पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Market Watch
  • SENSEX58461.291.35 %
  • NIFTY17401.651.37 %
  • GOLD(MCX 10 GM)47394-0.41 %
  • SILVER(MCX 1 KG)60655-1.89 %

भास्कर एक्सप्लेनर:महिला आयोग के अध्यक्ष पद की नियुक्ति में देरी क्यों, डोटासरा के बयान के बाद गरमाया मुद्दा

जयपुरएक महीने पहलेलेखक: करिश्मा वर्मा
  • कॉपी लिंक

महिला शिक्षकों को झगड़ालू बताने वाले शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा के विवादित बयान के बाद खाली पड़े महिला आयोग अध्यक्ष पद का मुद्दा भी गरमा गया है। राज्य महिला आयोग में पिछले तीन साल से अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। NCRB के आंकड़े बताते हैं कि रेप के मामलों में राजस्थान पहले स्थान पर है। फिर भी महिला उत्पीड़न, छेड़छाड़ और रेप जैसे मामलों में त्वरित न्याय के लिए गठित आयोग के खाली पड़े पदों पर नियुक्तियां नहीं करने पर सरकार विपक्ष और सामाजिक संगठनों के निशाने पर है। नियुक्तियां नहीं होने के पीछे भले ही कांग्रेस की अंदरुनी सियासी खींचतान को माना जा रहा है, लेकिन इसका खामियाजा लाचार पीड़िताओं को उठाना पड़ रहा है।

केवल एक अफसर और कर्मचारियों के सहारे महिला आयोग
2018 में सरकार बदलने के बाद से महिला आयोग में अध्यक्ष और सदस्य नहीं होने से पीड़ित महिलाओं की सुनवाई नहीं हो पाती। महिला आयोग में फिलहाल सचिव के पद पर एक RAS अफसर तैनात हैं और कुछ कर्मचारी। अध्यक्ष और सदस्यों के बिना आयोग में फैसले नहीं हो पा रहे। जिला स्तर पर होने वाली सुनवाई भी ठप है।

आखिर सरकार ऐसे पद खाली क्यों रखती है?
दरअसल महिला आयोग सहित अन्य आयोगों के पदों पर सरकार पार्टी के कार्यकर्ता और नेताओं को नियुक्त करती है, जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाती, किसी चुनाव में टिकट नहीं मिल पाता, या कोई बड़ा नेता सत्ता या संगठन में किसी पद से वंचित रह जाता है। ऐसे नेताओं की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें आयोग या बोर्ड में नियुक्तियां दी जाती हैं। यही वजह है कि ऐसे आयोग में कुछ पदों को रिक्त रखा जाता है। इससे सरकार अपने जातिगत से लेकर तमाम तरह के गणित भी साधती है।

राजस्थान में बाल संरक्षण आयोग, राज्य मानवाधिकार को छोड़ दें तो बाकी 8 आयोग अभी भी खाली ही चल रहे हैं। चाहे वह राज्य महिला आयोग हो या ओबीसी कमीशन आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आयोग, सफाई कर्मचारी आयोग, विमुक्त घुमंतू आयोग, राज्य विकलांग आयोग बिना अध्यक्ष और सदस्यों के चल रहे हैं। इन्हें सरकार तीन साल में भी नहीं भर पाई है। ऐसे में इन आयोगों के गठन और साख दोनों ही सवालों के घेरे में है।

शिकायतों का अंबार
राजस्थान महिला आयोग में करीब 150 शिकायतें लंबित चल रही हैं। फुल कमीशन नहीं होने की वजह से सुनवाई नहीं हो पा रही है। तीन साल पूर्व जब आयोग के पास अध्यक्ष और सदस्य थे, तब महीने में 10 से 12 शिकायतें पहुंचती थीं, लेकिन अब केवल एक या दो ही केस आ रहे हैं। इन मामलों पर आयोग के सचिव संबंधित अधिकारी को पत्र लिखकर महज खानापूर्ति ही कर रहे हैं।

न तो पीड़िता की कोई काउंसलिंग होती है और न उसे किसी तरीके से त्वरित न्याय मिल पाता है। यहां तक कि आयोग के सचिव के पास वो संवैधानिक अधिकार ही नहीं होते जो आयोग के अध्यक्ष के पास होते हैं। ऐसे में जिस मजबूती के साथ पीड़िता को न्याय और आरोपी को सजा दिलाई जा सकती थी, वह नहीं हो पा रहा। यही वजह है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक संगठन भी आयोग के पास कोई केस नहीं भेजते।

