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पर्व की परंपरा:भगवान जगन्नाथ का नेत्रोत्सव धूमधाम से मनाया उनकी हर लीला में छिपा है समाज के लिए संदेश

देवभोग2 महीने पहले
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बुधवार को भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार किया गया। - Money Bhaskar
बुधवार को भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार किया गया।

तबीयत ठीक होते ही महाप्रभु जगन्नाथ मौसी के घर जाने के लिए तैयार हो गए। बुधवार को उनका श्रृंगार कर धूमधाम से नेत्रोत्सव मनाया गया। अब 1 जुलाई को रथयात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली जाएगी। भगवान के बीमार पड़ने से लेकर मौसी के घर की यात्रा व प्रसाद ग्रहण ये सभी जनकल्याण के लिए किए गए थे। यथा-बीमार पड़ने पर पट बंद कर क्वारेंटाइन रहना, काढ़ा पीना और अंकुरित प्रसाद सभी परंपराओं में समाज के लिए संदेश निहित है।

परंपरानुसार बुधवार को देवभोग के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ का नेत्रोत्सव धूमधाम से मनाया गया। मान्यता के मुताबिक ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान बीमार हो जाते हैं और उनके आराम के लिए 15 दिनों तक भगवान के मंदिर का पट बंद रहता है। आषाढ़ प्रतिपदा को भगवान के मंदिर के पट खोले जाते हैं। उससे पहले वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जीवन्यास किया जाता है, फिर नए वस्त्र से लेकर आभूषण से सुसज्जित कर नए कलेवर में उन्हें स्थापित किया जाता है।

यहां के जगन्नाथ प्रभु को सवा दो किलो चांदी के आभूषणों मुकुट, करधन, बाहुटी व शंख से सुसज्जित किया जाता है। भगवान के श्रृंगार के बाद दर्शन के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी थी। दोपहर को भोग भंडारे का आयोजन कर प्रसादी वितरण भी किया गया। मंदिर के पुजारी पंडित शरदचंद्र ने कहा कि आषाढ़ दूतिया यानी 1 जुलाई को विधिवत रथयात्रा निकाली जाएगी।

इसलिए देवभोग पड़ा नाम

18वीं शताब्दी में इस जगह का नाम कुसुमभोग था। 1854 में जब मिच्छ मुंड पुरी से जगन्नाथजी की दारू ब्रम्हस्वरूप एकल मूर्ति को लेकर आये तो उसकी पूजा पाठ शुरू हो गई। 1870 से 1890 के बीच लोगों ने भगवान को भोग चढ़ाना शुरू कर दिया । इलाके में काली मूंग की बम्फर पैदावारी होती थी जिससे यह भगवान को चढ़ने लगी। फिर यह तय हुआ कि यही काली मूंग पुरी भी जाएगी। 18वीं शताब्दी में ही इसका नाम कुसुमभोग से देवभोग करने का उल्लेख जगन्नाथ मंदिर में मौजूद ताड़पत्र के अभिलेख में दर्ज है।

रथयात्रा से जुड़ी महाप्रभु की लीला संदेश भी देती है

भगवान जगन्नाथ के सभी अवतार जनकल्याण के लिए ही थे। भगवान के बीमार पड़ने से लेकर मौसी के घर की यात्रा व प्रसाद ग्रहण ये सभी जनकल्याण के लिए किए गए थे। ज्योतिर्विद पंडित बसंत कुमार बेहेरा ने भगवान की लीला से जुड़े तथ्यों को विस्तार से भास्कर से साझा किया...

1. अंकुरित भोजन में पौष्टिक तत्व मिलते हैं

भगवान जगन्नाथ को इस समय मूंग के अंकुरित प्रसाद का भोग लगाया जाता है। बीमार अवस्था के बाद अंकुरित भोजन के सेवन से पौष्टिक तत्व मिलते हैं। यह शुगर,केलोस्ट्रॉल से लड़ने की ताकत भी प्रदान करता है। ऋतु परिवर्तन के इस काल में सभी सावधानियों के अलावा संतुलित आहार लेने की वैदिक विधि का पालन हमें अनिवार्य से करना चाहिए ।

2. रिश्तों को जोड़ने का प्रतीक माना गया

भगवान जगन्नाथ की यह यात्रा भाई बहन के प्रगाढ़ प्रेम का भी प्रतीक मानी गई है। विवाह उपरांत भी भगवान पत्नी के साथ नहीं बल्कि अपनी बहन सुभद्रा व बड़े भाई बलभद्र के साथ मौसी गुंडिचा के घर जाते हैं। विवाह उपरांत अक्सर इन रिश्तों से दूरी बन जाती है। यात्रा के माध्यम से दूर के रिश्ते को जोड़ने का संदेश छिपा है।

3. भक्तों को दर्शन लाभ देना भी प्रभु का उद्देश्य था

ज्योतिर्विद बेहेरा बताते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद भगवान के गर्भगृह से निकलने की घटना जितनी अद्भुत है उसके पीछे छिपे कारण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यह पहले भगवान हैं जो मंदिर से बाहर आते हैं। जीवन्यास के बाद महाप्रभु के दर्शन को लाभ व पुण्यकारी माना गया है जो भक्त मंदिर नहीं आ सकते उन्हें दर्शन देने स्वयं भगवान मंदिर के बाहर निकल जाते हैं।

4. संक्रमण से बचने की सीख, क्वारेंटाइन भी वैदिक पध्दति

108 घड़े के जल से स्नान के बाद बीमार पड़ने की मान्यता बताती है कि अत्यधिक स्नान व शीतल व ठहरा हुआ जल बीमार होने का कारण बनता है, इसमें बचने का संदेश छिपा है। बीमार पड़ने के बाद 15 दिनों के लिए पट बन्द कर भगवान का एकांतवास मे जाना, संक्रमण से बचने की सीख देता है।

पंडित बसन्त बेहेरा बताते हैं कि 14 दिन का होम क्वारेंटाइन नई बात नहीं थी। चिकित्सा विधि में यह प्रमाणित है कि किसी भी प्रकार के संक्रमण चक्र को खत्म करने इतना समय लग ही जाता है। भगवान के काढ़ा पीने का जिक्र भी शास्त्रों में है। सर्दी जुकाम या संक्रमण से बचने औषधीय गुणों से युक्त प्रकृतिक सामाग्री का काढ़ा लाभदायक होता है।

5. अंक 9 वैदिक और धर्मशास्त्र में पूर्णांक माना

भगवान मौसी के घर 9 दिन ही रुकते हैं, धर्म व वैदिक शास्त्र में अंक 9 को पूर्णांक माना गया है। इसका बड़ा महत्व है, वह इसलिए कि 9 के पहाड़े में आने वाले प्रत्येक अंक का योग फल 9 ही होता है। मंत्रजाप हो या पूर्णाहुति देना हो या फिर बेलपत्र चढ़ाना हो 108 या 54 या फिर 27 इनमें भी अंकों का योगफल 9 ही आता है।

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