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न्यूनतम तापमान एक डिग्री और गिरकर 5.2 पर पहुंचा:पहले बारिश फिर धूप न निकलने से गेहूं की फसल पीली पड़ी, किसान डाल रहे यूरिया

दतिया4 महीने पहले
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  • रविवार को दोपहर बाद निकली धूप लेकिन गलन बरकरार, धुआं करने की सलाह

जनवरी के पहले सप्ताह में पांच दिन तक लगातार हुई बारिश और फिर मौसम साफ न होने से फसलों पर काफी असर पड़ा है। बारिश का पानी खेतों में भर जाने से और बादल छाए रहने से फसलें पीली पड़ने लगी हैं। रविवार को दोपहर 12 बजे से आसमान साफ होते ही किसानों ने फसलों में खाद का छिड़काव करना शुरू कर दिया है। किसान खेतों में यूरिया का छिड़काव कर रहे हैं ताकि फसलों को पीला पड़ने से बचाया जा सके। हालांकि रात में तापमान तीन डिग्री तक जा सकता है और इससे फसलों में पाला पड़ सकता है।

खासकर लाल मिट्टी वाले खेतों में खड़ी फसलों में पाले की समस्या आ सकती है। कृ़षि वैज्ञानिक डॉ. अनिल सिंह बताते हैं कि जिन खेतों की मिट्‌टी काली है उनमें नमी बरकरार है इसलिए पाले की समस्या फिलहाल नहीं आएगी। जबकि लाल मिट्‌टी में नमी जल्दी खत्म हो जाती है इसलिए वहां हल्की सिंचाई और शाम के समय धुआं करने की आवश्यकता है। बता दें कि शनिवार को दिन का तापमान आठ साल में सबसे कम 12.4 डिग्री रिकार्ड किया गया था। पूरे दिन धूप नहीं निकली और गलन होती रही। लोगों ने लंबे समय बाद दिन में ऐसी ठंड महसूस की थी।

अलाव और हीटर के सहारे ही पूरा दिन व्यतीत हुआ। मकर संक्रांति पर्व होने के बाद भी शनिवार को पूरे दिन सन्नाटा देखा गया। रविवार को भी सुबह आसमान में बादल छाए रहे और गलन रही। दोपहर 12 बजे मौसम साफ हुआ और धूप निकल आई। तब लोगों को ठंड से राहत मिली। दिन में धूप निकलने से अधिकतम तापमान 1.8 डिग्री बढ़कर 14.2 डिग्री रिकार्ड किया गया तो वहीं न्यूनतम तापमान 1.6 डिग्री गिरकर 5.2 डिग्री रिकार्ड किया गया। रात में तापमान और गिरने की संभावना है। अभी तीन से चार दिन रात में कड़ाके की ठंड से गुजरना पड़ सकता है। लगातार पड़ रही ठंड का असर फसलों पर भी अब दिखाई देने लगा है।

छह जनवरी से नौ जनवरी तक हुई बारिश से खेतों में पानी भर गया और फिर धूप नहीं निकली। जिसकी वजह से फसलों के पत्ते पीले पड़ने लगे हैं। मौसम साफ होते ही किसानों ने गेहूं की फसल में यूरिया का छिड़काव शुरू कर दिया है। ताकि फसल को पीला पन से बचाया जा सके। वहीं कृषि वैज्ञानिक अब पाले की आशंका जता रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार फसल को पाले से बचाने के लिए हल्की सिंचाई और धुआं सबसे उपयुक्त है।

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