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सादाबाद में ढाप बजाने की परंपरा:कुरसंडा में रंगभरनी एकादशी पर ढाप बजाने की है परंपरा

सादाबाद, हाथरस5 महीने पहले
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सादाबाद। होली मौज, मस्ती और आपसी मतभेद भुलाकर अपनों को गले लगाने का त्यौहार है। होली को लेकर देहात में पुरानी परंपराएं आज तक जीवंत हैं, जो बहुत सारी यादों को समेटे पर हुए हैं। ऐसी ही एक परंपरा है कुरसंडा में रंग भरनी एकादशी के दिन ढाप बजाने की।

कुरसंडा में ढाप बजाने की परंपरा बहुत ही पुरानी है। इसके लिए कमेटी गठित की जाती है, जिसमें गांव के नौजवान बुजुर्गों के सानिध्य में महीने भर पहले से ढाप बजाने का प्रयोगात्मक अभ्यास करते हैं। सोमवार को रंगभरनी एकादशी के दिन थोक मोडन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। ढाप मंडली गांव परिक्रमा करती हुई होलिका स्थल पर पहुंची। होलिका स्थल की परिक्रमा के बाद गांव की परिक्रमा की गई।

कुरसंडा में रंगभरी एकादशी व होली के दिन ढाप बजाने की परंपरा बहुत पुरानी है। होली वाले दिन गांव में दोपहर बाद मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें गांव की पंचायत घर पर ढाप बजाए जाते हैं। मंडली को सर्व समाज का सहयोग मिलता है। ढाप मंडली का आज भी गुलाल लगाकर व गुड़ चना खिलाकर जगह-जगह स्वागत किया गया। चंद्रपाल सिंह, जगदीश चंद्र, पप्पू ,रामप्रकाश, सोनू, सचिन, नेत्रपाल, पवन चौधरी, भूरी सिंह, भुवनेश शर्मा, मुकेश, अर्जुन, चरणदास सहित दर्जनों ग्रामीण कार्यक्रम में शामिल रहे।

सन 1945 में अंग्रेजों के शासन काल में सादाबाद तहसील पर ढाप बजाऐ गए थे। ढापों का गाना बजाना व होली के गीत सुन अंग्रेजों ने मंडली वालों का गुड़ चना खिलाकर स्वागत किया था।कुरसंडा के चौधरी दिगंबर सिंह जब सांसद चुने गए थे, तब वह गांव की ढप मंडली को अपने साथ दिल्ली ले गए थे। 1959 में संसद भवन में भी ढाप बजाऐ गये और होली के गीत गाए गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मंडली का साफा बांधकर स्वागत किया था।

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