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डीएलएफ कर रहा था लाइसेंस रिन्यू कराने की मांग:वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट का लाइसेंस रद्द, निर्माण पर भी रोक

चंडीगढ़3 महीने पहले
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राबर्ट वाड्रा - Money Bhaskar
राबर्ट वाड्रा

रॉबर्ट वाड्रा की स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट ने लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह उसी जमीन का लाइसेंस है, जिसे लेकर वाड्रा की कंपनी और डीएलएफ में करार हुआ था। यह मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक सुर्खियों में रहा। भाजपा ने भी कांग्रेस और सोनिया गांधी तक को इस पर खूब घेरा था।

मामले के अनुसार इस जमीन को वाड्रा ने खरीदकर आगे डीएलएफ को बेच दिया था। इस जमीन की म्यूटेशन तक भी हो चुकी थी। 2012 में कंसोलिडेशन डिपार्टमेंट के तत्कालीन महानिदेशक अशोक खेमका ने इसे रद्द किया था। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट के निदेशक ने आदेशों में उक्त जमीन पर किसी भी प्रकार की निर्माण गतिविधि पर भी रोक लगा दी है।

गड़बड़ी - सस्ती जमीन खरीद महंगी बेची
4 जनवरी 2008 में ओंकारेश्वर प्रॉपर्टी प्राइवेट लिमिटेड ने गुड़गांव के गांव शिकोहपुर में 3.53 एकड़ जमीन पर कॉमर्शियल कॉलोनी के लिए लाइसेंस लिया था। बाद में यह जमीन वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट को बेच दी गई। स्काई लाइट ने नए टाइटल के साथ स्क्रूटनी फीस समेत आवेदन किया।

28 मार्च 2008 को 2.701 एकड़ जमीन का लेटर ऑफ इंटेंट जारी हुआ। साथ ही 30 दिनों में सभी कम्प्लाइंस पूरा करने के लिए कहा गया। 22 अगस्त, 2008 में डीएलएफ रिटेल डेवलपमेंट ने कॉम्पलाइन जमा कराया। साथ ही स्काई लाइट के साथ कोलाबरेशन एग्रीमेंट भी जमा कराया। यानी अब यह प्रोजेक्ट डीएलएफ पूरा करेगा।

एक बांड भी जमा कराया गया, जिसमें लिखा था कि जमीन का मालिक नहीं बदलेगा। कुछ दिनों के बाद ही 15 दिसंबर को कॉमर्शियल कॉलोनी बनाने के लिए लाइसेंस के लिए आवेदन किया गया। 20 मई, 2012 में कॉलोनी का बिल्डिंग प्लान अप्रूव हो गया। जिसमें मई 2017 तक इसे अप्रूव किया गया।

यानी तब तक कॉलोनी का निर्माण होना चाहिए था, लेकिन डीएलएफ चाहता था कि उसका लाइसेंस रिन्यू हो जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डीएलएफ ने 2011 में नए लाइसेंस के लिए आवेदन किया था, जो अप्रूव हो गया था। 90 दिनों में दस्तावेज जमा कराने थे, लेकिन समय बढ़ाने की मांग की गई और अधिकारियों ने मान भी लिया था।

सेल डीड मांगी गई तो वह भी जमा करा दी गई। इसके बाद लाइसेंस ट्रांसफर कराने के लिए आवेदन किया तो इसकी जांच हुई। तब तत्कालीन डीजी खेमका ने इस पर आपत्ति की और गड़बड़ी बताते हुए म्यूटेशन रद्द कर दिया था। लाइसेंस जो रिन्यू हुआ, उस पर भी ऑब्जेक्शन लगे। कहा था कि वेंडर के फेवर में लाइसेंस रिन्यू किया गया है। इसके बाद लगातार प्रशासनिक कार्यवाही चलती रही। बताया गया है कि स्काई लाइट ने जमीन सस्ती दर पर खरीदकर महंगी कीमत पर बेची थी।