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बैतूल में सहेजी जाती हैं रावण की अस्थियां!:दहन होते ही लकड़ियां बटोरने दौड़ते हैं लोग, कहते हैं- घर में रखने से धन की कमी नहीं होती

बैतूल2 महीने पहले
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बैतूल के लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में रावण दहन के बाद अस्थियां बटोरते लोग।

देशभर में शुक्रवार काे विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों का दहन किया गया। कई जगह रावण की पूजा भी की गई, लेकिन आपको बैतूल में दशहरे पर प्रचलित एक अनोखी प्रथा के बारे में शायद ही जानकारी हो। यहां रावण दहन के बाद उसकी अस्थियां सहेजी जाती हैं। पुतले के जलने के बाद उसकी अस्थियां यानी जली लकड़ी को घर ले जाने की अनोखी रस्म निभाई जाती है। लोगों में इसके लिए होड़ सी मच जाती है। लोगों की मान्यता है कि इससे घर धन-धान्य से भरा रहता है।

बैतूल के लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में पिछले 64 साल से रावण, कुंभकर्ण के पुतलों का दहन श्री कृष्ण पंजाब सेवा समिति करती आ रही है। यहां रावण दहन कार्यक्रम देखने के लिए हजारों लोग पहुंचते हैं। कुछ लोग तो ऐसे होते हैं, जो रावण दहन और आतिशबाजी देखने आते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी लोग रहते हैं, जो बस इस इंतजार में रहते हैं कि कब रावण का दहन हो। जैसे ही रावण दहन होता है, जल रही लकड़ियां को लोग जमीन पर रगड़कर बुझाना शुरू कर देते हैं। इन लकड़ियों को ठंडा कर घर ले जाते हैं और पूजन कक्ष में रख देते हैं। कई लोग ऐसे होते हैं, जो घर के मुख्य हिस्से में लकड़ी को सुरक्षित रख देते हैं। इनकी कोशिश रहती है कि पुतला राख बनने से पहले लकड़ी को कब्जे में ले लिया जाए।

यह है मान्यता
स्टेडियम से लकड़ी लेकर जा रही वर्षा ने बताया कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना है कि लकड़ी घर में रखने से सब कुछ अच्छा होता है। ज्ञानी पंडित होने की वजह से और धन-धान्य से परिपूर्ण होने के कारण उनकी राख और लकड़ी को घर ले जाते हैं, ताकि सुख संपत्ति बनी रहती है। ऐसी मान्यता है कि लकड़ी रखने से धन की कमी नहीं होती।

बैतूल में सिद्धिविनायक ज्योतिष संस्थान के निदेशक पंडित संजीव शर्मा बताते हैं कि इस तरह पुतले की लकड़ी ले जाने को लोग शुभ मानते हैं। इसकी कोई धार्मिक या लिखित मान्यता नहीं है। यह परंपरागत लंबे समय से चली आ रही है। आमतौर पर अस्थियों को घर लेकर नहीं जाते हैं, क्योंकि रावण भगवान राम के हाथ मारा गया था और बहुत ज्ञानी था। इसलिए लोग उसकी अस्थियां प्रतीक के रूप में ले जाते हैं। मान्यता है कि घर में उसकी बुराई न आए, इसलिए भी जली हुई लकड़ियां घर ले जाई जाती हैं।