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लखीमपुर में मनाई गई पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती:विद्या मंदिर के प्राचार्य बोले- स्वर्ण अग्नि में तपकर ही कुंदन बनता है

लखीमपुर-खीरी2 महीने पहले
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लखीमपुर खीरी में विद्या भारती के विद्यालय पं0 दीनदयाल उपाध्याय सरस्वती विद्या मन्दिर इंटर कालेज में वंदना सभा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती का कार्यक्रम मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की मूर्ति पर पुष्प अर्पित कर किया। इस अवसर पर विद्यालय के वरिष्ठ आचार्य श्री विजय कुमार श्रीवास्तव ने छात्रों को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन के बारे में विस्तार से बताया।

विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि स्वर्ण अग्नि में तप कर कुंदन बनता है। अर्थात स्वर्ण तप कर ही उस आकार में ढलता है जिसे धारण करने वाले के व्यक्तित्व में चार चांद लग जाते हैं लेकिन स्वर्ण को धारण करने योग्य बनने के लिए पहले अग्नि में तपना पड़ता है।

राजस्थान में हुआ था पं. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म

उन्होंने कहा कि जितने भी महापुरूष हुए हैं, वे भी सरलता से महान नहीं हुए हैं। उन्होंने अपने जीवन को जिन्दगी की भटटी में झोंक दिया, तब वे महान् व्यक्ति कहलाए और लोगों ने उनके कार्यो, उनके आदर्शो को अपनाया। अर्थात महान त्याग करके महान बना जाता है। महानता कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जाए और महान बना जाए। इन्हीं महान पुरूषों की श्रृंखला में एक महान पुरूष थे - ‘‘पं. दीनदयाल उपाध्याय।’’ पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म उनके नाना पंडित चुन्नीलाल जी के यहां राजस्थान के धनकिया नामक ग्राम में दिनांक 25 सितम्बर 1916 को हुआ था। सादा जीवन, उच्च विचार और व्यवहार में सरलता के धनी पंडित दीनदयाल उपाध्याय आजन्म ब्रम्हचारी रहे।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मूर्ति पर पुष्प अर्पित करते हुए प्रधानाचार्य।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मूर्ति पर पुष्प अर्पित करते हुए प्रधानाचार्य।

1967 में बने थे जनसंघ के अध्यक्ष

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की कश्मीर में रहस्यमय मृत्यु के बाद सर्वश्री प्रेमनाथ डोगरा, मौलिचन्द्र शर्मा, बच्छराज व्यास, पीताम्बर दास, डाॅ. रघुवीर, एस.रामाराव, बलराज मधोक आदि ने जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। दिसम्बर 1967 में जनसंघ के 14वें अधिवेशन के अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय को इसका अध्यक्ष बनाया गया। उनके नेतृत्व में संघ एक नई चेतना के साथ आगे बढ़ने लगा। अटल जी के साथ-राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और स्वदेश में उन्होंने कंधे-से-कंधा मिलाकर कार्य किया।

पंडित जी कम बोलते थे और अधिक सुनते थे

वे बोलते कम थे, सुनते अधिक थे। अतिशयोक्ति और प्रचार में उनकी रुचि नहीं थी। वे समन्वयवादी थे, समझौतावादी थे; किन्तु सिद्धांतो से गिरकर अथवा परिस्थिति से पराजित होकर उन्होंने न समझौता किया, न समन्वय। जनसंघ को नवपथ की ओर अग्रसर कर राजनीति के विशाल प्रांगण में खड़े कर देने का साहस और जीवट केवल दीनदयाल जी में ही था।

इस मुखर और सच्चे राष्ट्रभक्त का शव मुगलसराय स्टेशन के निकट पाया गया । 11 फरवरी 1968 को सभी भारतवासियों ने यह दुखद समाचार सुना। यह समाचार सुनकर भारत का जनमानस हिल गया। कण-कण अवाक रह गया एवं भारत शोक सागर में डूब गया।

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