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  • When Relations With The Captain Deteriorated, Sidhu Went To The Camp, Campaigned For The Captain To Get The Chair In 2015, Then To Remove Him In 2021.

57 साल बाद माझा में आते-आते रह गई ‘सरदारी’:सुखजिंदर रंधावा डिप्टी सीएम बनने वाले माझा के दूसरे नेता, 2015 में कैप्टन को कुर्सी दिलाने के लिए मुहिम छेड़ी तो 2021 में उन्हें हटाने के लिए

लुधियाना2 महीने पहलेलेखक: दिलबाग दानिश
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डेरा बाबा नानक के कांग्रेसी विधायक और पंजाब कांग्रेस प्रधान नवजोत सिद्धृ के खासमखास सुखजिंदर रंधावा पंजाब का नया मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए। सियासी हलकों में ये चर्चा थी कि रविवार को कांग्रेस हाईकमान ने सीएम पद के लिए रंधावा का नाम फाइनल कर दिया था मगर आखिरी समय में सिद्धू ने दलित कार्ड चल दिया और लॉटरी चरणजीत सिंह चन्नी के नाम खुल गई।

एक तरह से रंधावा ने जिस सिद्धू के साथ मिलकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ खुली बगावत की, आखिरी समय में उन्हीं की वजह से वह सीएम नहीं बन पाए और डिप्टी सीएम की कुर्सी से संतोष करने को मजबूर हो गए।

माझा से ताल्लुक रखने वाले स्व. प्रताप सिंह कैरों के बाद माझा का कोई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया। ‘संयुक्त पंजाब’ की सुजानपुर सीट से विधायक रहते हुए कैरों 27 जनवरी 1956 से 21 जून 1964 तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे। वैसे बोली के आधार पर 1966 में हरियाणा के अलग राज्य बनने के बाद रंधावा माझा के दूसरे ऐसे नेता हैं जो डिप्टी सीएम की कुर्सी तक पहुंचे। माझा से डिप्टी सीएम की कुर्सी तक पहुंचने वाले पहले नेता स्व. बलराम दास टंडन थे। अमृतसर से चुनाव लड़ने वाले टंडन 17 फरवरी 1969 से 26 मार्च 1970 तक गुरनाम सिंह की सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे।

तीन बार के विधायक
गुरदासपुर जिले के धारोवाली गांव में 1 फरवरी 1959 को जन्मे सुखजिंदर रंधावा को राजनीति विरासत में मिली। उनके पिता संतोख सिंह रंधावा दो बार पंजाब प्रदेश कंग्रेस के प्रमुख रहे। यूथ कांग्रेस से राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले रंधावा पंजाब कांग्रेस के महासचिव भी रहे।

रंधावा पहली बार वर्ष 2002 में गुरदासपुर जिले की फतेहगढ़ चूड़ियां सीट से विधायक बने। वर्ष 2007 में रंधावा ने गुरदासपुर जिले की ही डेरा बाबा नानक सीट से चुनाव लड़ा और जीते। 2012 में डेरा बाबा नानक सीट पर दिग्गज अकाली नेता सुच्चा सिंह लंगाह से हार जाने वाले रंधावा 2017 में यहीं से लंगाह को हराकर तीसरी बार विधानसभा पहुंचे। जट्टसिख परिवार से ताल्लुक रखने वाले रंधावा पंजाब की मुख्य विरोधी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ खुलकर बोलते हैं।

माझा ब्रिगेड के अहम साथी रंधावा
रंधावा का पंजाब के माझा क्षेत्र में अच्छा होल्ड है। पंजाब कांग्रेस में 3 नेता ‘माझा ब्रिगेड’ के नाम से मशहूर हैं और ये तीनों कैप्टन की कैबिनेट में शामिल रहे। इनमें रंधावा के अलावा तृप्त राजिंदर बाजवा और सुखविंदर सिंह सुख सरकारिया शामिल हैं। यह माझा ब्रिगेड किसी समय कैप्टन अमरिंदर सिंह की खासमखास होती थी मगर अब तीनों सिद्धू के साथ हैं। इस माझा ब्रिगेड के अलावा जिस चौथे मंत्री ने कैप्टन को CM की कुर्सी से हटाने के लिए खुलकर मोर्चा खोला, वह चरणजीत सिंह चन्नी रहे।

