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संकट में शान:22 हजार कर्मियों से शुरू हुआ एचईसी 8 साल पूर्व 299 कराेड़ के मुनाफे में था, अब 3400 कर्मियों के लिए वेतन भी नहीं

रांची2 महीने पहलेलेखक: संजय सिंह
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  • 2 बार बीमार हुई एचईसी बीआईएफआर में गई, पर राज्य और केंद्र सरकार ने संभाला, अब फिर मुश्किल में

22 हजार कर्मचारियाें के साथ 1963 में शुरू हुई देश की मदर इंडस्ट्री एचईसी के पास कर्मचारियों को वेतन देने के पैसे नहीं हैं। 8 साल पहले (2013-2014) 299 कराेड़ रुपए का मुनाफा कमाने वाली कंपनी के पास आज सिर्फ 3400 स्थायी-अस्थायी कर्मचारियाें-अफसराें काे वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं।

कर्मचारियाें काे 7 माह से ताे अधिकारियाें काे 8 माह से वेतन नहीं मिला है। कामगार बकाया वेतन के लिए 5 दिनाें से हड़ताल पर हैं। साेमवार काे निगम मुख्यालय में तैनात डिप्टी मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर स्तर के अफसर सहित कर्मचारी भी हड़ताल पर चले गए, जिससे मुख्यालय का भी कामकाज ठप हाे गया है। उधर तीनाें प्लांटाें एचएमबीपी, एफएफपी और एचएमटीपी में 5वें दिन भी काम ठप रहा। कामगाराें ने प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी की, ताे अफसराें ने मुख्यालय के समक्ष नारेबाजी और नुक्कड़ सभा की।

एचईसी 1991 व 2002 में बीमारू कंपनी भी घाेषित हुई
एचईसी पिछले कुछ सालाें से लगातार घाटे में चल रही है। कंपनी ने 2008-09 में 16.11 करोड़ का मुनाफा कमाया था। इससे पहले कंपनी ने 1975-76 में 2 करोड़ और 1976-77 में 3.26 करोड़ का मुनाफा कमाया था। 2015- 2016 तक कंपनी मुनाफे में रही। सबसे अधिक मुनाफा 1988-89 में 12 करोड़ रुपए कमाया था। लेकिन 1991 और 2002 में कंपनी की हालत खराब हुई थी। तब इसे बीमारू कंपनी घोषित कर औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) में डाल दिया गया था। बीआईएफआर ने फरवरी 2003 में एचईसी प्रबंधन को रिवाइवल प्राेजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर भेजने को कहा। तब केंद्र और राज्य सरकार ने एचईसी को बचाने को पैकेज रिपोर्ट भेजी थी। हांलाकि इसके बाद कंपनी की स्थिति में सुधार हुआ था।

ऐसे अर्श से फर्श पर आती गई देश की शान एचईसी

  • 1. वर्क ऑर्डर कम हुए, लायबिलिटी बढ़ी: 90 के दशक में ओपन मार्केट की वजह से एचईसी काे वर्कऑर्डर की कमी हाेने लगी। सरकारी उद्याेगाें काे भी जहां सस्ती मशीनें मिलतीं, उसी को वर्कऑर्डर देने लगे। धीरे-धीरे कंपनी का वर्कऑर्डर कम हाेता गया, लायबिलिटी बढ़ती गई।
  • 2. मशीनों का आधुनिकीकरण नहीं हुआ: एचईसी की मशीनें 1960 में ही स्थापित की गईं थीं। नई मशीनों से उत्पादन कर समय पर वर्कऑर्डर पूरा किया जाने लगा। लेकिन 90 का दशक आते-आते मशीनें पुरानी पड़ती गईं। नतीजतन उत्पादन पर असर पड़ने लगा।
  • 3. आधुनिकीकरण पर 100 से ज्यादा एमओयू,पर हुआ कुछ नहीं: मार्केट की चुनाैतियाें से निबटने के लिए मशीनों के आधुनिकीकरण के साथ नई तकनीक लाने के लिए प्रबंधन ने 100 से अधिक एमओयू ताे किए, लेकिन एक भी धरातल पर नहीं उतर सका। कंपनी में न नई तकनीक आई और नई मशीनें लग सकीं।
  • 4. भुगतान में भी विलंब: मशीनें पुरानी पड़ने के कारण कंपनी समय पर कार्यादेश पूरा न कर सकी, ताे पब्लिक सेक्टर की कंपनियाें से भी वर्क ऑर्डर मिलना कम हाेता गया। या लगभग बंद ही हाे गया। चूंकि कंपनी समय पर वर्कऑर्डर पूरा नहीं कर सकी, ताे पेमेंट में विलंब हाेता गया।
  • 5. पहला झटका कोल इंडिया से मिला: काेल इंडिया से कंपनी ने 5 क्यूबिक मीटर क्षमता के 8 शॉवेल निर्माण का ऑर्डर लिया। 3 का निर्माण पूरा भी कर लिया, लेकिन बाद काेल इंडिया ने लेने से मना कर दिया कि उसे अभी इसकी जरूरत नहीं है। नतीजतन कंपनी का फंड ब्लॉक हाे गया।

एचईसी में कर्मचारियों के बाद अधिकारी भी उतरे हड़ताल पर

7 माह से बकाये वेतन की मांग को लेकर साेमवार काे 5वें दिन भी कामगाराें ने टूल डाउन हड़ताल जारी रखी। उधर कामगाराें के समर्थन में एचईसी मुख्यालय के डिप्टी मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर स्तर के अफसर और कर्मचारी भी सोमवार काे हड़ताल पर चले गए। ऑफिसर्स एसोसिएशन के सदस्याें ने सुबह से शाम तक मुख्यलय कैंपस में विरोध-प्रदर्शन किया। एचईसी में ऐसा पहली बार हो रहा है कि ऑफिसर्स भी स्ट्राइक पर चले गए हैं। ​​​​​​​

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