पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

सरकार की कमेटी ने 'आरक्षण के खेल' से पर्दा उठाया:गरीब सवर्ण-OBC का क्राइटेरिया 8-8 लाख, लेकिन सवर्णों के नियम सख्त; जानें रिपोर्ट की बड़ी बातें...

मध्य प्रदेश4 महीने पहलेलेखक: राजेश शर्मा
  • कॉपी लिंक

सुप्रीम कोर्ट मार्च-अप्रैल में गरीब सवर्ण आरक्षण (EWS कैटेगरी) के मामले में 8 लाख रुपए सालाना आय के पैमाने पर फैसला सुना सकता है। सालाना आय का यह फॉर्मूला OBC और गरीब सवर्ण पर समान रूप से लागू है, लेकिन आय की गणना के तरीके बिल्कुल अलग हैं। पूर्व वित्त सचिव अजय भूषण पांडे की अध्यक्षता में बनाई कमेटी ने यह स्वीकार किया है। कमेटी ने रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इसके आधार पर क्रीमीलेयर के मापदंड तय होंगे। फिलहाल, केंद्र सरकार यह आकलन कर रही है कि सालाना आय की गणना में कृषि से होने वाली आय को शामिल किया जाए या नहीं।

केंद्र सरकार ने 2019 में आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को भी आरक्षण देने का फैसला किया, तो पिछड़ेपन का आधार 8 लाख रुपए की सालाना आय को तय किया गया। इस नियम के तहत जिस सवर्ण परिवार की सालाना आमदनी 8 लाख रुपए तक है, उसके उम्मीदवारों को ही शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और नौकरियों में आरक्षण की सुविधा मिलती है। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमीलेयर का निर्धारण भी 8 लाख रुपए की सालाना आय के आधार पर ही होता है। यानी, अगर OBC कैंडिडेट के माता-पिता की सालाना इनकम 8 लाख रुपए से अधिक है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

EWS और OBC, दोनों में क्रीमीलेयर तय करने के अलग-अलग मापदंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है? कोर्ट की इस टिप्पणी पर सरकार ने 30 नवंबर 2021 को पूर्व वित्त सचिव अजय भूषण पांडे, केंद्र सरकार के प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के प्रोफेसर वीके मल्होत्रा की एक कमेटी बना दी। कमेटी को गरीब सवर्णों की आय सीमा निर्धारित करने के लिए 2019 में बनाए गए नियमों की समीक्षा करने का दायित्व सौंपा गया था।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी। इसमें स्पष्ट कर दिया कि 8 लाख रुपए का मानदंड बाहर से तो दोनों वर्गों, OBC और EWS के लिए बराबर दिखता है, लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग है। दोनों के लिए भले ही मानदंड 8 लाख रुपए हो, लेकिन इसकी गणना में जमीन-आसमान का अंतर है।

इस असमानता को ऐसे जानिए...
1 - आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के निर्धारण के लिए 8 लाख रुपए आय का मापदंड OBC क्रीमीलेयर की तुलना में कहीं अधिक सख्त है।
2- गरीब सवर्णों के लिए पारिवारिक आय के तहत कैंडिडेट, उसके माता-पिता, पति/पत्नी, 18 वर्ष से कम उम्र के भाई-बहन और 18 साल से कम उम्र के उसके बच्चों की आय शामिल हैं। आर्थिक पिछड़ों की पारिवारिक आय में तीन पुश्तों की मिलीजुली आमदनी शामिल है। इसमें खेती-किसानी से होने वाली आयकर मुक्त आमदनी भी जोड़ी जाती है। जबकि OBC के पारिवारिक आय की गणना में सिर्फ कैंडिडेट के माता-पिता की आमदनी शामिल होती है। उसमें भी माता-पिता की सैलरी, खेती और परंपरागत व्यवसाय से हुई आमदनी को नहीं जोड़ा जाता है।
3- EWS की शर्त आवेदन के वर्ष से पहले के वित्तीय वर्ष से संबंधित है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमीलेयर के लिए आय मानकों की शर्तें लगातार 3 साल के लिए सालाना आय पर लागू होती है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस डीवाय चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 7 अक्टूबर, 2021 को कहा था- आर्थिक पिछड़ापन एक सच्चाई है। इसमें संदेह नहीं कि लोगों के पास किताबें खरीदने और यहां तक कि खाने के पैसे भी नहीं हैं। लेकिन, जहां तक बात आर्थिक पिछड़ों की है, तो वो अगड़ा वर्ग हैं। उनमें सामाजिक या शैक्षणिक पिछड़ापन नहीं है। तो क्या आप क्रीमीलेयर तय करने के लिए 8 लाख रुपए की सालाना आय का पैमाना आर्थिक पिछड़ों के लिए भी रख सकते हैं?