2015 में कैप्टन को प्रधान बनाने के लिए मुहिम छेड़ी, अब हटाने के लिए
सुखजिंदर रंधावा किसी समय कैप्टन अमरिंदर सिंह के खासमखास होते थे। रंधावा वर्ष 2015 में पंजाब कांग्रेस के तत्कालीन प्रधान प्रताप बाजवा को हटाकर उनकी जगह कैप्टन को प्रधान बनाने की मुहिम छेड़ने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव के लगभग 6 महीने बाद तक रंधावा हर जगह कैप्टन की ढाल बनकर खड़े रहते मगर फिर धीरे-धीरे उनके कैप्टन से मतभेद होते गए और रंधावा सिद्धू कैंप में चले गए।

बेअदबी और ड्रग्स के मुद्दे पर कैप्टन को खुलकर घेरा
रंधावा कांग्रेस के उन नेताओं में रहे जो गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी और ड्रग्स माफिया के मुद्दे पर अकालियों खासकर पूर्व कैबिनेट मंत्री बिक्रमजीत सिंह मजीठिया पर सख्त एक्शन चाहते थे। रंधावा पहले दिन से बेअदबी के लिए खुलकर अकालियों को जिम्मेदार ठहराते रहे।

कैप्टन सरकार में मंत्री होने के बावजूद रंधावा खुलकर इस बात पर नाराजगी जताते रहे कि उनकी सरकार अकालियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही। वह कहते रहे हैं कि 2017 के चुनाव में कांग्रेस बेअदबी और कोटकपूरा गोलीकांड के दोषियों पर कार्रवाई का वादा करके सत्ता में आई थी मगर यह दोनों ही वादे पूरे नहीं हुए। ऐसे में 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी नेताओं का जनता के बीच जाना मुश्किल हो जाएगा। रंधावा ड्रग्स के मुद्दे पर भी कई बार कैप्टन के खिलाफ बोले।

SIT की रिपोर्ट खारिज हुई तो कैबिनेट मीटिंग में ही दे दिया इस्तीफा
बेअदबी मुद्दे पर कुंवर विजय प्रताप की अगुवाई वाली स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की रिपोर्ट पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में खारिज होने के बाद रंधावा के रिश्ते कैप्टन अमरिंदर सिंह से पूरी तरह बिगड़ गए। इस SIT की रिपोर्ट में अकाली नेताओं की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे।

हाईकोर्ट में रिपोर्ट खारिज होने से नाराज रंधावा ने 27 अप्रैल 2021 को पंजाब कैबिनेट की मीटिंग में खुलकर नाराजगी जाहिर की और पंजाब के एडवोकेट जनरल अतुल नंदा पर सवाल उठाए। मीटिंग के दौरान रंधावा और CM कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि रंधावा ने उसी समय अपना इस्तीफा CM को सौंप दिया। हालांकि कैप्टन ने उनका इस्तीफा फाड़ दिया मगर उसके बाद रंधावा कैबिनेट की बैठक में शामिल नहीं हुए और सिद्धू के साथ मिलकर खुलकर कैप्टन की मुखालफत शुरू कर दी।

मोगा रैली में मंच पर नवजोत सिद्धू से विवाद हुआ।
मोगा रैली में मंच पर नवजोत सिद्धू से विवाद हुआ।

मंच पर सिद्धू के साथ विवाद भी रहा चर्चा में
नवजोत सिंह सिद्धू के खासमखास सुखजिंदर सिंह रंधावा का सिद्धू से विवाद भी हो चुका है। दरअसल अक्टूबर 2020 में राहुल गांधी ‘खेती बचाओ’ मिशन के तहत पंजाब दौरे पर थे। पंजाब कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद, नवजोत सिंह सिद्धू 3 अक्टूबर 2020 को मोगा अनाज मंडी में पहली बार पार्टी के स्टेज पर बोल रहे थे। उस प्रोग्राम में स्टेज संचालक की भूमिका रंधावा के पास थी। माइक संभालने के बाद सिद्धू ने राहुल गांधी की मौजूदगी में ही कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनकी सरकार पर जमकर निशाना साधा। रंधावा ने उन्हें रोकने के मकसद से कागज की एक पर्ची पोडियम पर रखी तो सिद्धू ने भाषण के दौरान ही कहा, "भाजी अज्ज न रोकाे, बहुत समां बैठा के रख्या तुस्सी।'
उस रैली में रंधावा और सिद्धू की वो नोक-झोंक काफी चर्चा में रही और उसके बाद अगले स्टेशन पर नवजोत सिंह सिद्धू को प्रोग्राम के स्टेज पर जगह नहीं मिली।

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