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मंडे स्पेशल11 दूल्हे-दुल्हनों के सामूहिक धर्म बदलने का सच:दूल्हों ने बताया क्यों नहीं लिए 7 फेरे, क्या गरीबी के कारण बदला धर्म?

जयपुर2 महीने पहलेलेखक: रणवीर चौधरी
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बारां में 250 दलित परिवारों के धर्म परिवर्तन की खबरों के बाद 22 नवंबर को एक और खबर भरतपुर से आई। यहां 11 हिंदू जोड़ों की सामूहिक शादी में जो कसमें दिलाई गई, उसको लेकर बवाल खड़ा हो गया। दूल्हे-दुल्हनों से 7 फेरों की बजाय हिंदू देवी-देवताओं को नहीं मानने जैसी 22 प्रतिज्ञा दिलाई गईं।

इसका एक VIDEO भी सामने आया, जिसमें 11 जोड़े.....'मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में आस्था नहीं रखूंगा। मैं राम को ईश्वर नहीं मानूंगा और उनकी पूजा नहीं करूंगा' जैसी बातें दोहराते हुए दिखाई दे रहे थे।

वीडियो वायरल होने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ा। हिंदू संगठन इसके विरोध में उतरे। आरोप लगाया कि गरीब लोगों के मजबूरी का फायदा उठाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ जहर उगला जा रहा है। विश्व हिंदू परिषद का दावा है कि कई संगठन फंड लेकर गरीबी का फायदा उठाकर लोगों का धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं।

जिस सामूहिक विवाह सम्मेलन में यह सब हुआ, उसमें स्थानीय अधिकारी भी शामिल हुए थे। प्रशासन की नाक के नीचे हुए इस विवाह सम्मेलन की ग्राउंड रिपोर्ट करने भास्कर टीम भरतपुर जिले कुम्हेर कस्बे में पहुंची। हमने हिंदू धर्म छोड़कर 22 शपथ लेने वाले दूल्हे-दुल्हनों से लेकर आयोजन करने वाले पदाधिकारियों से बातचीत की।

इसके बाद जो सच सामने आया वो कुछ और ही बयां कर रहा था, जो तीन कहानियां सामने आईं, आपको बताते हैं.....

जिन जोड़ों की शादी करवाने के बाद उनसे अपने ही धर्म के खिलाफ 22 प्रतिज्ञाएं दिलवाई गई, उनमें से कुछ को इस बात की बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी। शपथ सिर्फ इसलिए ली क्योंकि समिति वालों ने उनकी शादी करवाई थी। कई जोड़े ऐसे थे जिन्हें धर्म के बारे में कोई ज्ञान भी नहीं था। बौद्ध धर्म में भी ऐसी कोई प्रतिज्ञाएं नहीं, जो हिंदू या किसी धर्म के खिलाफ हों।

तो फिर 11 दूल्हे-दुल्हन के धर्म परिवर्तन करने का सच क्या है? सबसे पहले भास्कर टीम ने आयोजन समिति से बात कर विवादित कार्यक्रम की पूरी जानकारी जुटाई....

क्या था कार्यक्रम?
भरतपुर के कुम्हेर कस्बे में 20 नवंबर को संत रविदास सेवा समिति की ओर से 11 जोड़ों का सामूहिक विवाह समारोह करवाया गया। समिति के संरक्षक गिरधारीलाल बैरवा ने बताया कि यह उनका 5वां आदर्श सामूहिक विवाह सम्मेलन था। इस आयोजन में कैबिनेट मंत्री विश्वेन्द्र सिंह, भरतपुर मेयर, जिला कलेक्टर से लेकर 20 से ज्यादा अधिकारियों को भी निमंत्रण दिया गया था। निमंत्रण मिलने के बाद मंत्री विश्वेन्द्र सिंह सहित कई अधिकारी उनके प्रोटोकॉल में पहुंचे थे, लेकिन जो शपथ दिलाई गई उसका पूरा कार्यक्रम मंत्री और अधिकारियों के जाने के बाद हुआ। बाकायदा इसकी वीडियो भी बनाई गई, जो बाद में कई व्हाट्सएप ग्रुपों में वायरल हुई।