नियुक्ति नहीं होने के पीछे क्या सियासत है?
आयोग में पदों को न भरने के पीछे बड़ी वजह प्रदेश में चल रही सियासी खींचतान को भी माना जा रहा है। जगजाहिर है कि सरकार के गठन के बाद से ही पूर्व पीसीसी अध्यक्ष और डीप्टी सीएम सचिन पायलट और सीएम अशोक गहलोत के बीच स्थितियां सामान्य नहीं हो पाई। हमेशा से दो गुट रहे। सियासी संकट की स्थिति भी आई। तब से आज तक आयोग के अध्यक्षों को लेकर किसी गुट में सहमति नहीं बन पाई। नतीजा ये रहा कि आयोग जो कार्य करते थे, वे सब ठप हो गए। अब आम जनता को इसका खामियाजा उठाना पड़ रहा है।

सरकार ने कोई आवेदन ही नहीं मंगवाए
राज्य में आयोग के अध्यक्षों के लिए सरकार खुले आवेदन के लिए विज्ञप्ति निकालती है। महिला आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए महिला विकास मंत्रालय इस काम को करता है। आवेदक को 10 से 15 दिन का समय दिया जाता है। इसके बाद नियुक्ति का अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री ही अपने विवेक के आधार पर लेता है, लेकिन वर्तमान में राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष के लिए सरकार के स्तर पर कोई भी आवेदन नहीं मांगा गया।

राजस्थान में कांता कथूरिया के कार्यकाल में लागू हुई थी पहली महिला नीति।
राजस्थान में कांता कथूरिया के कार्यकाल में लागू हुई थी पहली महिला नीति।

कितना ताकतवर है महिला आयोग
आयोग के अध्यक्ष के पास संवैधानिक अधिकार होते हैं। किसी भी पीड़िता के न्याय के लिए आयोग अधिकारियों को कार्रवाई करने के लिए निर्देशित करता है। समय अवधि में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की रिपोर्ट भी तलब करता है। अगर कोई अधिकारी या कर्मचारी आयोग के आदेश की पालना नहीं करता है तो आयोग उसके खिलाफ सरकार के स्तर पर कार्रवाई करने की अनुशंसा भी करता है। आयोग जितना सक्रिय रहता है उतनी जल्दी पीड़िताओं को न्याय मिलने की संभावना होती है।

जब आयोग ने बिना किसी दबाव के काम किया
राज्य महिला आयोग का पहली बार गठन अशोक गहलोत के पहले शासनकाल में 15 मई 1999 में हुआ था। तब कांता कथूरिया को इसका अध्यक्ष बनाया गया था। उन्होंने राजस्थान में पहली बार महिला नीति लागू करने पर काम किया, जो अपने आप में महिलाओं के अधिकारों और उनके संरक्षण के मील का पत्थर साबित हुई।

इसी तरह से तारा भंडारी ने आयोग की अध्यक्ष रहते हुए वनस्थली विद्यापीठ में छात्राओं की आत्महत्या के मामले पर विद्यापीठ प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। तारा भंडारी के कार्यकाल में तत्कालीन मुख्य सचिव ओपी मीणा के ऊपर उनकी बेटी द्वारा सेक्सुअल हैरेसमेंट का मामला भी दर्ज कराया था। उसमें भी आयोग ने बिना किसी दबाव में आकर निष्पक्ष कार्रवाई के लिए पुलिस को पाबंद किया था।

शिक्षा मंत्री के बयान पर सुमन शर्मा का पलटवार।
शिक्षा मंत्री के बयान पर सुमन शर्मा का पलटवार।

भाजपा की सरकार में भी 2 साल खाली रहा था पद
महिला अत्याचार के मामले में राजस्थान पहले पायदान पर आने के बाद विपक्षी दल बीजेपी लगातार इसे मुद्दा बना रही है। बीते तीन सालों में राज्य महिला आयोग में नियुक्तियों को लेकर भी लगातार निशाने पर हैं, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के दूसरे कार्यकाल में लाड कुमारी जैन के आयोग के अध्यक्ष पद को छोड़ने के बाद लगभग 2 साल तक यह पद खाली रहा था। उसके बाद सुमन शर्मा को 2015 में अध्यक्ष नियुक्त किया गया।