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खंडवा सीट बनी नाक की लड़ाई:आदिवासी वोट बैंक सबसे बड़ा फैक्टर; 40 साल से पट्‌टे और पानी को मोहताज हैं गांधवा जैसे सैकड़ों गांव

खंडवाएक महीने पहलेलेखक: राजेश शर्मा
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खंडवा लोकसभा उपचुनाव से केंद्र और राज्य की शिवराज सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा और न ही कांग्रेस को इस सीट के जीतने से सत्ता हासिल होगी। बावजूद इसके दोनों ही पार्टियां इस चुनाव को प्रतिष्ठा मानकर मैदान में हैं। आठ विधानसभा क्षेत्रों वाली इस सीट पर दोनों पार्टियां प्रचार मंचों से आरोप-प्रत्यारोप और विकास के दावे और वादे कर रही हैं, लेकिन मतदान की तारीख करीब आते-आते आदिवासी अब बड़ा टर्निंग पॉइंट फैक्टर बनता दिख रहा है। BJP ने पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ज्ञानेश्वर पाटिल को टिकट देकर OBC कार्ड खेला है। इसके बिल्कुल उलट कांग्रेस ने सामान्य वर्ग के राजनारायण सिंह पुरनी पर दांव लगाया है।

10 दिन पहले आदिवासी बाहुल पंधाना विधानसभा के गांधवा में इंदौर के सांसद शंकर लालवानी (विधानसभा क्षेत्र के चुनाव प्रभारी) को गांव में घुसने नहीं दिया था। तब इस चुनावी दंगल में आदिवासियों ने अपनी अहमियत का अहसास राजनीतिक दलों को कराया। ऐसा नहीं है कि केवल बीजेपी या सरकार से गांव के लोग नाराज हैं, बल्कि कांग्रेस के नेताओं को यहां आने नहीं दिया जा रहा है।

दैनिक भास्कर ने ग्राउंड जीरो पर जाकर इस गांव में आदिवासियों से बात की तो पता चला कि गांव 40 साल से पानी को मोहताज है। गांधवा के अलावा आरूद, सराय जैसे सैकड़ों गांव हैं, जहां इंदिरा सागर बांध बनने के बाद पानी की समस्या दूर नहीं हुई।

इन गांवों में आदिवासियों के मतदान का विरोध करने की केवल पानी की समस्या वजह नहीं है, गरीबों और आदिवासियों को वनाधिकार पट्‌टे तक नहीं मिले। ग्राम पंचायत से लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि केवल पंधाना में आदिवासी अपनी मांगों को लेकर राजनीतिक दलों को अपनी अहमियत बता रहे हैं, नेपानगर और बुरहानपुर में भी आदिवासी लामबंद हो रहे हैं।

नहर नहीं तो वोट नहीं
गांधवा सहित कई गांव के लोग खंडवा- झिरन्या उद्वहन सिंचाई परियोजना को लेकर नहर नहीं तो वोट नहीं का नारा गांव- गांव में लगाया जा रहा है। इसके लिए नहर सैनिक तैयार किए जा रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि इन सैनिकों द्वारा गांव-गांव में घूमकर हर राजनीतिक दल का बहिष्कार करने की कसम दिलाई जा रही है।

बीजेपी-कांग्रेस रात में कर रहे बैठकें
आदिवासियों को मनाने के लिए बीजेपी और कांग्रेस नेता हर स्तर पर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दिन में कोई भी नेता आदिवासियों के बीच नहीं जा रहा है। रात में बैठकों का दौर जारी है। इसकी वजह यह है कि खंडवा लोकसभा सीट में 38% आबादी आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) है। इस संसदीय क्षेत्र में तीन विधानसभा सीटें पंधाना, नेपानगर और भीकनगांव अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इसमें से दो सीट कांग्रेस और एक सीट बीजेपी ने जीती थी, लेकिन नेपानगर से कांग्रेस विधायक सुमित्रा कास्डेकर बीजेपी में शामिल हो गई हैं।

मुख्यमंत्री ने भोपाल बुलाकर दिया है भरोसा
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तीन दिन पहले अपने निवास पर खंडवा- झिरन्या उद्वहन सिंचाई परियोजना को लेकर एक बैठक बुलाई थी। जिसमें आंदोलन की अगुवाई करने वालों को भी बुलाया गया था। ऐसा बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया है कि जल्दी ही इस परियोजना को स्वीकृति दी जाएगी।

दिग्विजय सिंह ने उठाया यह मुद्दा
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने आदिवासियों की ताकत को भांपते हुए अपनी पहली सभा पंधाना के सिंगोट में की। इस दौरान उन्होंने खंडवा- झिरन्या उद्वहन सिंचाई परियोजना का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कमलनाथ सरकार ने इस परियोजना की डीपीआर तैयार कराई थी, लेकिन शिवराज सरकार ने इसे स्वीकृत नहीं किया।

पीने के पानी के लिए 2 किमी का सफर
खंडवा शहर से मात्र 20 किलोमीटर नेपानगर रोड पर बसे गांधवा के 30 वर्षीय राहुल डांगोरे कहते हैं कि इस गांव की 6 से 7 हजार की आबादी है, लेकिन पीने के पानी के लिए महिलाओं को 2 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है। जिस जमीन पर हम रहते हैं, उसका खसरा और भू-स्वामित्व पट्‌टे के लिए 30 साल से ग्राम पंचायत में आवेदन दे रखा है। लेकिन शासन-प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। इसलिए हम किसी भी दल को वोट नहीं करेंगे।

गांधवा में 45 साल पहले आकर बसे 70 वर्षीय लक्ष्मण कहते हैं- नेता आते और वादे करके चले जाते हैं। गांव में एक हैंडपंप तक नहीं है। पंचायत कभी ध्यान नहीं देती। जब नेता हमारी सुनते ही नहीं हैं तो वोट क्यों दे?

75 साल की सलता बाई बताती हैं- मेरे पति की 5 साल पहले मौत हो गई, लेकिन विधवा पेंशन नहीं मिल रही है। चार बार फार्म भरकर जमा किया, लेकिन मुझे पेंशन नहीं मिली।

45 वर्षीय रमा बाई कहती हैं कि नेता नहीं आते, गांव के ही लोग चुनाव के दौरान आकर पानी देने की बात करते रहे, लेकिन चुनाव के बाद पांच साल तक कोई झांकने तक नहीं आता है।

चार विधानसभा चुनाव में आदिवासी बहुल्य सीटों पर बदले समीकरण

  • 2003 विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 41 सीटों में से भाजपा ने 37 सीटों पर कब्जा जमाया था। चुनाव में कांग्रेस केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 2 सीटें जीती थीं। 1998 में कांग्रेस का आदिवासी सीटों पर अच्छा खासा प्रभाव था।
  • 2008 के चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 41 से बढ़कर 47 हो गई। इस चुनाव में भाजपा ने 29 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
  • 2013 के इलेक्शन में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा ने जीती 31 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में 15 सीटें आई थीं।
  • 2018 के इलेक्शन में पासा पलट गया। आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा केवल 16 सीटें जीत सकी और कांग्रेस ने दोगुनी यानी 30 सीटें जीत ली। एक सीट निर्दलीय के खाते में गई।