सभी दुल्हनों को सोने की बालियां, चांदी का मंगलसूत्र, हाथ की अंगूठी, कमर की कोंदनी, तोरिया, दूल्हे के हाथ की अंगूठी, चांदी का सिक्का और घड़ी दी गई। कई भामाशाहों में से किसी ने खाने का खर्च, फर्नीचर, अलमारियां देकर मदद की। हर पक्ष से करीब 30 से 40 लोगों को खाने में बुलाने की अनुमति थी।

शादी के कार्ड पर दूल्हा-दुल्हन के नाम नहीं
सामूहिक विवाह समारोह में समिति वालों ने जोड़ों को शादी के कार्ड प्रिंट करवाए थे। शादी के कार्ड में मुख्य अतिथि, अतिथि, आयोजकों के नाम, सदस्यों के नाम प्रिंट करवाएं गए। दूल्हा-दुल्हन के नाम नहीं छपवाए गए। जोड़े को अपने रिश्तेदार और दोस्तों को बुलाने के लिए 30 से 40 कार्ड दिए गए। ज्यादातर लोगों ने रिश्तेदारों को फोन करके ही बुलाया।

आयोजन समिति से बातचीत करने से पहले भास्कर टीम उन दूल्हे और परिवारों के घर पहुंची, जिनके धर्म परिवर्तन को लेकर दावा किया गया। ज्यादातर लोग कैमरे पर बोलने के लिए तैयार नहीं हुए। काफी समझाने के बाद दो लोगों ने बातचीत की....

'किसी ने विरोध नहीं किया तो मैं भी चुप रहा.....'

हिंदू धर्म में दूल्हा-दुल्हन सात फेरे लेकर शादी करते हैं। पहले दुल्हन और फिर दूल्हा आगे रहकर फेरे लेते हैं। तभी शादी को पूरा माना जाता है, लेकिन समिति के आयोजन में वरमाला पहना कर शादी करवाई हुई। उनमें तुईया गांव का दूल्हा विपिन भी था। भास्कर टीम उनके घर पहुंची तो एक अलमारी में हिंदू देवी-देवता की तस्वीर अभी भी लगी हुई थी। एक तरफ तो हनुमान और दूसरी तरफ श्रीराम की दो तस्वीरों के बीच किसी महाराज की फोटो भी थी।

22 साल के विपिन ने बताया कि समारोह में हिंदू जोड़ों की शादी बौद्ध धर्म के अनुसार करवाई गई। मैं भी सात फेरे लेकर शादी करना चाहता था। लेकिन जब दूसरे दूल्हों ने विरोध नहीं किया तो मैं भी चुपचाप उनके बताए अनुसार शादी करता रहा। विपिन ने बताया कि महज वरमाला पहनाकर हमारी शादी कराई गई। इसके बाद 22 प्रतिज्ञाओं की शपथ दिलाई गई। समिति की ओर से जब कार्यक्रम खत्म हो गया तो ससुराल पक्ष से एक महिला मंगलसूत्र लेकर आई। मैंने पत्नी को मंगलसूत्र पहनाकर हिंदू रीति रिवाज के मुताबिक मांग भी भरी।

घर आकर की देवी-देवताओं की पूजा
विपिन ने बताया कि वह एक दुकान में काम करते हैं जहां उन्हें कुछ हजार रुपए सैलरी मिलती है। विवाह समारोह के लिए 11 हजार रुपए देकर रजिस्ट्रेशन करवाया था। मेरी पत्नी के पिता ने भी इतने ही रुपए जमा करवाए थे। शादी का आयोजन कैसे हुए हमें इससे मतलब नहीं था। न ही किसी प्रकार की हमें सूचना दी गई थी कि इस तरह से शपथ दिलाई जाएगी। जैसे ही उनका समारोह समाप्त हुआ, इसके बाद हम इंतजार कर रहे थे घर जाने का। ताकि जल्दी से जल्दी घर जाकर हमारी परंपराओं के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा अर्चना कर सकें। घर आकर हमने हिंदू रीति रिवाज से भगवान की पूजा अर्चना की और शादी के बाद की सभी रस्में निभाई।

