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शौच में खून आने को बवासीर ही न समझें:भारत में गलत खान-पीन के कारण तेजी से बढ़ रही है IBD बीमारी

चंडीगढ़एक महीने पहले
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प्रतीकात्मक तस्वीर

शौच में खून आने को सिर्फ बवासीर ही न समझें। यह इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) भी हो सकती है। इस बीमारी की देश में जागरुकता की कमी है। सही समय पर इसका पता न चलते पर मरीज की स्थिति गंभीर भी हो सकती है। पीजीआई में इस बीमारी से जुड़े मरीजों की संख्या बढ़ रही है। आज वर्ल्ड आईबीडी दिवस है। यह आंतों में सूजन (इंफेक्शन) वाली स्थिति है। एक अनुमान के मुताबिक देश में लगभग 15 लाख लोग इस बीमारी से ग्रसित हैं।

पीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग की हेड प्रोफेसर उषा दत्ता ने बताया कि इस बीमारी में छोटी और बड़ी आंत की लाइनिंग में जब जख्म हो जाते हैं तो मरीज को दर्द होता है। इसमें उसे दर्द और दस्त भी हो सकते हैं। दस्त में खून भी हो सकता है। शौच में खून आने को सिर्फ बवासीर न समझें। व्यक्ति 3 से 4 साल बवासीर का इलाज करवाता रहता है। इसमें कई बार मरीज देसी इलाज करवाता है और कभी सर्जन के पास चला जाता है। हालांकि आईबीडी की जानकारी का अभाव होने के चलते मरीज अस्पताल आने में काफी वक्त लगा देता है।

लगातार दस्त या खूनी दस्त आए तो विशेषज्ञ को दिखांए

डॉ. उषा ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अगर सप्ताह से अधिक दस्त या खूनी दस्त हों, पेट में दर्द हो तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं। सप्ताह तक दस्त किसी इंफेक्शन के कारण हो सकते हैं। दवाई के बाद भी यदि उसमें फर्क न पड़ रहा हो और 2 सप्ताह से अधिक दस्त आ रहें हो तो किसी बड़े अस्पताल में जरूर चेकअप करवाएं। वहीं उन्होंने कहा कि दस्त और शौच में खून आने की स्थिति में सीधा केमिस्ट से दवाई लेने की बजाय विशेषज्ञ से चेक जरुर करवाएं।

प्रोफेसर उषा दत्ता आईबीडी बीमारी की जानकरी देते हुए।
प्रोफेसर उषा दत्ता आईबीडी बीमारी की जानकरी देते हुए।

बदलता खान-पीन बड़ा कारण

डॉ. दत्ता के मुताबिक आईबीडी मुख्य रुप से दो प्रकार की होती है। इसमें एक अल्सरेटिव कोलाइटिस और दूसरी क्रोहन डिजीज है। भारत में आईबीडी तेजी से बढ़ रही है और बदलते खानपान और पश्चिमी लाइफ स्टाइल इसका एक बड़ा कारण है। कुछ स्टडी में सामने आया कि उत्तर भारत में आईबीडी पश्चिमी दुनिया जितना सामान्य हो चुका है। इस बीमारी के कई कारण हैं। यह जेनेटिक भी हो सकता है, इम्यून प्रतिक्रिया और डाइट में बदलाव भी एक कारण हो सकता है।

डॉ. दत्ता ने कहा कि पहले भारत में यह बीमारी नहीं थी। अब तनाव और पश्चिमी खान-पान के चलते यह बीमारी बढ़ी है। फ्रेंच फ्राइस, बर्गर, पास्ता, नूडल्स आदि बढ़ा है और सब्जियों तथा फ्रूट की जगह कम हुई है। ऐसे में घर में बना हुआ ताजा खाना ही बेहतर विकल्प है। बाहरी खाने में पेस्टिसाइड्स, प्रिजर्वेशन, केमिकल्स, आर्टिफिशियल कलर आदि चीजें हानिकारक होती हैं। डॉ. दत्ता ने कहा कि होटल, ढाबों आदि के खाने समेत घरों में आने वाले डिब्बा बंद खाने से परहेज करना चाहिए। खाने वाले को नहीं पता होता कि यह कहां बना है और किस माहौल में बनाया गया है।

