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मथुरा में शक्तिपीठ मां कात्यायनी:यहां गिरे थे माता सती के केश, श्रीकृष्ण को वर के रूप में पाने के लिए राधा ने यहीं की थी उपासना, आज भी चली आ रही परंपरा

मथुरा2 महीने पहले
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वृंदावन में मां कात्यायनी का प्राचीन मंदिर है। यह मां के 51 शक्तिपीठों में से एक है। श्रीमद भागवत में इसका वर्णन है। यहां माता सती के केश गिरे थे।

नवरात्र में दैनिक भास्कर आपको UP में मां दुर्गा के शक्ति पीठों और प्रमुख मंदिरों के दर्शन करा रहा है। इसी कड़ी में हम आपको आज वृंदावन से मां कात्यायनी के दर्शन करा रहे हैं। छठे नवरात्र को इनकी उपासना होती है। यह मंदिर मां के 51 शक्तिपीठों में से एक है। महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद भागवत में कात्यायनी शक्तिपीठ का वर्णन किया है। मान्यता है कि जहां कात्यायनी शक्तिपीठ स्थित है, वहां माता सती के केश गिरे थे। कहा जाता है कि यहां राधा ने श्रीकृष्ण को वर के रूप में पाने के लिए पूजा की थी। ऐसी मान्यता है कि मां कात्यायनी के दर्शन और पूजा अर्चना से युवतियों को उनका मनचाहा वर मिलता है। वर्षभर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। नवरात्र में विशेष रूप से लोग मां के दर्शन को पहुंचते हैं।

वृदावन में शक्तिपीठ मां कात्यायनी का मंदिर।
वृदावन में शक्तिपीठ मां कात्यायनी का मंदिर।

सालभर लगता है देश- विदेश से भक्तों का तांता

कात्यायनी शक्ति पीठ उत्तर प्रदेश में मथुरा के वृन्दावन में स्थित हैं। यह एक बहुत ही प्राचीन सिद्ध पीठ हैं, जो वृन्दावन में राधाबाग के पास है। कात्यायनी शक्ति पीठ में साल भर भक्त दर्शन और पूजा करने के लिए आते हैं। नवरात्र के दिनों में कात्यानी शक्ति पीठ में भक्तों की काफी भीड़ होती है।

गुरु मंदिर, शंकराचार्य मंदिर, शिव मंदिर ,गणेश मंदिर तथा सरस्वती मंदिर भी कात्यायनी मंदिर के पास ही हैं। ये बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। जहां देश विदेश से हजारों की संख्या में लोग पूजा करने आते हैं।

मां कात्यायनी के मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़।
मां कात्यायनी के मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़।

कात्यायनी शक्तिपीठ कैसे पहुंचें

कात्यायानी शक्तिपीठ वृन्दावन के राधा बाग में स्थित है। वृन्दावन मथुरा से 10 किलोमीटर की दूरी पर है। रेल मार्ग से यात्रा करने वाले यात्री मथुरा उतरकर वृन्दावन पहुंच सकते हैं। गाड़ी से यात्रा करने वाले यात्री सीधे वृन्दावन पहुंच सकते हैं। गाड़ी मंदिर से करीब 100 मीटर पहले तक पहुंच जाती है।

यहां पूजा करने से पूरी होती हैं मनोकामनाएं।
यहां पूजा करने से पूरी होती हैं मनोकामनाएं।

द्वापर से भी जुड़ी है कात्यायनी की महत्ता

द्वापर में श्री कृष्ण ने मोहिनी बांसुरी और अनूठी लीलाओं से ब्रज की गोपिकाओं का मन मोह लिया था। हर कोई उनके दिल में रहने की चाहत रखता था। गोपिकाएं तो कृष्ण को पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने मां कात्यायनी की आराधना की थी। तब से अब तक युवतियां की ओर से सुयोग्य वर के लिए मां की आराधना की परंपरा चली आ रही है।

श्रीमद भागवत पुराण में उल्लेख है कि ब्रज की गोपिकाओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने का मन में विचार बनाया। ब्रज लीला के तत्वज्ञ गर्ग मुनि ने गोपिकाओं के इस मनोभाव को जानकर भगवान श्रीकृष्ण को सचेत कर दिया। ब्रज गोपिकाओं के संकल्प को देख वृंदा देवी एक दिन गोपिकाओं के पास पहुंचीं और उन्होंने कहा कि अगर श्रीकृष्ण को पाना है तो मां कात्यायनी की आराधना करो।

वृन्दा देवी ने दिया गोपिकाओं को कात्यायनी की पूजा करने का सुझाव

गोपिकाओं ने वृंदा देवी द्वारा बताई विधि के अनुसार यमुना के तट पर एकत्रित होकर बालुई मिट्टी से मां कात्यायानी का श्रीविग्रह बनाया और उनकी वैष्णव विधि से पूजा कर एकमासीय व्रत का संकल्प लिया। इस पर प्रसन्न हुई मां ने गोपियों को वरदान दे दिया। स्थानीय जानकार जगदीश शर्मा के अनुसार भागवत के दशम स्कंध में उल्लेख है कि ब्रह्माजी ने भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने के लिए ब्रजमंडल के गोवंश और ब्रज गोप का हरण कर उन्हें ब्रह्मलोक ले गए।

बिगड़ती स्थिति को संभालने के लिए भगवान कृष्ण ने गोवंश और ब्रज ग्वालों का रूप धरकर एक साल तक ब्रज में निवास किया। इस तरह मां कात्यायनी का दिया गया वरदान पूरा हुआ। भगवान कृष्ण गोपियों के पति के रूप में उनके घर पर रहे थे।

मां कात्यायानी की उपासना से मिलता है मनचाहा वर

मान्यता है कि युवतियों की आराधना से प्रसन्न होकर आज भी कात्यायानी मां उन्हें मनचाहा सुयोग्य वर प्रदान करती हैं। सालभर में सैकड़ों युवतियां आज भी मां कात्यायानी की आराधना कर सुहाग की वस्तुएं अर्पित कर अपनी मनोकामना पूरी कर रही हैं।

केशवानंद महाराज ने कराया था कात्यायनी मन्दिर का निर्माण

सन्त केशवानंद महाराज मां कात्यायनी के अनन्य भक्त थे। केशवानंद महाराज हरिद्वार में रहते थे। कहा जाता है कि एक दिन स्वप्न में माँ कात्यायनी ने केशवानंद महाराज से वृन्दावन में मन्दिर बनाने के लिए कहा जिसके बाद वृन्दावन के राधा बाग में माँ कात्यायनी का दिव्य मन्दिर बनाया गया।

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