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उस कांग्रेसी CM की कहानी जिसके नाम पर बना RSS:सागर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक के मुकाबले के लिए पं. रविशंकर शुक्ल के नाम पर बनाया गया था RSS क्लब

सागर4 महीने पहलेलेखक: जितेंद्र तिवारी
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यह किस्सा 27 सितंबर 1925 का है। जब विजयदशमी के दिन आरएसएस की स्थापना की गई। आरएसएस की स्थापना के साथ ही देशभर में इसके स्वयं सेवक अपनी गतिविधियां तेज करने लगे थे। उसी दौरान जब सागर में आरएसएस की गतिविधियां बढ़ी तो पंडित रविशंकर शुक्ल के समर्थकों ने आरएसएस के समानांतर एक संघ बनाया। इस संघ का नाम रखा रविशंकर शुक्ल संघ यानि आरएसएस। पं. शुक्ल के चाहने वालों ने सागर में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस संघ का गठन किया। उस समय इस संघ ने सागर में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए, जोकि गैर राजनीतिक रहे। साहित्यकार व प्रोफेसर डॉ. सुरेश आचार्य ने यह किस्सा सुनाते हुए कहा कि पंडित रविशंकर शुक्ल महात्मा गांधी के काफी करीब थे। बापू ने ही पं. शुक्ल को छत्तीसगढ़ कांग्रेस की कमान संभालने के लिए भेजा। गांधी के आदेश पर ही पं. शुक्ल को सागर छोड़ना पड़ा। इसके बाद वे रायपुर चले गए और वहां उन्होंने वकालत करने के साथ ही कांग्रेस की कमान भी संभाली। गांधी जी के डांडी मार्च समेत अन्य आंदोलनों में हिस्सा लिया और आजादी की लड़ाई लड़ी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रविशंकर शुक्ल का जन्म 2 अगस्त 1877 को सागर में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित जगन्नाथ शुक्ल और उनकी माता का नाम तुलसी देवी था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा सागर की सुंदरलाल पाठशाला से पूरी की थी। ब्रिटिश शासनकाल में यह पाठशाला सीपी में स्थित 6 शालाओं में से एक थी। वे महात्मा गांधी के खास थे। गांधी जी ने ही उन्हें सागर से रायपुर छत्तीसगढ़ भेजा था। जहां उन्होंने कांग्रेस का कार्य संभाला और आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।साहित्यकार व प्रोफेसर डॉ. सुरेश आचार्य बताते हैं कि पंडित रविशंकर शुक्ल का जन्म सागर में हुआ था। यहीं उनका परिवार रहता था। उनका साहूकारी का पैतृक व्यवसाय था। बाद में इस वार्ड का नाम पं. रविशंकर शुक्ल रखा गया। पं. शुक्ल काफी मिलनसार थे। वे सागर में कक्काजी के नाम से जाने जाते थे। उन्हें जो भी मिलता था कक्काजी कहकर ही संबोधित करता था। वे धोती-कुर्ता और लंबा कोट पहनते थे। लंबी मूंछें रखते थे। पं. शुक्ल और डॉ. हरिसिंह गौर घनिष्ठ मित्र थे। दोनों अधिवक्ता होने के साथ ही सामाज के हितों की लड़ाई लड़ते थे।
सीपी एण्ड बरार के पहले मुख्यमंत्री बने थे पं. शुक्ल
पहले मध्यप्रदेश नहीं था। सीपी एण्ड बरार के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल बने थे। सीपी एण्ड बरार (मप्र) की राजधानी नागपुर हुआ करती थी। नागपुर में ही विधानसभा थी। पं. शुक्ल और डॉ. हरिसिंह गौर घनिष्ठ मित्र थे। वे सागर के विकास को लेकर अक्सर पहल करते रहते थे। इसी बीच सागर में स्थितियां बिगड़ी। ऐसे में डॉ. गौर की वसीयत लेकर उनका काम देखने वाले द्वारका प्रसाद शुक्ल नागपुर पहुंचे। जहां पं. शुक्ल ने उन्हें सुरक्षा दिलाई। इसके बाद डॉ. गौर की वसीयत को नागपुर विधानसभा में पेश किया। इसके बाद डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय का एक्ट 1947 विधानसभा में पारित हुआ था। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय की स्थापना सन 1947 में की गई। डॉ. गौर विश्वविद्यालय की स्थापना होने के बाद डॉ. गौर ने पं. शुक्ल का ऋण उतारने के लिए उन्हें ही यूनिवर्सिटी का पहला चांसलर बनाने का प्रस्ताव रखा। सागर डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पहले पदेन कुलाधिपति (Chancellor) चांसलर पंडित रविशंकर शुक्ल बने। वहीं डॉ. हरिसिंह गौर वाइस चांसलर बने थे।

सागर में डॉ. गौर के बाजू से बनीं है पं. शुक्ल की समाधि।
सागर में डॉ. गौर के बाजू से बनीं है पं. शुक्ल की समाधि।

मेरी एक मुट्‌ठी भस्म सागर की भूमि पर ले जाना
डॉ. आचार्य ने बताया कि पं. रविशंकर शुक्ल का सागर से बेहद स्नेह था। उन्होंने अपनी आखिर इच्छा जाहिर की थी कि मेरे निधन के बाद मेरी एक मुट्‌ठी भस्म सागर लेकर सागर की भूमि में मिला देना। उनके निधन के बाद सागर की डॉ. हरिसिंह यूनिवर्सिटी परिसर में डॉ. गौर की समाधि के बगल में ही पं. रविशंकर शुक्ल की समाधि बनाई गई है, जो आज सागर में स्थापित है। इसके अलावा उनके नाम पर सागर के मोतीनगर स्थित स्कूल का नाम पं. रविशंकर शुक्ल रखा गया है।

जन्म स्थल को लेकर भ्रांतियां
सागर के जानकार बताते हैं कि पंडित रविशंकर शुक्ल का जन्म सागर के खुशीपुरा में हुआ था। चमेली चौक क्षेत्र में उनका मकान भी था। उनके परिवार के सदस्य यहां रहते थे। लेकिन रिकॉर्ड को देखे तो उसमें पंडित शुक्ल का जन्म स्थल सागर जिले की रहली तहसील के ग्राम गुड़ा में बताया गया है। हालांकि ग्राम गुड़ा में न तो उनकी कोई समाधि है और न ही स्मृति।