'हमारे माता-पिता हिंदू थे.....'
सामूहिक विवाह समारोह में कुम्हेर गांव की रहने वाले प्रमोद भी दूल्हा बने थे। उनकी शादी सकीना से हुई। समिति वालों ने ही लड़की दिखाई थी। दोनों पक्षों से 11-11 हजार रुपए लिए गए। शादी के बाद उन्हें सारा दहेज दिया गया। प्रमोद से जब हमने पूछा कि शादी के दौरान क्या शपथ दिलाई गई। तो वे इसका जवाब नहीं दे पाए। हमारा दूसरा सवाल था क्या आप उन शर्तों का समर्थन करते हैं जो आपसे दिलाई गई।

इसी बातचीत के दौरान प्रमोद के बड़े भाई संदीप कुमार बीच में बोल पड़े। पेशे से एडवोकेट संदीप कुमार ने बताया कि उनके पिता सुरेश चंद और माता माया देवी वर्मा हिंदू हैं और वे भगवान को मानते हैं। लेकिन मैं और मेरी पत्नी ने बौद्ध धर्म अपना लिया। सामूहिक विवाह में मेरे भाई ने भी बौद्ध धर्म की शपथ ली थी। हमारे साथ-साथ अब वो भी बौद्धिस्ट हो गया है। हमारे घर में अब देवी-देवताओं की कोई मूर्ति नहीं है।

राम-सीता कौन और बौद्ध धर्म क्या है, किसी को नहीं जानकारी
संदीप कुमार ने बताया कि राम-सीता कौन हैं, अब हम नहीं जानते। संदीप ने दावा किया कि उनके पूरे मोहल्ले में होली-दिवाली का त्योहार नहीं मनाया जाता। मोहल्ले में करीब 150 से ज्यादा घर है। हमारा समाज अंधविश्वास के कारण बहुत पीछे रह गया। इसलिए अब हमारे पूरे मोहल्ले में त्योहार की जगह सिर्फ बाबा भीमराव अंबेडकर की जयंती ही मनाते हैं।

बौद्ध धर्म क्या है? उसके मूल्य, विचार, नियम के बारे में पूछने पर संदीप काफी देर तो चुप रहे। थोड़ी देर सोचने के बाद ज्यादा कुछ नहीं बता पाए। अधिकतर लोगों को सिर्फ 22 प्रतिज्ञाएं याद हैं, जिनका बौद्ध धर्म एक्सपर्ट के मुताबिक कहीं भी जिक्र नहीं है। कुछ लोगों बिना कैमरे पर आने की शर्त पर बातचीत करने के लिए तैयार हुए। लेकिन ज्यादातर लोग बौद्ध धर्म और मुख्य ग्रंथ के बारे में कुछ भी नहीं बता सके।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद दिलाई शपथ
संत रविदास समिति के प्रदेश अध्यक्ष लालचंद तेलगुरिया ने कहा कि शादी में हमने बाबा अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाओं की शपथ दिलाई थी। समिति ने दावा किया कि यह वहीं 22 प्रतिज्ञाएं हैं, जो नागपुर में 15 अक्टूबर 1956 को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ली थी। इस पर किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी। मैं खुद 2008 से पहले आरएसएस (संघ) से जुड़ा था, लेकिन बाद में बौद्ध धर्म को मानने लगा।

