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अब बच्चों में डेंगू ने बढ़ाई चिंता:सरकारी के साथ प्राइवेट अस्पतालों में भी बढ़ी संख्या, ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे ज्यादा कमजोर

इंदौर2 महीने पहले
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शहर में कोरोना पर नियंत्रण को लेकर चिंता कुछ कम हुई तो अब रोजाना डेंगू के मरीज बढ़ रहे हैं। इस साल यह संख्या 637 तक पहुंच गई है जिनमें 137 तो बच्चे ही हैं। यह संख्या तो सिर्फ सरकारी अस्पतालों की है जबकि दूसरी ओर प्राइवेट अस्पतालों में भी बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यहां स्थिति ऐसी है कि जितने भी बच्चे वायरल, डायरिया या अन्य बीमारी के पहुंच रहे हैं, उनमें 50 से 75 फीसदी डेंगू के ही हैं। खास बात यह कि इनमें भी ज्यादातर धार, खंडवा, खरगोन, सेंधवा, रतलाम व आसपास के क्षेत्रों के हैं। बीते तीन महीनों में करीब 15 बच्चों की मौत भी हुई है लेकिन इनका अलाइजा टेस्ट नहीं होने के कारण विभाग ने इन्हें रिकॉर्ड पर नहीं लिया है।

दरअसल यह बीमारी इन्फेक्शन संबंधी नहीं बल्कि बारिश के या अन्य गंदा पानी जमा होने पर मच्छर के काटने से होती है, इसलिए डेंगू मरीजों की संख्या बढ़ने का मुख्य कारण सितंबर में ज्यादा बारिश होना सामने आया है। यही कारण है कि नगर निगम व मलेरिया विभाग की टीमें लगातार उन स्थानों पर लार्वा सैंपल लेकर छिड़काव कर रही है जहां मरीज मिले हैं। इनके अलावा शॉपिंग मॉल व सावर्जनिक स्थानों पर भी छिड़काव किया जा रहा है लेकिन संख्या थम नहीं रही है है। इसका एक कारण यह भी है कि बच्चों में जो संख्या बढ़ी है, वह शहरी क्षेत्र में कम है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से बहुत अधिक बच्चे यहां भर्ती हो रहे हैं।

शहरी क्षेत्र में तो नियमित छिड़काव होता है, ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं इसलिए बढ़ रहे मरीज।
शहरी क्षेत्र में तो नियमित छिड़काव होता है, ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं इसलिए बढ़ रहे मरीज।

चाचा नेहरू अस्पताल में 15 बच्चे भर्ती

चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के अधीक्षक डॉ. हेमंत जैन ने बताया कि इस बार डेंगू ग्रस्त मरीजों की संख्या काफी बढ़ी है। अभी 15 से ज्यादा बच्चे भर्ती हैं। इनमें भी शहर के कम और आसपास के क्षेत्रों के बच्चे ज्यादा है। इनमें भी एक साल से कम उम्र के बच्चे ज्यादा है। दूरस्थ क्षेत्रों से आने से इलाज में काफी देर हो जाती है। कई बार इन्हें बचाना मुश्किल हो जाता है। इस साल 5-6 बच्चों की मौत हुई है। इनमें उन्हें डेंगू तो था और इसके कारण ब्लीडिंग, ब्रेन व कार्डियेक संबंधी भी कारण रहा। 1 साल से कम उम्र के बच्चे काफी नाजुक होते हैं इसलिए उन्हें डेंगू होने पर समय पर इलाज मिलना बहुत जरूरी है। शहरी क्षेत्र के बच्चे तो अस्पताल पास होने से बच जाते हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को पहुंचने में काफी देर हो जाती है। परिजन भी एक-दो दिन इस गफलत में रहते हैं कि बच्चों को वायरल फीवर है।

50 फीसदी बच्चे डेंगू के

डॉ. राकेश शुक्ला (पीडियाट्रिशियन, बॉम्बे हॉस्पिटल) ने बताया कि इस साल जितने भी बच्चे वायरल बुखार या अन्य कारण के आ रहे हैं उनमें 50 फीसदी तो डेंगू के होते हैं। इसमें भी इंदौर के कम और आसपास के क्षेत्रों के ज्यादा है। समय पर इन्हें उपचार मिलना बहुत जरूरी है। वैसे बच्चों के अलावा अन्य उम्र के डेंगू ग्रस्त मरीजों की संख्या भी बढी है।

धार, खंडवा, खरगोन, बड़वाह, सेंधवा के बच्चे ज्यादा

डॉ. रश्मि शाह (पीडियाट्रिशियन, चोइथराम हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेंटर) ने बताया कि अस्पताल में रोजाना डेंगू ग्रस्त बच्चों की संख्या बढ़ रही है। इनमें नवजात से लेकर 17 वर्ष तक की उम्र के हैं। इनमें से 75 फीसदी बच्चे धार, खंडवा, खरगोन, बड़वाह, सेंधवा, रतलाम, नीमच से आ रहे हैं। एडमिट होने के दौरान ही इन्हें बुखार, प्लेटलेट्स कम होने संबंधी समस्याएं रहती है और इलाज के लिए देरी से पहुंचते हैं। प्रोटोकॉल बेस्ड इलाज कर उन्हें बचाया जाता है। अगस्त से सितंबर में डेंगू संबंधी 8 बच्चों की मौत हुई है। इन बच्चों को काफी देर से लाया गया था व इन्हें ब्लीडिंग शुरू हो चुकी थी इसके चलते उनकी हालत गिरती गई।

किट से की गई जांच मान्य नहीं

डॉ. दौलत पटेल (जिला मलेरिया अधिकारी) ने बताया कि इस साल अब तक 637 डेंगू मरीज पाए गए हैं। इनमें 137 बच्चे हैं। वर्तमान में 14 एक्टिव मरीज हैं व 10 मरीज एडमिट हैं। इस साल केवल एक डेंगू मरीज (महिला) की मौत हुई है। इस बार बच्चों की संख्या बढ़ी है लेकिन जहां तक प्राइवेट अस्पतालों में डेंगूग्रस्त बच्चों की मौतों का मामला है, उनका अलाइजा टेस्ट नहीं होने या अन्य किट से डेंगू की जांच विभाग में मान्य नहीं है इसलिए इन्हें रिकॉर्ड पर नहीं लिया जाता। विभाग द्वारा डेंगू पर नियंत्रण के लिए लगातार लार्वा सैंपल छिड़काव किया जा रहा है। नगर नगर व मलेरिया विभाग की 35 टीमें इस काम में जुटी हैँ।