पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

मजबूरों का मसीहा साथ छोड़ गया:कोरोना से मृत किसान धर्मजय के भाई बोले- धरम ये अधर्म हो गया, बेसहारा लोगों की मदद करने अब कौन दौड़ेगा

रीवा6 महीने पहलेलेखक: सुरेश मिश्रा
  • कॉपी लिंक

तुझे अस्पताल नहीं बनवाना क्या... वो देख नंगे पैर लोग चल रहे हैं, उन्हें चाय कौन पिलाएगा.. वो देख पाला पड़ गया है... खेत अब कौन देखेगा...। ये क्या अधर्म कर गया धरम। अब मैं ये सब किससे कहूंगा। मेरा भाई, बेटे जैसा। जिंदादिल इतना कि जब महामारी में लोगों को अपनों ने ही बेसहारा छोड़ दिया तो तू उनके करीब हो गया। कभी महाराष्ट्र से आए मजदूरों को चाय पिलाता तो कभी मरीजों को अस्पताल भर्ती कराने के लिए लड़ जाता। इसी बीच तू भी पॉजिटिव हो गया। अब कई मजबूर-बेसहारा लोगों को उनका मसीहा छोड़कर चला गया।

उसे इसकी ताकत कहूं या कमजोरी। वो जैसा भी था लोगों के लिए दिल का साफ था। यही बातें थीं जो हमेशा उसके साथ खड़ा रहने पर मजबूर कर देती थीं। बात मेरे भाई धरम (धर्मजय) उर्फ बबलू की है। वो हम सभी को छोड़कर चला गया। मैंने हमेशा सुना कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। यही मैंने सबकुछ किया। ये जज्बात हैं रीवा के एडवोकेट प्रदीप सिंह के। उन्होंने दूसरी लहर में अपने छोटे भाई धरम सिंह को खो दिया। आठ महीने चले इलाज के बाद चेन्नई के अस्पताल में भर्ती रीवा के किसान धर्मजय सिंह (50) की मंगलवार रात मौत हो गई। उनके इलाज में करीब 6 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।

प्रदीप ने बताया कि 2021 में कोरोना की दूसरी लहर में लोगों की सेवा करते करते वो (छोटा भाई) खुद ही पॉजिटिव हो गया। जैसा कि उसका मिजाज था... कुछ नहीं बताया। पर मई के बीच उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। रिपोर्ट आई कि उसके फेफड़े अब काम के ही नहीं हैं।

18 मई का दिन आज भी याद आता है। वह ठीक हो गया। एक्मो नाम की मशीन पर इलाज चला। वेंटिलेटर भी हट गया। डॉक्टर्स बोले कि ऑर्गन भी सेफ हैं। ICU से भी छुट्‌टी हो गई। एक हफ्ते तक वो हमारे साथ ICU के प्राइवेट वार्ड में रहा। मेरे साथ खड़े होकर नाश्ता किया। छह-छह घंटे तक सोफे पर बैठकर बातें करता। मुझे लगा- आ गया मेरा भाई।

पर, अब अचानक क्या हुआ, सबकुछ हाथ से फिसल गया। वो नहीं रहा। यकीन नहीं होता कि एशिया के सबसे बड़े चेन्नई के अपोलो अस्पताल में लंदन के डॉक्टर का इलाज चला, पर मैं अपने भाई को नहीं बचा पाया। वह चाहता था कि गांव में ही ऐसा अस्पताल बनाऊं कि बाहर जाने की जरूरत ना पड़े।

गोशालाएं बनवाने का जज्बात पूरे प्रदेश में चर्चित हो चुका था। स्ट्रॉबेरी, गुलाब, ऑर्गेनिक सब्जी और आलू खूब पैदा किया। भाई नरेंद्र, संतोष की कोशिशें भी अधूरी रह गईं। सोच रहा हूं कि अब उन मजदूरों को चाय कौन पिलाएगा, कौन उनकी लड़ाई लड़ेगा।

गांववालों का अहसान कैसे अदा करूं...
इस संकट की घड़ी में 17 से 18 मई चेन्नई जाने के पहले 50 यूनिट खून की जरूरत थी। 250 लोग जुट गए। शायद उनका प्यार ही कोशिश में बदल गया था। प्रदीप ने बताया कि हम चेन्नई से निकल चुके हैं। दोपहर 1.30 बजे मुंबई और डुमना एयरपोर्ट जबलपुर शाम 7.30 पहुंचेंगे। जबलपुर एयरपोर्ट से सड़क मार्ग से एम्बुलेंस से 14 की सुबह गांव रकरी मऊगंज पहुंचेंगे। 14 जनवरी संक्रांति की दोपहर 2 बजे दाह संस्कार किया जाएगा।

खबरें और भी हैं...