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जब 6 हजार चीनी सैनिक से भिड़ गए थे जवान:परमवीर मेजर शैतान सिंह कर रहे थे 120 जवानों का नेतृत्व, अपने दम पर चीनी सेना से लड़े

जयपुर6 महीने पहलेलेखक: डीडी वैष्णव
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1962 के युद्ध में 13 कुमाऊं दस्ते का यह अंतिम मोर्चा था। इसीलिए इसे रेजांग ला युद्ध के नाम से जाना जाता है। - Money Bhaskar
1962 के युद्ध में 13 कुमाऊं दस्ते का यह अंतिम मोर्चा था। इसीलिए इसे रेजांग ला युद्ध के नाम से जाना जाता है।

परमवीर मेजर शैतान सिंह, जिन्हें मरणोपरांत देश का सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी आज जयंती है। उनका पराक्रम आज भी भारतीय सेना के इतिहास का गौरवशाली हिस्सा है। बात 18 नवंबर, 1962 की है। 03.30 बजे तड़के सुबह घाटी का शांत माहौल गोलीबारी और गोलाबारी से गूंज उठा। बड़ी मात्रा में गोला-बारूद और तोप के साथ चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के करीब 5,000 से 6,000 जवानों ने लद्दाख पर हमला कर दिया था।

मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व वाली 13 कुमाऊं की एक टुकड़ी चुशुल घाटी की हिफाजत पर तैनात थी। भारतीय सैन्य टुकड़ी में मात्र 120 जवान थे जबकि दूसरी तरफ दुश्मन की विशाल फौज। ऊपर से बीच में एक चोटी दीवार की तरह खड़ी थी जिसकी वजह से हमारे सैनिकों की मदद के लिए भारतीय सेना की ओर से तोप और गोले भी नहीं भेजे जा सकते थे। अब 120 जवानों को अपने दम पर चीन की विशाल फौज और हथियारों का सामना करना था। 13 कुमाऊं के वीर सैनिकों ने जो संभव हो सका, उतना ही सही जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा और गोलियों की बौछार के बीच एक प्लाटून से दूसरी प्लाटून जाकर सैनिकों का नेतृत्व किया। मेजर को लगा कि उन सैनिकों की जान भी खतरे में है, इसलिए उन दोनों को पीछे जाने का आदेश दिया। मगर उन सैनिकों ने उन्हें एक पत्थर के पीछे छिपा दिया। बाद में इसी जगह पर उनका पार्थिव शरीर मिला। जिस वक्त उन्हें ढूंढा गया, उस वक्त भी उनके हाथ में उनकी बंदूक थी और पकड़ ढीली नहीं हुई थी। मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर स्थित उनके पैतृक गांव ले जाया गया, जहां पूरे सैनिक सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई। उनकी इस बहादुरी के लिए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। रेजांग ला जम्मू-कश्मीर राज्य के लद्दाख क्षेत्र में चुशुल घाटी में एक पहाड़ी दर्रा है। 1962 के युद्ध में 13 कुमाऊं दस्ते का यह अंतिम मोर्चा था। इसीलिए इसे रेजांग ला युद्ध के नाम से जाना जाता है।

मेजर शैतान सिंह की जयंती पर देखिए रेजांग ला युद्ध की फोटो, जिसे कर्नल एनएन भाटिया (रिटायर) ने उपलब्ध कराई। इस युद्ध के बाद कर्नल भाटिया को 13 कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन मिला था। इसमें मेजर शैतान सिंह थे।

भारतीय सेना के 120 जवान भीड़ गए थे चीन के पीएलए के 6 हजार जवानों से।
भारतीय सेना के 120 जवान भीड़ गए थे चीन के पीएलए के 6 हजार जवानों से।
इस युद्ध में कई सेना के जवान शहीद हो गए थे। मेजर शैतान सिंह इसका नेतृत्व कर रहे थे।
इस युद्ध में कई सेना के जवान शहीद हो गए थे। मेजर शैतान सिंह इसका नेतृत्व कर रहे थे।
मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर स्थित उनके पैतृक गांव ले जाया गया।
मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर स्थित उनके पैतृक गांव ले जाया गया।
मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व वाली 13 कुमाऊं की एक टुकड़ी चुशुल घाटी की हिफाजत पर तैनात थी।
मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व वाली 13 कुमाऊं की एक टुकड़ी चुशुल घाटी की हिफाजत पर तैनात थी।
उनका पराक्रम आज भी भारतीय सेना के इतिहास का गौरवशाली हिस्सा है।
उनका पराक्रम आज भी भारतीय सेना के इतिहास का गौरवशाली हिस्सा है।
1962 के युद्ध में 13 कुमाऊं दस्ते का यह अंतिम मोर्चा था। इसीलिए इसे रेजांग ला युद्ध के नाम से जाना जाता है।
1962 के युद्ध में 13 कुमाऊं दस्ते का यह अंतिम मोर्चा था। इसीलिए इसे रेजांग ला युद्ध के नाम से जाना जाता है।
इस युद्ध में सेना के 120 जवान डटे रहे। जान की परवाह किए बिना मेजर शैतान सिंह अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा
इस युद्ध में सेना के 120 जवान डटे रहे। जान की परवाह किए बिना मेजर शैतान सिंह अपने सैनिकों का हौसला बनाए रखा
मेजर शैतान सिंह। जिन्हें देश के सबसे बड़े सम्मान से नवाजा गया।
मेजर शैतान सिंह। जिन्हें देश के सबसे बड़े सम्मान से नवाजा गया।
13 कुमाऊं के वीर सैनिकों ने जो इस युद्ध में किया वो सेना का गौरवशाली इतिहास बन गया।
13 कुमाऊं के वीर सैनिकों ने जो इस युद्ध में किया वो सेना का गौरवशाली इतिहास बन गया।