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बैंक का सबकुछ बिक गया पर राहत नहीं:इंदौर में महाराष्ट्र ब्राह्मण सहकारी बैंक के तीन भवन 6.57 करोड़ रु. में बिके, हजारों कस्टमर की उम्मीद जगी पर 18 करोड़ कैसे चुकेंगे

इंदौर3 महीने पहले
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करोड़ों के घाटे में डूबी शहर की सबसे पुरानी महाराष्ट्र ब्राह्मण सहकारी बैंक के तीनों भवन 6.57 करोड़ रुपए में बिकने के बाद भी बैंक के जमाकर्ताओं के करोड़ों रुपए लौटाना अभी आसान नहीं है। दरअसल, बैंक को 18 करोड़ रु. से ज्यादा की देनदारियां चुकाना है। दूसरा परिसमापक के अधीन संचालित बैंक से जुड़े सहकारिता विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बैंक के हजारों ऐसे डिफाल्टर हैं जिनसे 56 करोड़ रु. से ज्यादा वसूलना है। जैसे-जैसे यह वसूली होगी इसमें पहले बैंक की देनदारियां चुकाई जाएंगी और फिर जमाकर्ताओं के रुपए लौटाए जाएंगे जिसमें सालों लग सकते हैं।

पिछले दिनों बैंक का जेल रोड (खातीपुरा) स्थित पुराना भवन 4.21 करोड़ रुपए, विजय नगर स्थित फ्लोर 1.96 करोड़ और लोकमान्य नगर में लीज की जमीन पर बना भवन 40 लाख रु. में बिका था। इन तीनों भवनों के सौदे के एडवांस 1 करोड़ रुपए भी बैंक को मिल गए हैं, जबकि अभी 5.57 करोड़ रुपए तीन माह में मिलेंगे। इससे इन हजारों जमाकर्ताओं और उनके वारिसों में उम्मीदें जागी, जिनके लाखों रुपए बैंक में एफडी सहित अलग-अलग मदों में जमा हैं। यह राशि बीते सालों में ब्याज सहित कई गुना ज्यादा हो गई हैं।

40 करोड़ रु. में से अभी 18 करोड़ रु. लौटना बाकी

2004 में जब घोटाले के कारण बैंक डूबी थी तब 29 हजार जमाकर्ताओं के 40 करोड़ रुपए अटके गए थे। तब बैंक ने इनके रुपए लौटाने के लिए DICGC (डिपाजिट इंश्योरेंस क्रेडिट एंड गारंटी कॉर्पोरेशन) में अपील की थी। 2006 में DICGC ने छानबीन के बाद 28.66 करोड़ रु. की राशि दी थी। इसमें प्रत्येक जमाकर्ता को अधिकतम एक लाख रुपए का क्लेम किया गया था। DICGC की शर्त यह थी, बैंक तेजी से रिकवरी कर पहले 28.66 करोड़ रुपए वापस लौटाए।

बैंक ने इसमें अपनी जमा राशि 5 करोड़ रुपए समेत 33 करोड़ रुपए जमाकर्ताओं में बांट दिए थे। इसके बाद भी 12660 जमाकर्ता ऐसे बचे, जिनकी जमापूंजी 17.46 करोड़ रुपए बाकी थी। बैंक ने हवाला दिया कि पहले उसे डिफाल्टरों से वसूली कर DICGC के 28.66 करोड़ रुपए देने होंगे। इसके बाद ही जमाकर्ताओं को रुपए लौटाए जाएंगे। DICGC के इस आदेश के खिलाफ 13 जमाकर्ताओं ने 2008 में हाई कोर्ट में अपील की थी। हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि बैंक पहले जमाकर्ताओं के रुपए लौटाए। इस पर DICGC ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यह आदेश इन 13 जमाकर्ताओं के लिए नहीं बल्कि महाराष्ट्र बैंक सहित देशभर के इस तरह के सभी जमाकर्ताओं के लिए हैं। इस बीच तमाम पेंचों के बाद जमाकर्ताओं को 8.87% अनुपातिक वितरण किया गया। बहरहाल, यह राशि उन जमाकर्ताओं के लिए नाममात्र की थी जिनके लाखों रुपए बैंक में जमा है। ये सालों से अपनी राशि मिलनी का बाट जोह रहे हैं जबकि कुछ की तो निधन भी हो चुका है।

56 करोड़ रु. में से मात्र 7 लाख की रिकवरी
उधर, बैंक पर फिलहाल DICGC व जमाकर्ताओं के 18 करोड़ की देनदारी बकाया है। दूसरी ओर बैंक के डिफाल्टरों की संख्या हजारों में है। बैंक डूबने के दौरान वसूली की यह राशि 20 करोड़ थी जो 17 सालों में ब्याज सहित अब 56 करोड़ रु. से ज्यादा की हो गई है। बैंक को यह राशि भी वसूलना है। पिछले 16 माह के कोरोना काल में वसूली पर भी इसका असर पड़ा और बमुश्किल 7 लाख रु. की राशि ही वसूली जा सकी।

पूरी 6.57 करोड़ राशि मिलने के बाद ही पेमेंट
मामले में 50 से ज्यादा बड़े बकायदारों को कई बार नोटिस जारी किए, लेकिन अब कोरोना काल में आर्थिक संकट का हवाला देकर वे राशि चुकता नहीं कर रहे हैं। यानी 6.57 करोड़ रु. मिलने के बाद बैंक ने बाहर की देनदारियां व कुछ जमाकर्ताओं को राशि लौटा भी दी तो 11.50 करोड़ रु. जमाकर्ताओं के फिर भी शेष रहेंगे। यह राशि डिफाल्टरों से वसूलने के बाद लौटाए जाएंगे, जबकि बीते सालों में ही इनसे वसूली नहीं हो सकी है, जबकि अब तो वे 16 माह के कोरोना काल में आर्थिक मंदी का हवाला दे रहे हैं। बैंक परिसमापक डीएस चौहान के मुताबिक भवनों को बेचने से जो 1 करोड़ रु. की राशि मिली है, उसे अभी जमकर्ताओं में नहीं बांटा जा सकता। जब तीनों भवनों के बाकी 5.57 करोड़ रु. पूरे मिलेंगे, उसके बाद जमाकर्ताओं में इसे अनुपातिक रूप से भुगतान किया जाएगा। उसके बाद डिफाल्टरों से राशि वसूल कर समय-समय पर पेमेंट किया जाएगा।

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