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मातृ रूपेण संस्थिता:98 देशों में नि:संतान दंपतियाें के आंगन में बिहार के दत्तक गृह की बेटियों की किलकारियां गूंज रही

मुजफ्फरपुर2 महीने पहलेलेखक: धनंजय मिश्र
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फाइल फोटो। - Money Bhaskar
फाइल फोटो।

दुनिया भर के नि:संतान दंपती बेटे की अपेक्षा बेटियों काे गोद लेना अधिक पसंद कर रहे हैं। प्रत्येक वर्ष यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। राज्य बाल संरक्षण इकाई के अनुसार, वर्ष 2018 से अगस्त 2022 तक कुल 604 बच्चों काे दंपत्तियों ने गोद लिया। इसमें बेटों की संख्या महज 164 है। जबकि बेटियों की संख्या 440 है। जो गोद लिए बेटों की तुलना में करीब तीन गुना अधिक है। विभाग की ओर से किए गए फॉलोअप में बेटियों काे गोद लेने वाले दंपती काफी खुश बताए गए हैं।

मुजफ्फरपुर जिले में वर्ष 2016 से कुल 48 बच्चों काे गोद लिया गया। इसमें 32 बेटियां और 16 बेटे हैं। खबड़ा स्थित दत्तक ग्रहण संस्थान में कुल 88 बच्चे आए। इसमें 48 काे गोद लिया गया। 20 काे पुनर्वासित कर दिया गया। जबकि 6 साल से अधिक उम्र होने पर 7 बच्चों काे दूसरे गृह में भेज दिया गया। वर्तमान में 9 बच्चे यहां आवासित हैं।

छह वर्ष में मुजफ्फरपुर में 48 बच्चों को लिया गया गोद, इसमें 32 बेटियां

बेटियों पर ही भरोसा इसलिए क्योंकि बेटे साथ छोड़ रहे...

जिस पिता ने अंगुली थामकर चलना सिखाया,बोलना, पढ़ना-लिखना सिखाया। जब उन्हें सहारे की जरूरत हुई तो बेटे ने साथ छोड़ दिया। गोपालगंज के बड़कागांव से अपने बेटा-बहू से मिलने मुजफ्फरपुर आए बुजुर्ग पिता बंगाली प्रसाद सिंह के पहुंचते ही वह पत्नी के साथ घर में ताला बंद कर कहीं चला गया। घर के बाहर बूढ़े पिता घंटों इंतजार करते रहे, लेकिन बेटा-बहू नहीं आए।

अंत में भूख-प्यास से व्याकुल बुजुर्ग भटकते हुए स्टेशन पहुंचे अौर बेहोश होकर गिर गए। एक यात्री ने उन्हें खाना खिलाया और 200 रुपए देकर टिकट कटा कर सीवान जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया। बेटे के सताए बुजुर्ग ने फिर भी उनका नाम तक किसी को नहीं बताया। सिर्फ इतना बताया कि उनका बेटा जीरो माइल स्थित एक बैंक में पीओ के पद पर कार्यरत है। बताया कि बेटे की नौकरी के लिए अपनी जमीन तक बेच दिए। यह ताे एक बानगी है। इसलिए बेटियों पर भरोसा बढ़ता जा रहा है।

बदलते परिवेश में बेटियों पर ही अधिक भरोसा जताया जा सकता है। भारत समेत दुनिया भर में बेटियों के साथ ही माता-पिता अधिक सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ऐसे में बेटियां बुढ़ापे का सहारा बन रहीं हैं।

-रिंकू पांडेय, वरीय साइकोलॉजिस्ट

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