पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Business News
  • Local
  • Mp
  • Bhopal
  • Balaghat... Where Once There Was A Camp Of Naxalites, Now There Is A Rule Of Tigers, From Zero To 28 In Six Years; Special Thing There Is No Territorial Fight In These

वर्ल्ड टाइगर डे आज:बालाघाट... जहां कभी नक्सलियों का डेरा था, वहां अब बाघों का राज, छह साल में जीरो से 28 हुए; खास बात- इनमें नहीं होती टेरेटोरियल फाइट

भोपालएक वर्ष पहलेलेखक: वंदना श्रोती
  • कॉपी लिंक
बालाघाट सब डिवीजन के लालबर्रा क्षेत्र में पानी में बैठा एक बाघ। - Money Bhaskar
बालाघाट सब डिवीजन के लालबर्रा क्षेत्र में पानी में बैठा एक बाघ।
  • मध्यप्रदेश के असंरक्षित क्षेत्रों में भी बढ़ रहे टाइगर, भोपाल में 2006 में एक भी बाघ नहीं था, अब 18 हैं

टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश में अभी 526 बाघ हैं और इनका कुनबा लगातार बढ़ता जा रहा है। खास बात ये है कि प्रदेश के असंरक्षित इलाकों में इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। ये क्षेत्र हैं- बालाघाट वन डिवीजन और भोपाल। बालाघाट वो इलाका है, जहां कभी नक्सलियों का डेरा होता था और आज भी वहां नक्सल मूवमेंट रहता है, इसके बावजूद बीते छह साल में इस इलाके में बाघों की संख्या 0 से 28 हो गई। ये इलाका 1000 वर्ग किमी में फैला है।

इसी तरह भोपाल के 500 वर्ग किमी में फैले वन डिवीजन में 2006 में एक भी बाघ नहीं था, अब 18 से ज्यादा हैं। वर्ल्ड वाइल्ड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) सेंट्रल इंडिया के वॉलंटियर सोमिन डे बताते हैं कि बालाघाट वन डिवीजन में बाघों की संख्या ज्यादा होने से उनके पग मार्काें पर ओवर लैपिंग होती रहती है, इसके बावजूद यहां बाघों की टेरेटोरियल फाइट की आज तक एक भी घटना नहीं हुई। बाघों की अगली गिनती 2022 में होनी है, तब तक यहां बाघों की संख्या निश्चित तौर पर 40 के आसपास हो जाएगी। इसके उलट पेंच और कान्हा नेशनल पार्क में बाघ अपनी टेरेटरी मार्क कर लेते हैं, क्योंकि वहां का वातावरण उनके अनुकूल है, इसलिए वहां टेरेटोरियल फाइट ज्यादा होती हैं।

इसलिए बढ़ गए बाघ : पहले जो आदिवासी नक्सलियों का साथ देते थे, वे अब बाघों की रक्षा कर रहे

बालाघाट के आदिवासी पहले नक्सलियों के बहकावे में आकर उनमें शामिल हो जाते थे। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने इन्हीं आदिवासियों को अपना वॉलंटियर बनाया। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ सेंट्रल इंडिया, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के वॉलेंटियर्स ने छह साल इस इलाके में आदिवासियों को जागरूक किया। उन्हें बताया कि किसी भी वन्य प्राणी के शिकार से एक नहीं, पूरा परिवार परेशान होता है। जेल अलग जाना पड़ता है। इस बात को यहां की नई पीढ़ी ने समझा। उन्होंने शिकार करना छोड़कर वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोग करना शुरू कर दिया। डिपार्टमेंट अब यहां के आदिवासियों और ग्रामीणों से शहद, अचार, चिरौंजी सहित अन्य वनोपज को खरीदकर उनको बाजार उपलब्ध कराता है। वे बिचौलियों के बजाय सीधे सामान बेचते हैं, जिससे इनको रोजगार मिलता है।

पहली बार बालाघाट में बाघ रह रहे हैं

बालाघाट वन डिवीजन कान्हा और पेंच नेशनल पार्क के बाघों का काॅरिडोर रहा है। यहां पर पहले कभी बाघों ने अपना रहवास नहीं बनाया। नक्सल प्रभावित इलाका होने की वजह से कई बार यहां शिकार की सूचना जरूर मिलती थी। अब यहां 28 बाघ हैं, जिनका रिकॉर्ड वन विभाग रख रहा है। - नरेंद्र कुमार सनोडिया, सीसीएफ, बालाघाट