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MP सिकल सेल एनीमिया मिशन:जनजातीय क्षेत्र में सर्वे कर सिकल सेल वाहको को आपस में शादी न करने करेंगे जागरूक; गांव-गांव होगी स्क्रीनिंग

भोपाल10 महीने पहले
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को मध्यप्रदेश के जनजातीय गौरव दिवस पर ‘मध्य प्रदेश सिकल सेल मिशन’ अभियान लांच किया। यह जानलेवा बीमारी जनजातीय समुदाय में ज्यादा देखी गई है। इससे प्रदेश के 22 जिले के 89 ब्लॉक प्रभावित हैं। एक जानकारी के अनुसार इस बीमारी के 42 लाख लोग वाहक हैं। 82 हजार गंभीर रूप से पीड़ित हैं। इस बीमारी, उपचार और उपलब्ध सुविधाओं के बारे में विशेषज्ञों से जानते हैं...

क्या है सिकल सेल एनीमिया

डॉक्टरों ने बताया कि यह हीमोग्लोबिनोपैथी मतलब हीमोग्लोबन से संबंधित विकार है। ब्लड में तीन प्रकार की सेल होती है। रेड ब्लड सेल (आरबीसी), वाइट ब्लड सेल (डब्ल्यूबीसी) और प्लेटलेट्स। आरबीसी में हीमोग्लोबिन होता है। हीमोग्लोबिन शरीर में ऑक्सीजन का परिवहन करता है। आरबीसी में थैलेसीमिया, हीमोग्लोबिन-ई, सिकल सेल समेत कई बीमारियां होती है। आरबीसी का आकर गोल होता है। सिकल सेल की बीमारी के कारण आरबीसी का आकर हंसिए की तरह हो जाता है।

इस प्रकार की सिकल सेल जल्दी नष्ट हो जाती है। आरबीसी की कमी से शरीर में ऑक्सीजन की भी कमी होने लगती है। इसके अलावा सिकल सेल थक्का बनाती है। जिससे शरीर में खून का प्रवाह रुकने लगता है। इससे गंभीर दर्द, इंफेक्शन, सीने में दर्द और स्ट्रोक जैसी बीमारियां हो सकती हैं।

सिकल सेल डिजीज के प्रकार

सिकल सेल मुख्यत: दो प्रकार की होती है। एक रोगी और एक रोग वाहक। सिकल सेल रोगी में दोनों जीन खराब होते है। जबकि रोग वाहक सिकल सेल में सिर्फ एक जीन में ही खराबी होती है। यदि माता-पिता दोनों सिकल सेल रोगी है, तो उनके सभी बच्चे सिकल सेल रोगी पैदा होगे। वहीं माता-पिता में से किसी एक से सिकल सेल और दूसरे से नार्मल जीन मिलता है। इन्हें सिकल सेल ट्रेट या वाहक कहते हैं। इसमें बीमारी का बिना जांच के पता नहीं चल पाता। इसमें परेशानी नहीं होती।

कैसे होता है

यह जेनेटिक बीमारी है। सिकल सेल ट्रेट या वाहक माता-पिता के बच्चे में सिकल सेल रोगी होने की संभावना 25% होती है। यानी जन्म के समय ही बीमारी मौजूद रहती है। बच्चों में बीमारी का पता लगभग 6 माह में लग जाता है। बच्चे बार-बार बीमार होने लगते है। इंफेक्शन, सीने में दर्द, जोड़ों में दर्द जैसी कई दिक्कतें होने लगती है। मध्यप्रदेश में 82 हजार लोग गंभीर रूप से सिकल सेल से पीड़ित है। वहीं, 42 लाख लोग सिकल सेल के वाहक है।

इस बीमारी से आदिवासी ही क्यों पीड़ित

जंगल वाली जगहों पर मच्छर की वजह से मलेरिया होता है। इसके पैरासाइट रेड ब्लड सेल्स (आरबीसी) को ही प्रभावित करते हैं। स्टडी के मुताबिक जंगलों में रहने वाली जनजातीय लोगों की बॉडी में मलेरिया से बचने के लिए नेचर ने आरबीसी का आकार ही बदल दिया है। गोल आकार से वह हंसिए के आकार कर दिया है। इसके कारण उनको मलेरिया तो नहीं होता, लेकिन आरबीसी का आकार बदलने से 90 से 120 दिन की आयु वाले आरबीसी पहले ही नष्ट हो जाते हैं।

बीमारी की रोकथाम और इलाज

इस बीमारी की रोकथाम 100% की जा सकती है। जरूरत है जनजागरूकता की। इसमें सिकल सेल वाहक या रोगी यदि सामान्य व्यक्ति से शादी करेंगा तो इस रोग की रोकथाम की जा सकती है। यानी दो रोगी या वाहक व्यक्ति से होने वाली संतान में सिकल सेल होने की संभावना ज्यादा होती है। इसके लिए जेनेटिक काउंसलिंग कॉर्ड से पहचान की जाएगी। वहीं, इससे पीड़ित को हाइड्रोक्सीयूरिया की टेबलेट दी जाती है। जिससे खून की थक्के कम बनते है। साथ ही इस व्यक्ति को बार-बार ब्ल्ड ट्रांसफ्यूजन की भी जरूरत पड़ती है।

