही ऐसा फूल है जो सभी शादी समारोह, स्वागत कार्यक्रम व अन्य सभी कार्यक्रमों में डिमांड में रहता है।

गेंदे की फसल में किसान 4 से 5 माह में ही 18-20 हजार या उससे अधिक प्रति बीघा कमा लेते हैं। गेंदे का रेट 12 रुपए प्रति किलो से लेकर 55 रुपए प्रति किग्रा तक पहुंच जाता है। गेंदे की बुआई फरवरी मार्च, जून, जुलाई व सितंबर अक्टूबर में की जाती है। साल में 3 बार यह फसल बोई जाती है।

तोड़ने व मंडी पहुंचाने में है अधिक मेहनत

गेंदे की फसल उगाने वाले किसानों का कहना है कि गेंदे की फसल में अधिक सिंचाई की जरूरत पड़ती है। गेंदे के फूल को पौधे से तोड़ने में अधिक मेहनत व सावधानी बरतनी पड़ती है। शाम को जैसे ही धूप ढ़लने लगती है तो गेंदा का फूल तोड़ने का काम शुरू होता है, जिससे धूप में फूल को नुकसान न हो।

देर शाम तक फूल तोड़ा जाता है। उसके बाद रात में ही हल्के कपड़ों में बांधकर रात के 3 बजे ही मंडी पहुंचाना पड़ता है, क्योंकि सुबह 4 बजे गेंदा मंडी में बिक जाता है। तोड़ने व मंडी पहुंचाने में अधिक मेहनत है।

महानगरों में अधिक है डिमांड

गेंदा व अन्य फूल की डिमांड महानगरों में अधिक रहती है। मेरठ के ब्रह्मपुरी में गेंदे की फूल की बड़ी मंडी है। मेरठ के अलावा, गाजियाबाद, नोएडा, बुलंदशहर, हापुड़, बागपत व सहारनपुर, बिजनौर के अलावा आगरा क्षेत्र में गेंदे की फसल अधिक बोई जाती है। बड़े-बड़े शहरों के आसपास के क्षेत्रों में फूलों की बुआई की जाती है। वेस्ट यूपी के जिलों से गेंदा दिल्ली की मंडी भी पहुंचाया जाता है।

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