कमेटी ने बताया- आमदनी की गणना में अंतर
कमेटी ने रिपोर्ट में कहा कि ओबीसी का क्रीमीलेयर सिर्फ उम्मीदवार की आय के आधार पर तय होता है, जबकि आर्थिक पिछड़ों की आय सीमा में उम्मीदवार के साथ-साथ उसकी पारिवारिक और कृषि आय भी शामिल हैं। कमेटी ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा आयकर नियमों के तहत 5 लाख रुपए तक की सालाना आय पर टैक्स नहीं लगता है। फिर कटौतियों, बचत व बीमा आदि सभी प्रावधानों का उपयोग कर लिया जाए तो 7-8 लाख रुपए तक की सालाना आय टैक्स फ्री हो जाती है। इस तरह, गरीब सवर्णों के लिए 8 लाख की व्यक्तिगत सालाना आय का निर्धारण टैक्स फ्री इनकम की सीमा के अनुकूल किया गया है। हालांकि, इसमें पारिवारिक और कृषि आय को जोड़ते ही सारा माजरा बदल जाता है।

5 एकड़ जमीन की शर्त बरकरार
कमेटी ने 2019 में बने नियमों के तहत मकान को आय सीमा से बाहर रखने की ही सिफारिश की है। कमेटी ने कहा कि आय सीमा की गणना को सरल बनाए रखने के लिए रेसिडेंशियल प्रॉपर्टी एरिया यानी मकान के पैमाने को बाहर ही रखा जाए, क्योंकि इससे किसी की असल आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता है। ऊपर से गरीब सवर्ण परिवारों पर इसका गंभीर दुष्परिणाम और बेवजह बोझ देखने को मिलेगा। हालांकि कमेटी ने ऐसे परिवार के पास 5 एकड़ कृषि योग्य जमीन होने पर आर्थिक पिछड़ा नहीं माने जाने का क्राइटेरिया बरकरार रखे जाने की सिफारिश की है।

अभी और हैं दिक्कतें
कमेटी ने रिपोर्ट में यह भी कहा है कि भौगोलिक क्षेत्रों- ग्रामीण, शहरी, मेट्रो सिटी या राज्यों के लिए अलग-अलग आय सीमाएं होने से जटिलताएं पैदा होंगी, विशेष रूप से यह देखते हुए कि लोग नौकरियों, पढ़ाई, बिजनेस आदि के लिए देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में तेजी से बढ़ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि शहरी और ग्रामीण इलाकों के आधार पर रेसीडेंशियल प्रॉपर्टी की कीमत में भारी अंतर हो जाता है। ऐसे में इस प्रॉपर्टी को भी आय के दायरे में ला दिया गया, तो गरीब सवर्णों को आरक्षण का लाभ उठाने के लिए नाकों चने चबाना पड़ेगा।

ओबीसी को 27% व गरीब सवर्ण को 10% मिलता है आरक्षण
वर्तमान में उच्च शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार में OBC 27% गरीब सवर्ण 10% कोटा के हकदार हैं। इसमें माता-पिता की सकल सालाना आय 8 लाख रुपए से अधिक नहीं होने की शर्त है। इससे अधिक की आय वाले व्यक्ति को "क्रीमीलेयर" के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।