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बलिया में जीयर स्वामी ने दिया जीवन का मंत्र:कहीं भी रहें, नहीं छोड़े अपना संस्कार और संस्कृति,उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

बलिया2 महीने पहले
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बलिया में जीयर स्वामी ने दिया जीवन का मंत्र - Money Bhaskar
बलिया में जीयर स्वामी ने दिया जीवन का मंत्र

बलिया। सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले का असम्भव काम भी सम्भव हो जाता है। प्रार्थना का लक्ष्य और उद्देश्य सही हो तो उसका सार्थक परिणाम निकलता है। शहर से करीब पांच किमी दूर जनाड़ी गांव में चल रहे श्रीलक्ष्मीनारायण महायज्ञ सह चतुर्मास व्रत में प्रवचन करते हुए महान संत त्रिदंडी स्वामी के शिष्य लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने कहा क भगवान भी भक्तों का मान रखने के लिये भाग्य में लिखीं हुई बातों को भी बदल देतें हैं।

कर्म के बगैर फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए
उन्होंने कहा कि मनुष्य को कर्म के बगैर फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इंसान को अपने लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। कहा की गृहस्थ रहते हुए भी पवित्र जीवन जीने वाला तथा सत्कर्म करने वाला व्यक्ति भगवत कृपा का पात्र होता है। भागवत को ही अमर कथा कहा जाता है। जब माता पार्वती ने भगवान शिव से कथा सुनने की जिद की तो वे उन्हें अमरनाथ लेकर गए। जहां कथा के दौरान सुखदेव जी महाराज ने उसका श्रवण किया। फिर उसे कालांतर में लिपिबद्ध किया गया।

चारों युगों को मिलाकर एक चतुर युग होता है
जीयर स्वामी ने कहा कि ईश्वर के प्रति निष्काम भाव से आत्मसमर्पण करना ही सच्ची भक्ति है। वैदिक सनातन मार्ग के पथ पर चलने वाला व्यक्ति स्वयं में पंडित होता है। कहा कि अपने गुरु, पति, बड़े पुत्र ,विद्वान पुरुष के लिए सदैव द्विवचन या बहुवचन का प्रयोग करना चाहिए। कहा कि चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलयुग की उम्र है। चारों युगों को मिलाकर एक चतुर युग होता है। दुनिया में चाहे कहीं भी रहे लेकिन अपने संस्कार और अपनी संस्कृति को छोड़ना नहीं चाहिये। अपने आचरण को शुद्ध रखिए यही आपकी पहचान है। कथा सुनने के लिये श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी रही।
बिहार आरा के बाद बलिया में हो रहा चतुर्मास व्रत
गंगा और तमसा के संगम तट से सटे जिस जगह पर जिस संत की प्रेरणा और सत्संकल्पों से विश्वप्रसिद्ध श्रीलक्ष्मीनारायण महायज्ञ हो रहा है, उनका पूरा नाम लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी है। यह रामानुज संप्रदाय के श्री वैष्णव संन्यासियों का पदनाम है। आम लोग उन्हें जीयर स्वामी के नाम से जानते हैं। वह वर्षाकाल में चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान करते हैं, जो परंपरा अब करीब-करीब लुप्त गयी है। सनातन धर्म में दंडी और त्रिदंडी संन्यासियों को चातुर्मास्य व्रत करना जरूरी होता है। कुछ साल पहले यह धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन साल 2017 में बिहार के आरा जनपद में हुआ था। इसके बाद अब फिर इस इलाके में इसका आयोजन हो रहा है।
त्रिदंडी स्वामी के शिष्य है जीयर स्वामी
जीयर स्वामीजी भारत के प्रसिद्ध वैष्णव संत श्री विष्वकसेनाचार्य (त्रिदंडी स्वामी) के शिष्य हैं। त्रिदंडी स्वामी ने जनपद से सटे बिहार के बक्सर को अपनी तप साधना का केन्द्र बनाया था, जो महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि के तौर पर विख्यात है। उन्होंने जीयर स्वामी यानी श्री लक्ष्मीप्रपन्न जी महाराज को अपना शिष्य बनाया। त्रिदंडी स्वामी ने संन्यास दीक्षा देकर श्री लक्ष्मीप्रपन्न जीयर स्वामी नामकरण किया। संन्यास दीक्षा के बाद जीयर स्वामी जप, तप, साधना और स्वाध्याय के कठिन मार्ग पर चलते हैं। वह घास-फूस की झोंपड़ी बनाकर रहते हैं। दिन में एक बार फलाहार करते हैं, वह भी सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले। पानी के रुप में केवल गंगाजल पीते है तथा बिस्तर के तौर पर भूमि पर कंबल बिछाकर सोते हैं। वह ऐसे संन्यासी हैं जो आज भी आधुनिक सुख-सुविधाओं से दूर हैं तथा पैसे-रुपये अथवा अन्य किसी भी द्रव्य को हाथ से स्पर्श तक नहीं करते।