इसे पेट की सामान्य बीमारी न समझें

यह बीमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति का लिंग को प्रभावित कर सकती है। इस बीमारी से जुड़े मरीजों को पेट में दर्द की शिकायत होती है। दस्त लगना और शौच में खून आना भी इसके लक्षण हो सकते हैं। समाज में इस बीमारी के प्रति जागरुकता की कमी के चलते इसका देरी से पता चलता है। इसके और पेट की अन्य बीमारियों के लक्षण एक से होने के चलते इस बीमारी का कई बार पता ही नहीं चल पाता।

प्रतीकात्मक तस्वीर।
प्रतीकात्मक तस्वीर।

डॉ. दत्ता ने कहा कि लोगों की ट्रैवल और वर्किंग कंडीशन के चलते भी बाहर का खाने में इजाफा हुआ है। घरों में पहले के मुकाबले अब तेज की शुद्धता भी कम हुई है। रिफाइनिंग वाले तेल में कई अच्छे पदार्थ निकल जाते हैं। इसके अलावा लोग धूप में कम निकल रहे हैं और आर्टिफिशियल लाइट में ज्यादा रह रहे हैं। इससे भी दिक्कत हो रही है। वहीं फ्रिज में लंबे समय से रखा खाना खाने और माइक्रोवेव आदि में गर्म किया खाना खाने से भी इम्यूनिटी पर फर्क पड़ता है। यह आईबीडी जैसी बीमारी को पैदा कर सकता है।

मरीजों को बताया जाएगा परहेज

पीजीआई का गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग आज आईबीडी के प्रति जागरुकता को लेकर शाम को पीजीआई में एक जागरुकता कार्यक्रम आयोजित करेगा। इसमें इस बीमारी से जुड़े मरीजों को भी बुलाया जाएगा। इसमें बीमारी के लक्षणों समेत इससे बचने के उपायों और इलाज संबंधी जानकारी दी जाएगी। इस बीमारी को लेकर पीजीआई द्वारा विशेष लैक्चर करवाए जाएंगे। इसमें इस बीमारी से जुड़े मरीजों को जागरुक किया जाएगा। बताया गया कि इस बीमारी में खान-पीन पर परहेज काफी जरुरी है।

उन्हें बीमारी और टेस्टों के बारे में बताया जाएगा। उन्हें विभिन्न प्रकार के उपचार और डाइट की महत्ता के बारे में जानकारी दी जाएगी। इस दौरान विभाग के प्रोफेसर एसके सिन्हा और डॉ. विशाल शर्मा भी विशेष रुप से मौजूद रहेंगे। प्रोफेसर सिन्हा जहां इस बीमारी की प्रकृति के बारे में बताएगें। वहीं डा. शर्मा इस बीमारी के इलाज तथा डा. दत्ता लाइफ स्टाइल और खान-पान के बारे में जानकारी देंगी।

आईबीडी कार्ड करेंगे जागरुक

पीजीआई के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग द्वारा बनाए गए आईबीडी कार्ड भी आज जारी किए जाएंगे। कोलाइटिस एंड क्रोहन फाउंडेशन के सहयोग से यह कार्ड जारी किए जाएंगे। यह कार्ड इस बीमारी से जुड़ी सारी जानकारी समेटे होंगे। इसमें बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवाइयों और शैक्षणिक जानकारी भी होगी। इसमें डाइट, अच्छी सेहत बरकरार रखते हुए इस बीमारी से बचने आदि की जानकारी होगी। AIIMS, दिल्ली समेत डीएमसी लुधियाना तथा SGPGI, लखनऊ के विशेषज्ञों की सलाह से यह कार्ड डिजाइन किया गया है। यह बीमारी और इसकी रोकथाम को लेकर जागरुकता का काम भी करेगा। यह कार्ड देश भर में क्लिनिक और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के पास उपलब्ध होगा। इसकी सहायता से बीमारी की जानकारी और इलाज आसान होगा।