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महिला मंत्री के खिलाफ MLA का दांव नहीं चला:नेता की कंपनी के कारण बदला तेजतर्रार मंत्री का विभाग, मुखिया ने सलाहकार से पूछा- खाना खा लूं?

जयपुर6 महीने पहलेलेखक: गोवर्धन चौधरी
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  • हर शनिवार पढ़िए राजनीति और ब्यूरोक्रेसी से जुड़े रोचक किस्से

मंत्रिमंडल फेरबदल में एक महिला विधायक को राज्य मंत्री बनाने से दो जिलों की राजनीति गर्मा गई है। महिला मंत्री के धुर विरोधी एक विधायक से यह सियासी अन्याय देखा नहीं गया और तत्काल प्रदेश के मुखिया से मिलने का वक्त मांग लिया। वक्त मिल भी गया। नाराज विधायक ने मंत्री के खिलाफ शिकायतों का पूरा पुलिंदा सीएम के सामने रख दिया, लेकिन तीर कमान से निकल चुका था। जब हटाने पर बात नहीं बनी तो सारे विधायक अड़ गए कि जो हुआ सो हुआ, अब विभाग ढंग का नहीं मिलना चाहिए। विधायक के इस क्विक एक्शन का भी असर नहीं हुआ, विभाग भी अच्छा मिल गया। शिकायत करने वाले विधायक खुद भी मंत्री पद के दावेदार हैं, उन्हें अब भी इंतजार है।

मंत्री के रिश्तेदार को FIR करवाने MLA से कहना पड़ा
पूर्वी राजस्थान से जुड़े एक मंत्री को पिछले दिनों अजीब स्थिति से दो चार होना पड़ा। मंत्रीजी के किसी रिश्तेदार को थाने में एफआईआर करवानी थी, लेकिन पुलिस ने पेच फंसा दिया। रिश्तेदार ने मंत्रीजी का हवाला दिया लेकिन पुलिस ने एक नहीं सुनी। थक हारकर मंत्री के रिश्तेदार ने एमएलए से फोन करवाया, तब जाकर एफआईआर हुई। मंत्री का हाल ही में राज्य मंत्री से कैबिनेट में प्रमोशन हुआ है। मामला मंत्री के क्षेत्र के पड़ोस का था, लेकिन चली विधायक की ही। इस घटना के बाद लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं। अब बात चाहे जो करें लेकिन इस राज में सरकार को ऑक्सीजन देने वाले विधायक मंत्री पर तो भारी ही होंगे।

कमजोर विभाग क्यों मिला

एक तेजतर्रार मंत्री को कमजोर विभाग मिलने के बाद सियासी हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। पड़ताल में कुछ रोचक कारण निकले हैं। बताया जाता है कि मंत्रीजी ने विभाग के टेंडर से जुड़े मामले में एक कंपनी विशेष के खिलाफ नोटशीट लिख दी। इसमें मंत्रीजी के सलाहकार का बड़ा रोल था, क्योंकि सलाहकार ने बिना आगा-पीछा देखे कंपनी के खिलाफ सलाह दी थी, जिसे मंत्रीजी ने नोटशीट पर उतार दिया। यह बात दिल्ली तक पहुंची और खूब बवाल हुआ। जिस कंपनी के खिलाफ नोटशीट लिखी गई, वह सत्ताधारी पार्टी के एक बड़े नेता से जुड़ी थी। कंपनी का फेवर करना था और कर दिया विरोध। विभाग बदलने में इस कांड का भी बड़ा रोल बताया जा रहा है। इसीलिए कहते हैं न राजनीति में दुश्मन से भी ज्यादा घातक तो सलाहकार होते हैं।

