पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

भास्कर एक्सक्लूसिव:अगले साल गांधीसागर अभयारण्य में आएंगे अफ्रीकी चीते

रावतभाटा2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
गांधीसागर वन्य क्षेत्र चंबल का बड़ा क्षेत्र है और यहां पानी की कोई कमी नहीं है। - Money Bhaskar
गांधीसागर वन्य क्षेत्र चंबल का बड़ा क्षेत्र है और यहां पानी की कोई कमी नहीं है।

आने वाले दिनों में वन क्षेत्र रावतभाटा, मुकंदरा नेशनल पार्क से लगते हुए गांधीसागर वन्य जीव अभयारण्य में अफ्रीका से चीता लाए जाएंगे। इसके लिए दक्षिण अफ्रीका और मध्य प्रदेश के वन्य जीव विशेषज्ञों ने गांधीसागर वन्य जीव अभयारण्य का अवलोकन किया।

मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में दक्षिण अफ्रीका से चीता लाए जाने की योजना के साथ-साथ गांधीसागर में भी चीता लाए जाने की योजना बना ली गई है। चीतों के रहवास देखने के लिए दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ देहरादून के वन्यजीव विशेषज्ञ गांधीसागर आए।

चीतों के रहने के लिए बनाए जाने वाले बाड़े और पीने के पानी की व्यवस्था देखी गई। सबसे अच्छी बात है कि गांधीसागर वन्य क्षेत्र चंबल का बड़ा क्षेत्र है और यहां पानी की कोई कमी नहीं है।

चीता के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ, दक्षिण अफ्रीका से विंसेंट, उनकी टीम के साथ में मध्यप्रदेश के वन विभाग प्रिंसिपल सेक्रेटरी अशोक कुमार, देहरादून भारतीय वन्य प्राणी संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. वायवी झाला, चीफ वार्डन वाइल्ड लाइफ जे.एस. चौहान, मंदसौर डीएफओ आदर्श श्रीवास्तव, स्थानीय अधिकारी ने गांधीसागर अभयारण्य और चंबल नदी का अवलोकन किया।

विशेषज्ञों ने यह बताई कमी : बाउंड्री के बावजूद स्थानीय लोग छोड़ देते हैं मवेशी, इससे चीतल के लिए नहीं बचेगी घास
गांधीसागर वन्य जीव अभयारण्य क्षेत्र में विशेषज्ञों ने अवलोकन करने के बाद बताया कि यहां पर सब कुछ ठीक है, लेकिन बाउंड्री होने के बावजूद स्थानीय लोग वन क्षेत्र में मवेशी छोड़ रहे हैं। यदि इन्हें नहीं रोका गया तो प्रे-बेस के लिए छोड़े जाने वाले चीतल के लिए घास नहीं बचेगी।

इससे चीतल नहीं बचेंगे और तब चीता शिकार कैसे करेगा। इसके लिए स्थानीय लोगों को समझाना होगा। जंगल का महत्व बताते हुए मवेशियों पर वन क्षेत्र में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाना पड़ेगा। गांधीसागर अभयारण्य 181 वर्ग किमी मंदसौर एवं 187 वर्ग किमी नीमच जिले सहित कुल 368.62 वर्ग किमी में फैला हुआ है। इसकी सीमा रावतभाटा वन क्षेत्र और मुकंदरा नेशनल पार्क से लगती हुई है। रावतभाटा की 30 किमी वन क्षेत्र की सीमा कम आबादी वाली है।

दक्षिण अफ्रीका से चीता लाने की जिम्मेदारी लुप्तप्राय वन्यजीव ट्रस्ट, मध्य प्रदेश वन विभाग, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान को सौंपी गई है। 1947 में ली गई सरगुजा महाराज रामानुशरण सिंह के साथ चीते की तस्वीर को आखिरी माना जाता है। 1952 में भारत सरकार ने चीते को विलुप्त जीव घोषित कर दिया था।

वर्ष 2000 में शुरू हुए प्रयास, ऐसे गांधीसागर को मिल रहा मौका
चीतों को लाने के लिए सन 2000 के आसपास प्रयास शुरू हुए थे। चीते के लिए पहाड़ी घास वाले मैदान स्ट्रांग प्वाइंट मिले। चीतों से पहले उनके लिए चीतल को बसाया जा रहा है। यहां अफ्रीका की तरह ग्रास लैंड है। गांधीसागर के उस एरिया में कोई गांव व आबादी नहीं है, जो चीते के लिए बहुत फायदेमंद है। इसके अलावा यहां पर कई प्रजातियों के वन्यजीव, पेड़, झाड़ियां और लताएं हैं।