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रायपुर में छह महीने की बच्ची का लिवर ट्रांसप्लांट:पिता ने बेटी को दिया लीवर, 8 से 9 घंटे तक चला ऑपरेशन, सेंट्रल इंडिया का ऐसा पहला मामला

रायपुर2 महीने पहले
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जी भर निहार लूं। - Money Bhaskar
जी भर निहार लूं।
  • }राजधानी के रामकृष्ण केयर अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने किया सफल ऑपरेशन, बेटी और पिता दोनाें स्वस्थ

6 माह की बेटी ताक्षी सिन्हा को पिता लव सिन्हा के लिवर डोनेट करने से राजधानी के रामकृष्ण केयर अस्पताल में एक नई जिंदगी मिल गई। दरअसल ताक्षी को जन्म से ही पीलिया की शिकायत थी पीलिया बढ़ते बढ़ते 27 से 29 (बिलिरुबिन काउंट) के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था। ताक्षी का लिवर पूरी तरह डैमेज हो गया, ऐसे में ट्रांसप्लांट के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।

बच्ची का वजन 5 किलो था लिवर ट्रांसप्लांट के लिए ये वजन और उम्र दोनों ही बहुत कम थी। इस चुनौती के बीच पूरे मध्य भारत का अपनी तरह का पहला जटिल लिवर ट्रांसप्लांट रायपुर में किया गया। ट्रांसप्लांट के बाद बेटी और पिता पूरी तरह स्वस्थ हैं। इस ट्रांसप्लांट को अंजाम देने वाले अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. संदीप दवे, गैस्ट्रो सर्जन डॉ. अजीत मिश्रा व डॉ. मोहम्मद अब्दुल नईम की कलम से पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

10 हजार बच्चों में से किसी एक बच्चे को बिलेरी एट्रेसिया की लिवर से जुडी़ दुर्लभ किस्म की बीमारी होती है। बच्चों में ये रोग जन्मजात ही होता है। इस बीमारी में पित्त की नलियां ब्लॉक हो जाती हैं, इससे पीलिया बढ़ने लगता है। पीलिया लगातार बढ़ने से लिवर लगातार डैमेज होने लगता है। लिवर में खराब पानी बढ़ने से कुछ महीनों के भीतर बच्चे की मौत भी हो जाती है। ताक्षी के केस में उसके मां पिता को इस बीमारी के बारे में पता ही नहीं चल पाया पीलिया मानकर वो झांड़ फूंक जैसे इलाज करवाते रहे। इससे बिलिरुबीन काउंट बढ़ता बढ़ता 27 से 29 तक के लेवल पर आ गया, ऐसी स्थिति में ताक्षी के मां पिता जब उसको लेकर हमारे अस्पताल आए तो हमने जांच के जरिए पाया कि उसका लिवर डैमेज हो गया है। ट्रांसप्लांट के विकल्प पर पूरा परिवार हमारी सलाह पर राजी हो गया। करीब 9 घंटे की जटिल सर्जरी के बाद हमारी टीम ने ये सफल ट्रांसप्लांट किया। दरअसल, एक साल से कम उम्र के बच्चे का लिवर ट्रांसप्लांट बहुत ज्यादा जटिल होता है, बच्चों की पित्त की नसे नलियां बहुत छोटी होती हैं। फिर बच्चे के पेट का आकार भी बहुत छोटा होता है। बडी़ उम्र के डोनर का लिवर बच्चे के शरीर में एडजेस्ट कर सके इसके लिए डोनर के लिवर की भी ग्राफ्टिंग करनी होती है। सर्जरी के दौरान नलियों में रक्त का प्रवाह बनाए रखना भी इतने छोटे बच्चे के लिहाज से चैलेंज भरा हो जाता है। ताक्षी के केस में उसका वजन 5 किलो से कम होना भी एक बडा़ कांपिलिकेशन था आम तौर पर 10 किलो के बच्चों का लिवर ट्रांसप्लांट किया जाता है। इस ट्रांसप्लांट के लिए हमने ताक्षी के पिता के लिवर का 25 प्रतिशत हिस्सा लिया।

ट्रांसप्लांट के बाद पीलिया घटकर 2 पर
डॉक्टरों के मुताबिक ताक्षी का बिलिरुबीन कांउट ट्रांसप्लांट के बाद 27 से घटकर 2 पर आ गया है। हफ्ते दस दिन में ये भी सामान्य हो जाएगा। बच्ची अच्छी तरह खा पी और खेल रही है। पोस्ट सर्जरी सुपरविजिन में अभी कुछ दिन और वो मेडिकल आब्जरवेशन में रहेगी। जबकि लिवर डोनेट करने वाले उसके पिता भी पूरी तरह ठीक है। 25 प्रतिशत लिवर डोनेट करने के बाद उनके लिवर की 70 से 80 फीसदी तक रिकवरी दो तीन हफ्तों में ही हो जाएगी।

जन्मजात बीमारी, बच्चे के बिहेवियर पर नजर रखना जरुरी
आमतौर पर बच्चों में जन्म के साथ पीलिया होना एक कॉमन बीमारी है, लेकिन इस तरह के मामले में पीलिया कम नहीं होकर लगातार बढ़ता रहता है। पित्त की नलियां इस बीमारी में विकसित नहीं हो पाती हैं। शुरूआत के कुछ दिन बच्चे का ग्रोथ सामान्य रहता है फिर बुखार, बच्चे की फीडिंग से रुचि घटने लगती है। बच्चा खाना पीना कम कर देता है, उल्टी होना, बुखार आना जैसी शिकायतें हो तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

  • ताक्षी को लिवर डोनेट करने मेरे अलावा उसकी मां सीमा और नाना रोमनाथ हम तीनों तैयार थे। तीनों का ब्लड ग्रुप मैच कर गया, लेकिन डॉक्टरों ने मुझे चुना। मेरे लिए यह सौभाग्य है, लोग कहते हैं बेटी पराया धन है, पर मैं कहूंगा बेटी वरदान है। - लव सिन्हा, ताक्षी के पिता
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