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  • Akhilesh Is Contesting From Karhal Because Of This.: In Mulayam's Fort, Victory Will Be Easy Because Of Yadav Voters, Won 4 Out Of 5 Seats In The First Election Itself.

करहल से इसलिए चुनाव लड़ रहे अखिलेश:38% वोटर यादव हैं, पहले चुनाव में ही 5 में से 4 सीटें जीती थीं

मैनपुरी4 महीने पहले
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पिछले चुनावों की तरह ही 2022 का विधानसभा का चुनाव भी जातीय समीकरणों पर टिका हुआ है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मैनपुरी की करहल सीट से चुनाव लड़ेंगे। मैनपुरी मुलायम सिंह का यादव का दुर्ग माना जाता है। यहां पर सपा का हमेशा ही दबदबा रहा है।

करहल विधान सभा क्षेत्र में करीब 3 लाख 71 हजार वोटर हैं। इसमें यादव वोटरों की संख्या लगभग 1 लाख 44 हजार है। मतलब कुल वोटर्स का 38 परसेंट वोट सिर्फ यादवों का है। सपा की पैठ का अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है कि यहां पहले चुनाव में ही 5 में से 4 सीटें जीती थीं। मैनपुरी, करहल व किशनी सीटों में यादव मतदाताता ज्यादा हैं, जबकि क्षत्रिय मतदाता दूसरे नंबर पर हैं। भोगांव में लोधी मतदाता पहले और यादव दूसरे नंबर पर हैं।

मैनपुरी से चुनाव लड़ने की ये हैं 5 बड़ी वजह

1. जातीय समीकरण

जिले में करीब 2 लाख वोटर है। इनमें 70 हजार से ज्यादा यादव हैं। माना जा रहा है कि सपा जातीय समीकरण के चलते ही अखिलेश को करहल सीट से उतारा गया है। पहले चुनाव में ही सपा ने यहां 5 में से 4 सीटें जीती थीं। ऐसे में उनकी यहां से जीत पक्की मानी जा रही है। वहीं, हर क्षेत्र में सजातीय नेताओं को माहौल बनाने के लिए लगाया गया है। उधर, कांग्रेस ने मैनपुरी सीट पर जिलाध्यक्ष विनीता शाक्य और करहल सीट पर ज्ञानवती यादव को प्रत्याशी घोषित किया है।

2. हमेशा सपा का दबदबा रहा

मैनपुरी में यादवों के साथ अन्य पिछड़ी जातियों को मिलाकर सपा जीत का परचम फहराती आ रही है। वर्तमान में चार में से तीन सीटों पर सपा का कब्जा है, जबकि भोगांव पर भाजपा काबिज हैं। जिले में सपा ने पहला चुनाव 1993 में लड़ा था। तब पांच सीटों में चार पर जीत हासिल की। 1996 में सपा ने सभी पांचों सीटें जीतींं। फिर 2002 के चुनाव में भोगांव और किशनी सीट पर विजय हासिल की। 2007 में भोगांव और किशनी के साथ करहल सीट पर जीत हासिल की। 2012 के चुनाव में सपा ने फिर चारों सीटों पर कब्जा कर लिया।

2017 में भाजपा ने भोगांव सीट 20 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से जीती। जबकि करहल, किशनी और मैनपुरी में दूसरे नंबर पर रही थी। भाजपा इससे पहले 1991, 1993, 2002 और 2007 में मैनपुरी सीट पर जीत हासिल करने में कामयाब हुई। करहल सीट 2002 में जीती थी। बसपा भी घिरोर सीट पर दो बार जीत हासिल कर चुकी है। परंतु परिसीमन के बाद 2012 में यह सीट समाप्त कर इसके क्षेत्रों को मैनपुरी और करहल विधानसभा में शामिल कर दिया गया। कांग्रेस 1985 के बाद से जिले में कोई चुनाव नहीं जीती है।

3. भाजपा-कांग्रेस को मिली शिकस्त

भाजपा ने सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के इस दुर्ग को भेदने के लिए सरकार बनने के बाद से ही ताकत झोंकी है। जिले के एकमात्र भाजपा विधायक रामनरेश अग्निहोत्री को कैबिनेट मंत्री बनाने के साथ भोगांव-शिकोहाबाद मार्ग को फोरलेन करने और सैनिक स्कूल का संचालन शुरू कराया। हालांकि इस स्कूल की स्वीकृति सपा सरकार में ही मिली थी।

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा हर बूथ तक नहीं पहुंच सकी थी। इस बार प्रत्येक बूथ स्तर तक संगठन मजबूत किया है। जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चुनाव जीतकर पार्टी तैयारियों का रिहर्सल भी कर चुकी है। मुलायम सिंह यादव के दामाद (भाई की बेटी के पति) अनुजेश यादव भी 2019 में भाजपाई हो चुके हैं। उन्हें करहल सीट से दावेदार भी माना जा रहा है। इसके अलावा सपा की हर गतिविधि पर भाजपा नेताओं की नजर है।

4. पिछले तीन चुनावों में सपा के पाले में गई करहल सीट

कलहल सीट पर सपा का दबदबा रहा है। 2007, 2012 और 2017 लगातार तीन बार के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी यहां से जीत दर्ज करती आ रही है। करहल विधानसभा सैफई से करीब ही है। यहां सपा मुखिया के परिवार का दखल काफी रहता है। पिछले तीन बार से यहां से सपा की सोबरन यादव विधायक हैं। सीधी साधी छवि वाले सोबरन के सिर पर पर मुलायम का हाथ बताया जाता है।

2017 के चुनाव में सपा उम्मीदवार सोबरन सिंह यादव ने 104221 वोट पाकर भाजपा के राम शाक्य को 38405 वोट से शिकस्त दी थी। बसपा ने दलवीर को यहां से उम्मीदवार बनाया था। वहीं आरएलडी ने यहां यादव वोट में सेंध मारने के लिए कौशल यादव को उम्मीदवार बनाया था।

5. मैनपुरी ही नहीं, इन इलाकों में भी मिलेगा फायदा

अखिलेश यादव के मैनपुरी से चुनाव लड़ने का असर आसपास के अन्य जिलों में देखने को मिलेगा। इस सीट पर चुनाव लड़ने से कानपुर और आगरा मंडल की कई सीटों के साथ ही फिरोजाबाद, एटा, औरैया, इटावा, कन्नौज समेत कई सीटों पर असर हो सकता है, क्योंकि ये जिले एसपी के गढ़ माने जाते हैं। ऐसे में अखिलेश के यहां से मैदान में उतरना पार्टी के कई मायनों में फायदेमंद हो सकता है।

एक नजर में जातीय समीकरण

  • पिछड़ा वर्ग : 55 परसेंट
  • सवर्ण : 20 परसेंट
  • अनुसूचित जाति : 20 परसेंट
  • मुस्लिम : 5 परसेंट
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