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  • Medical Teachers Were Not Recruited, So 36 Specialist Doctors Could Not Be Made, The Departments Of Medicine And Plastic Surgery Were Closed.

कोरोना में भी मेडिकल ढांचा खराब:मेडिकल टीचर भर्ती नहीं किए, इसलिए नहीं बन पाए 36 विशेषज्ञ डॉक्टर, मेडिसिन और प्लास्टिक सर्जरी विभाग तो बंद ही कर दिए

सूरतएक महीने पहलेलेखक: सूर्यकांत तिवारी
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कोरोना महामारी, जिसने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। मेडिकल सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया। वहीं, दक्षिण अफ्रीका में मिले कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन ने सरकारों को फिर से चिंता में डाल दिया है। इतना कुछ होने के बावजूद दक्षिण गुजरात के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सूरत के सिविल अस्पताल में मेडिकल टीचरों की कमी चिंताजनक है। इसका मुख्य कारण है, राज्य सरकार का उदासीन रवैया।

दरअसल, सिविल अस्पताल में पिछले दो सालों से 27 मेडिकल टीचरों की कमी है, इनकी नियुक्ति नहीं हो पा रही है। इसकी वजह से पीजी के छात्रों को एडमिशन नहीं मिल रहा है। इससे पीजी की 12 सीटें खाली जा रही हैं। यानी तीनों साल का आकलन करें तो 36 छात्र विशेषज्ञ डॉक्टर बनने से वंचित रह गए। चौंकाने वाली बात यह भी है कि एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफसर और प्रोफेसरों की कमी के कारण इमरजेंसी मेडिसिन विभाग और प्लास्टिक सर्जरी विभाग तक बंद हो चुके हैं।

इसको लेकर कॉलेज प्रबंधन कई बार सरकार का अवगत करा चुका है। स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखकर अपनी चिंता भी जाहिर कर चुका है। लेकिन अभी तक सरकार ने टीचरों की कमी को पूरा करने की कोई कार्रवाई नहीं की है। वहीं, दूसरी ओर पीजी की सीटें खाली होने और टीचरों की कमी से बाकी डॉक्टरों का वर्क लोड काफी बढ़ गया है। ऐसे में अगर तीसरी लहर या कोई नया वैरिएंट दस्तक देता है, तो डॉक्टरों की कमी के कारण उससे निपटना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।

इधर, मनपा संचालित अस्पताल स्मीमेर में यूजी की सीटों को लेकर समस्या बनी हुई है। कॉलेज में 250 सीटें हैं, लेकिन हाल ही में नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) की टीम कॉलेज में निरीक्षण करने आई थी, उन्होंने स्टाफ की कमी को देखते हुए सभी सीटों की अनुमति नहीं दी थी। हालांकि स्मीमेर प्रशासन का कहना है कि जो भी कमियां थीं, वे दूर कर दी गई हैं, इसलिए सभी सीटों को भरने की अनुमति मिलने की उम्मीद है।

कमी पूरी हो तो रोजाना और 1400 मरीजों को लाभ मिल सकेगा
नियमानुसार एक डॉक्टर हर दिन 19 से 22 मरीजों का इलाज कर सकते हैं। हालांकि सरकारी अस्पतालों में एक डॉक्टर पर 100 से अधिक मरीजों का वर्क लोड रहता है। अगर 27 प्रोफेसर और 36 पीजी के छात्र (रेजिडेंट) इन सभी की कमी पूरी हो जाए तो रोजाना और 1400 मरीजों को लाभ मिल सकता है।

इन विभागों में इतने शिक्षकों की कमी
टीबी चेस्ट विभाग:
एक एसोसिएट प्रोफेसर, एक असिस्टेंट प्रोफेसर और एक प्रोफेसर की कमी के कारण मात्र 4 छात्रों को ही एडमिशन दिया गया।
आईएचबीटी विभाग: एक एसोसिएट प्रोफेसर और एक प्रोफेसर की कमी के कारण एक छात्र को ही एडमिशन मिला।
स्किन विभाग: एक प्रोफेसर की कमी होने के कारण तीन को ही एडमिशन मिल पाया है।
मेडिसीन विभाग: यहां सबसे ज्यादा 13 असिस्टेंट प्रोफेसरों की कमी है। इस कारण 18 सीटें ही भर पाई हैं।
इमरजेंसी मेडिसिन विभाग: अब कोई मेडिकल टीचर ही नहीं है। इसलिए इस साल एडमिशन नहीं हुआ। यहां एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रोफेसर की आवश्यकता है। इसलिए यह विभाग ही बंद हो गया।
प्लास्टिक सर्जरी विभाग: यहां भी असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर नहीं है। इसलिए इस विभाग को भी बंद कर दिया गया है।
ईएनटी विभाग: यहां भी 1 असिस्टेंट प्रोफेसर की जरूरत। {सर्जरी विभाग: इस विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर की कमी है।

मेडिकल शिक्षकों की कमी है, इसलिए हमारे दो विभाग बंद हो गए हैं। इस बारे में कई बार स्वास्थ्य विभाग से गुहार लगा चुके हैं। कई बार पत्र भी लिखा जा चुका है। हालांकि अभी जीपीएससी चल रहा है। देखते हैं, आगे क्या होगा। प्रोफेसरों की कमी से ही सीटें नहीं भर पा रहे हैं।
-डॉ. ऋतंभरा महेता, डीन, सरकारी मेडिकल कॉलेज, सूरत

कुछ समय पहले एनएमसी की टीम जांच के लिए आई थी। यूजी के लिए सभी 250 सीटों की अनुमति नहीं मिली है। हालांकि 12 एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्ति की गई है। पांच का इंटरव्यू भी हो चुका है। -डॉ. जितेंद्र दर्शन, डीन, स्मीमेर मेडिकल कॉलेज, सूरत

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