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जान पर भारी पड़ी ये लापरवाही:हमारे पास स्ट्रेन जांचने की मशीनें तीन साल से सीलपैक, सैंपल पुणे भेजते रहे

जयपुरएक महीने पहले
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कोरोना से लड़ाई के लिए मुस्तैद मेडिकल फौज के अलावा हमारे पास मशीनें भी थीं, लेकिन हमने इस्तेमाल ही नहीं किया। - Money Bhaskar
कोरोना से लड़ाई के लिए मुस्तैद मेडिकल फौज के अलावा हमारे पास मशीनें भी थीं, लेकिन हमने इस्तेमाल ही नहीं किया।

राजस्थान ने कोरोना के दो गंभीर दौर झेले। यहां 80% संक्रमण और मौतें डेल्टा वैरिएंट की वजह से हुईं। वजह- वैरिएंट की पहचान के लिए हमें सैंपल पुणे या दिल्ली भेजने पड़े। रिपोर्ट आने में कई-कई दिन लगते और संक्रमण तेजी से फैलता जाता। हैरत की बात है कि हर तरह के जानलेवा वायरस के स्ट्रेन का पता लगाने वाली डीएनए जीनोम सीक्वेंसिंग मशीन दो साल से जोधपुर में पड़ी थी, लेकिन इसे खाेला तक नहीं।

यही नहीं दूसरी लहर में जयपुर ने भी ऐसी मशीन खरीदी। इसके अलावा ऐसी 25 मशीनें भी प्रदेश में 3 साल से सीलपैक हैं जो अलग-अलग बीमारियों का पहले ही पता लगा सकती हैं। यानी कोरोना से लड़ाई के लिए मुस्तैद मेडिकल फौज के अलावा हमारे पास मशीनें भी थीं, लेकिन हमने इस्तेमाल ही नहीं किया।

भास्कर ने इस बाबत जोधपुर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को बताया तो उन्होंने जांच की बात कही। यह भी कहा कि जीनोम सीक्वेंसिंग की एक और मशीन 3 करोड़ में खरीद रहे हैं। पुरानी मशीन एक पार्ट को ही डिटेक्ट करती है।

बेपरवाही.. उपयोग के लिए दो साल से पत्र लिख रहे हैं प्रभारी
मेडिकल रिसर्च यूनिट के प्रभारी डॉ. अनुराग सिंह ने डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज में प्रिंसिपल को 28 जनवरी 2020 व 28 अगस्त 21 को पत्र लिखे। इसमें उन्होंने मशीनों का उपयोग नहीं होने की बात कही। इस पर एडि. प्रिंसिपल डॉ. रीटा मीणा ने तीनों अस्पतालों के अधीक्षकों से उपकरणों की सूची मांगी थी।

पैक मशीनों संग महंगे डीप फ्रीजर भी बेकार पड़े
आईडी सेंटर काे कम्युनिकेबल और नॉन कम्युनिकेबल जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए खाेला गया, लेकिन इसे मशीन रखने का स्टोर बना दिया गया। जिसमें ऑटोक्लेव हॉरिजेंटल, बायोलॉजिकल सेफ्टी कैबिनेट, डबल डोर ऑटोक्लेव, इंक्यूबेटर ऐसी कई मशीनें बंद पड़ी है। कोई काम नहीं आ रही है।

दो डबल डोर के डीप फ्रीजर भी खरीदे गए थे, जिनकी कीमत करीब 5 लाख हैं, वह भी आईडी सेंटर में बिना काम पड़ा है। हाल यह है कि आईडी सेंटर में जनवरी से मार्च में काफी मशीनें आई इनकी कीमत लाखों में है, लेकिन अभी तक पैकिंग से खुली नहीं है और बंद आईडी सेंटर की प्रथम मंजिल पर धूल खा रही है।

एमआरयू लैब में ये मशीनें अनुपयोगी पड़ी
आरटीपीसीआर, माइक्रोटाेम, इलेक्ट्रोफोरिसिस, फ्लोरोसेंट माइक्रोस्कोप, -70 डिग्री डीपफ्रीजर, सेंटीफ्यूज, थर्मल साइकिलर, सेप्ट्रोफोटोमीटर, वाटर प्यूरीफिकेशन सिस्टम, इलेक्ट्रोफोरिसिस वेस्टन बलोटिंग, वेरेबल वोल माइक्रोपीपीटी, मिनी इलेक्ट्रोफोरिसिस सिस्टम।

वीआरडीएल लैब में ये मशीनें बंद पड़़ी
डीएनए जीन सिक्वेंसिंग और जेल डॉक। दोनों ही दो साल पहले तक की एडवांस मशीनें थी। जेल डॉक से वायरस का जेल डॉक्यूमेंटेशन किया जा सकता है। दोनों बेकार पड़ी है।

बड़ा सवाल है कि जब पहले से खरीदी मशीनें ही सीलपैक हैं तो नई मशीनों का कितना उपयोग होगा?
बहरहाल, बात यह है कि यहां करोड़ों की खरीद महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण मशीनों के उपयोग का है। अभी पांच विभागों की एनएमसी ने पीजी सीटों का आवंटन रोक दिया है, क्योंकि मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर्स के रिसर्च पेपर और स्टाफ की कमी है। अब सोचो जरा, यदि ये मशीनें काम ली जाती तो स्टॉफ भी होता और रिसर्च पेपर भी बनते।

गंभीर रोगी के इलाज के लिए बना आईडी सेंटर अभी स्टोर, मशीनें यहीं धूल खा रहीं

ऑटोक्लेव मशीन : 6 माह से पेटी पैक

लैब में काम आने वाले उपकरणों को स्टरलाइजेशन के लिए उपयोग में आती है। इसको खरीदे हुए करीब एक साल से अधिक का समय हो गया है। वर्तमान में पिछले छह माह से पैक ही इंफेक्शन डिजीज सेंटर में रखा हुआ है।

जीनोम सीक्वेंसिंग : 1.50 करोड़ खर्चे, काम में नहीं ली

किसी भी बीमारी का जीन और वायरस का स्ट्रेन पता लगाने के लिए यह उपयोगी होती है। इसकी कीमत करीब 1.50 करोड़ रु. है। लेकिन कभी काम में नहीं ली गई।

बैटेकरलॉजिकल इंक्यूबेटर: अभी पैकिंग तक नहीं उतरी

सैंपल का कल्चर करते वक्त जो प्लेट काम में ली जाती है उनको 37 डिग्री टेम्प्रेचर में इंक्यूबेट करने की मशीन। एक साल से अधिक का समय से काम में नहीं ली गई।

सीधी बात- डाॅ. एसएस राठौड़, प्रिंसिपल, मेडिकल कॉलेज

महत्वपूर्ण मशीनें काम लिए बिना बंद क्यों पड़ी है?
- विभागाध्यक्षाें को काम में लेने के लिए कहा है।

आईडी सेंटर में लाखों की मशीनें धूल खा रही हैं, उसके लिए कौन जिम्मेदार है?
- आईडी सेंटर तो अभी शुरू किया जाएगा। इसके लिए वहां मशीनें रखी गई है।

2018 में आई मशीनें भी अब तक काम में नहीं आई तो नई क्यों खरीद रहे हैं ?
पहले वाले जीन सीक्वेंसर में एक ही पार्ट की जांच होती थी, इसलिए नई खरीदना चाहते हैं। ऐसा माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष ने बताया है।