सरकारी अस्पताल में उपलब्ध है इलाज

इसके अलावा बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन का स्थायी इलाज है। इसमें रोगी व्यक्ति का बोन मैरो सामान्य व्यक्ति से बदल दिया जाता है। इसका इलाज का खर्च करीब 6 से 10 लाख रुपए तक आता है। प्रदेश में अभी इंदौर मेडिकल कॉलेज एमवाय में उपलब्ध है। बाकी सरकारी अस्पताल में ब्लड ट्रांसफ्यूजन और दवा उपलब्ध होती है।

एमपी के 22 जिले सिकल सेल से प्रभावित

अलीराजपुर, अनूपपुर, बालाघाट, बड़वानी, बैतूल, बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, धार, डिंडोरी, होशंगाबाद, जबलपुर, झाबुआ, खंडवा, खरगोन, मंडला, रतलाम, सिवनी, शहडोल, शिवपुरी, सीधी, सिंगरौली व उमरिया।

क्या है मध्यप्रदेश सिकल सेल मिशन

मध्य प्रदेश सिकल सेल मिशन में सबसे पहले जनजातीय लोगों का सर्वे किया जाएगा। उनमें फैली भ्रांतियां, रोग के बारे में उनकी सोच, पारंपरिक विश्वास और अविश्वास की पहचान की जाएगी। इसके आधार पर मिशन की सफलता के लिए जनजागरूकता की जाएगी।

  • इसके बाद सबसे पहले स्क्रीनिंग गांव-गांव में की जाएगी। इसमें एक बूंद खून की मदद से सोल्यूबिलिटी टेस्ट किया जाएगा। जिससे यह पता चलता है कि यह सिकल सेल से पीड़ित है या नहीं। परंतु इस बात की पुष्टि के लिए की यह व्यक्ति सिकल सेल रोगी है अथवा रोग वाहक के लिए हाई परफार्मेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी (एचपीएलसी) जांच जिला अस्पताल में की जाएगी। इस जांच के लिए दो से तीन एमएल खून लेकर जिला अस्पताल भेजा जाएगा। रिपोर्ट आने पर पीड़ित व्यक्ति को जेनेटिक काउंसलिंग कार्ड प्रदान किया जाएगा। इस पूरे अभियान में मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद की टीम गांव-गांव जाकर आशा व एनएमएन कार्यकर्ता के साथ समन्वय स्थापित कर इस कार्यक्रम की सफलता सुनिश्चित करेंगी।
  • इसके बाद रोगी व्यक्तियों को पास के हेल्थ केयर फेसलिटी में पंजीयन कर उन्हें दवा एवं रक्त चढ़ाने की व्यवस्था की जाएगी।

ऐसे काम करेगा जेनेटिक काउंसिल कार्ड

  • अब सरकार ने मिशन में यह व्यवस्था की है कि जांच के बाद सिकल सेल रोगी और वाहक की पहचान होने पर उन्हें एक विशेष रूप से बनाए कार्ड दिए जाएंगे। जिसके शादी से पहले मिलान करने पर कार्ड तुरंत बता देंगा कि उनके बच्चों में रोग के होने की संभावना कितनी है। साथ ही शादी शुदा सिकल सेल जोड़ा अपने अगले आने वाले बच्चे में रोग की संभावना का भी पता लगा सकता है। यह रोकथाम में एक अहम भूमिका निभाएंगा।
  • कार्ड में नाम, उम्र, रजिस्ट्रेशन नंबर होगा। साथ बच्चों में रोग के होने की संभावनाओं के बारे में भी जानकारी मिल सकेगी। इसमें रोगी, वाहक और सामान्य व्यक्ति के बच्चों में रोग होने की अलग-अलग संभावना लिखी है। साथ ही कलर कोड के माध्यम से अशिक्षित लोगों के लिए सिंबल के माध्यम से दर्शाया गया है।

“ यह बीमारी 100% रोकी जा सकती है। यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण मिशन है। इसमें इस्तेमाल किए जा रहे जेनेटिक कार्ड से प्रदेश में सिकल सेल की रोकथाम बल मिलेगा।”- डॉ. निशांत नांबीसन, प्रोफेसर, होम्योपैथी कॉलेज, भोपाल

“ इसमें जानना जरूरी है कि यह साइलेंट और जेनेटिक बीमारी है। इस बीमारी में सबसे ज्यादा जरूरी है कि विवाह से पूर्व स्क्रीनिंग कर लें। इससे बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। यदि कैरियर का पता चल जाए, तो उनके माता-पिता को काउंसिल कर सकते हैं कि उसको विवाह किसी कैरियर या रोगी से ना हो। ”

- डॉ. एके रावत, शिशु रोग विशेषज्ञ

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