शादी समारोह में दिलाई गई ये 22 शपथ
1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में आस्था नहीं रखूंगा और उनकी पूजा नहीं करूंगा।
2. मैं राम और कृष्ण में आस्था नहीं रखूंगा, जिन्हें भगवान का अवतार माना जाता है। मैं इनकी पूजा नहीं करूंगा।
3. गौरी, गणपति और हिंदू धर्म के दूसरे देवी-देवताओं में न तो आस्था रखूंगा और न ही इनकी पूजा करूंगा।
4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता।
5. मैं न तो यह मानता हूं और न ही मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे। मैं इसे दुष्प्रचार मानता हूं।
6. मैं न तो श्राद्ध करूंगा और न ही पिंड दान दूंगा।
7. मैं कोई ऐसा काम नहीं करूंगा, जो बुद्ध के सिद्धांतों और उनकी शिक्षाओं के खिलाफ हो।
8. मैं ब्राह्मणों के जरिए कोई आयोजन नहीं कराऊंगा।
9. मैं इंसानों की समानता में विश्वास करूंगा।
10. मैं समानता लाने के लिए काम करूंगा।
11. मैं बुद्ध के बताए अष्टांग मार्ग पर चलूंगा।
12. मैं बुद्ध की बताई गई पारमिताओं का अनुसरण करूंगा।
13. मैं सभी जीवों के प्रति संवेदना और दया भाव रखूंगा। मैं उनकी रक्षा करूंगा।
14. मैं चोरी नहीं करूंगा।
15. मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
16. मैं यौन अपराध नहीं करूंगा।
17. मैं शराब और दूसरी नशीली चीजों का सेवन नहीं करूंगा।
18. मैं अपने रोजाना के जीवन में अष्टांग मार्ग का अनुसरण करूंगा, सहानुभूति और दया भाव रखूंगा।
19. मैं हिंदू धर्म का त्याग कर रहा हूं जो मानवता के लिए नुकसानदेह है। मानवता के विकास और प्रगति में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर टिका है। मैं बौद्ध धर्म अपना रहा हूं।
20. मेरा पूर्ण विश्वास है कि बुद्ध का धम्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है।
21. मैं मानता हूं कि मेरा पुनर्जन्म हो रहा है।
22. मैं इस बात की घोषणा करता हूं कि आज के बाद मैं अपना जीवन बुद्ध के सिद्धांतों, उनकी शिक्षाओं और उनके धम्म के अनुसार बिताऊंगा।

संत रविदास समिति के संयोजक गिरधारी लाल बैरवा ने कहा कि हमारी समिति का उद्देश्य केवल गरीब लोगों के बच्चों की सामूहिक शादी करवाना था। हमने किसी का धर्म परिवर्तन नहीं करवाया है। अगर किसी की भावना आहत हुई है तो क्षमा प्रार्थी हूं।

भास्कर टीम इस आयोजन से जुड़ा तीसरा पक्ष जानने के लिए उन संगठनों से जुड़े पदाधिकारियों के पास पहुंची, जहां विरोध है। इस दौरान विश्व हिंदू परिषद के प्रांत सेवा प्रमुख नरेश खंडेलवाल और विभाग मंत्री सिद्धार्थ सिंह फौजदार से बात की....

नरेश खंडेलवाल ने बातचीत में आरोप लगाया कि कुछ लोग फंड लेकर हिंदुओं को दूसरे धर्मों में परिवर्तित करना चाहते हैं। यह रिकॉर्ड में धर्म परिवर्तन नहीं होता। पैसे के लिए दूसरे धर्म को मानने का दिखावा करते हैं और रिकॉर्ड में अपने जाति प्रमाण पत्र में कभी बदलाव नहीं करते। जाति प्रमाण पत्र में धर्म बदलने पर उन्हें आरक्षण जैसे चीजों का फायदा नहीं मिलता है, इसलिए रिकॉर्ड में कभी नहीं लिखवाते। हिन्दू धर्म को अंधविश्वास बताकर ये गरीब लोगों को झांसे में लेते हैं। कई लोग मजबूरियों के चलते इनके झांसे में आ जाते है।

आरक्षण के लिए डॉक्यूमेंट में हिंदू और समाज में बुद्धिस्ट
सिद्धार्थ सिंह फौजदार ने बताया कि कुम्हेर में कई हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना रहे हैं। समाज में दिखावे के लिए बोद्ध धर्म अपना रहे हैं। लेकिन आरक्षण के लाभ के लिए डॉक्यूमेंट्स में आज भी हिंदू हैं। सामूहिक विवाह में अधिकतर दूल्हे-दुल्हन ने अपने नाम के आगे बुद्धिस्ट लगाकर बौद्ध धर्म के अनुसार वरमाला पहना कर शादी की। वे अपनी पहचान भी बुद्धिस्ट बताते हैं। जाति प्रमाण पत्र में आरक्षण से वंचित नहीं हो इसके लिए वे अपने पहचान पत्र में धर्म को परिवर्तित नहीं करवा रहे है। आधार कार्ड, मूल निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र में आज भी हिंदू है।

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