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तलवार धारण:मां काली के हाथों में आज भी रहती है 200 साल पुरानी तलवार

होशंगाबादएक महीने पहले
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रामलीला के दाैरान  प्रतिवर्ष  इसे सजाया जाता है।​​​​​​​ - Money Bhaskar
रामलीला के दाैरान  प्रतिवर्ष  इसे सजाया जाता है।​​​​​​​

सेठानी घाट पर आयाेजित रामलीला के शुुरूआती दाैर में करीब 200 साल पहले जब पात्राें की पाेषकें,स्टेज के पीछे के परदे व साजाे सामान बनारस से बुलवाया जा रहा था। उसी दाैरान रामलीला प्रसंग के लिए मां काली के हाथाें में जाे तलवार दी जाती है उसे भी कलकत्ता से बुलाया गया। यह तलवार अब तक सुरक्षित है और दाे सदी बीतने के बाद आज के दाैर की रामलीला में भी उक्त तलवार मां काली के हाथाें में देखी जा सकती है।

रामलीला उत्सव समिति के संयाेजक प्रशांत दुबे (मून्नू) ने बताया कि रामलीला में प्रसंग है,जिसमें अहिरावण रामादल में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण काे मायाजाल से पाताल लाेक के काली मंदिर में ले जाते हैं। यहां पर अहिरावण उनकी बलि देना चाहता है। इस दाैरान माता काली तलवार धारण करती हैं। रामलीला प्रसंग में काली मां के लिए तलवार कलकत्ता से बुलाई गई थी।

तलवार पर नहीं लगती जंग, साेने की स्याही से फारसी से अंकित है चिन्ह

200 साल पुरानी तलवार का लाेहा अत्यंत गुणवत्ता वाला है। इसमें अब तक जंग नहीं लगी है। रामलीला प्रसंग में मां काली के हाथाें आज भी यही तलवार रहती है। समिति के संयाेजक प्रशांत दुबे ने बताया कि जैस की हमारे पूर्वजाें ने हमें बताया है कि यह तलवार 200 साल पहले कलकत्ता के काली मंदिर से विशेष रुप से बुलाई गई थी।

तवलार पर साेने की स्याही से फारसी भाषा से चिन्ह भी बनाया गया है। तलवार बेहद सुंदर और भारी है। साथ ही रामलीला के दाैरान श्रीराम व लक्ष्मण के पात्राें काे जाे कपड़े पहनाए जाते हैं वह भी काफी पुराने हैं। इनमें चांदी की जरी लगी हुई है। दुबे ने बताया कि रामदरबार में उपयाेग हाेने वाला आसन जिसे राम दरबार कहा जाता है वह भी 5 दशक पुराना है जाे कि अब तक सुरक्षित है। रामलीला के दाैरान प्रतिवर्ष इसे सजाया जाता है।

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