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अनुराग और विराग दोनों एक साथ संभव नहीं:भागवत कथा में आचार्य ने दिया उपदेश, कहा- संसार से विराग कर भगवान में अनुराग करें

बबेरू, बांदा4 महीने पहले
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कथा व्यास आचार्य शशिकांत त्रिपाठी। - Money Bhaskar
कथा व्यास आचार्य शशिकांत त्रिपाठी।

बबेरू में ओरन कस्बे के प्रसिद्ध तिलहर माता मन्दिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्राेताओं ने राजा परीक्षित के श्राप और नारद जी के पूर्व जन्म की कथा सुनीं। कथा व्यास आचार्य शशिकांत त्रिपाठी ने महापुराण में शौनकादि द्वारा पूछे गए प्रश्न "के के विशुद्धयन्ति" के उत्तर में धुंधकारी जैसे पापात्मा दुराचारी को भी भागवत कथा सत्संग से भगवान की परम गति प्राप्त हुई, इस कथा का विधिवत वर्णन किया।

दासी पुत्र होकर भगवान की कृपा से नारद जी बने देवर्षि

वहीं बताया कि किस प्रकार नारद जी दासी पुत्र होकर के भी भगवान की कृपा से देवर्षि बने। ब्रह्माजी के मानस पुत्र के रूप में प्रकट होकर संसार में कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। कथा व्यास ने बताया कि अनुराग और विराग दोनों एक साथ नहीं हो सकते। संसार के साथ अनुराग और संसार के साथ विराग संभव नहीं। भगवान से अनुराग और संसार से विराग संभव है। अतः गृहस्थ को चाहिए कि संसार से विराग कर भगवान में अनुराग करें।

बबेरू में श्रीमद् भागवत कथा में मौजूद भक्त।
बबेरू में श्रीमद् भागवत कथा में मौजूद भक्त।

भगवान के चरणारविन्द पर मन लगाएं

गृहस्थ जीवन को छोड़कर भगवान के चरणारविन्दों पर मन लगाने के लिए कथा व्यास ने भक्तों को आहूत किया। कथा यजमान दरबारी कुशवाहा, श्रोता पंडित राम नरेश, रमाकांत त्रिपाठी, साकेत बिहारी, आशू शिवहरे, राम औतार कुशवाहा, शिवकुमार कुशवाहा, चुन्नू कुशवाहा और रामहित सहित नगरवासी माैजूद रहे।

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