नेताजी की चैंजिंग इच, हर 45 दिन में नया ड्राइवर

सरकारी संसाधनों को काम लेने के कुछ घोषित-अघोषित नियम चिरकाल से चले आ रहे हैं। सरकारी गाड़ी इस्तेमाल करने वाले पुराने नेता जानते हैं कि मोटर गैराज के ड्राइवरों से पंगा नहीं लेना चाहिए। पहली बार मंत्री बने और अब बाहर हुए एक नेताजी ने इन स्थापित नियमों का ध्यान नहीं रखा। अब सामने आया है कि नेताजी 34 महीने मंत्री रहे और 21 से ज्यादा ड्राइवर बदल लिए, इतनी जल्दी बदलाव यूं तो किया नहीं होगा, इसके कारण बड़े अजीब हैं। जो किस्से कहानियां बाहर आ रहे हैं, वे किसी भी नेता के लिए अच्छे नहीं हो सकते। परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है वाली कहावत को नेताजी ने कुछ ज्यादा ही अपना लिया, लेकिन चैंजिंग इच के साइड इफेक्ट अब सामने आने शुरू हुए हैं। जिस जिस नेता ने मोटर गैरेज के ड्राइवरों से पंगा लिया पद से हटने के बाद उन्होंने सूद सहित बदला लिया है, इसकी शुरुआत हो चुकी है। आगे भी कई किस्से आने बाकी है।

प्रदेश के मुखिया ने सलाहकार से क्या कहा?
मंत्रिमंडल फेरबदल के बाद पिछले दिनों प्रदेश के मुखिया राजधानी के एक शादी समारोह में गए। उसी दिन छह सलाहकार बने थे, वहां पर उनके नए बने एक युवा सलाहकार भी थे। नए-नए सलाहकार बने विधायक की साहब ने खूब चुटकी ली। शादी में भोजन का समय आया तो उन्होंने सलाहकार से पूछ लिया कि खाना खा लूं क्या? यही नहीं बैठने और घर जाने के लिए भी सलाहकार से पूछा। इस पूरे वाकये को कई लोगों ने देखा और खूब चुटकी ली। सलाहकार को संबांधित करके जो बातें मुखिया ने कही उनका सियासी मर्म जानने की सब कोशिश कर रहे हैं। इसे विरोधी भी अब खूब भुना रहे हैं। इस घटना से अंदाज लग गया कि सलाहकारों की सलाह का क्या होने वाला है?

मान न मान मैं कैबिनेट मंत्री

सलाहकार बनाए गए विधायकों में से एक ने खुद को कैबिनेट मंत्री कहना शुरू कर दिया है। नेताजी ने अब पोस्टर में भी खुद को सलाहकार के साथ ब्रेकेट में कैबिनेट मंत्री लिखवाना शुरू कर दिया है। हालांकि अब तक तो नियुक्ति के ही आदेश नहीं निकले है। मंत्री का दर्जा तो दूर की बात है। आदेश निकलने में कई पेच अटक गए हैं। इस बात की भी संभावना है कि पूरा कार्यकाल ही बिना मंत्री का दर्जा लिए निकालना पड़े। राहत की बात इतनी सी है कि सीएमओ में बैठने की जगह मिलने से रुतबा बन जाएगा।

जेडीसी बनने की रेस में दो अफसर
जयपुर में जेडीसी का पद हाई प्रोफाइल माना जाता है। जेडीसी बदलने की चर्चाओं के बीच दो अफसर इसकी दौड़ में है। एक अफसर सत्ता के बड़े घर की पसंद हैं। सत्ता के बड़े केंद्र के बड़े अफसर अपने नजदीकी को इस पद पर लाना चाहते हैं। इन दिनाें सरकार की कमाई वाले विभाग को संभाल रहे हैं। रेस में शामिल दूसरे अफसर को सरकार के संकट मोचक मंत्री लाना चाहते हैं। ये अफसर मंत्री के जिले में रह चुके हैं और इस विभाग का पहले अनुभव ले चुके हैं। अब जेडीसी बदलने पर ही तय होगा कि सत्ता के बड़े घर में बैठे अफसर की चली है या संकट मोचक मंत्रीजी की।

बड़े अफसर का सेंट्रल डेपुटेशन क्यों रुका?
पिछले राज में सत्ता के चहेते रहे एक बड़े अफसर की साल भर से सेंट्रल पोस्टिंग अटकी हुई है। राज्य सरकार ने सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की मंजूरी दे दी लेकिन दिल्ली में उनके लिए पद नहीं मिल रहा। बड़े अफसर पिछले राज में सत्ता के चहेते रहे हैं। बताया जाता है कि यही बात उनकी पोस्टिंग में आड़े आ रही है।

इलेस्ट्रेशन : संजय डिमरी

वॉइस ओवर: प्रोड्यूसर राहुल बंसल

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