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कथा पर परिचर्चा:उन्मुक्त नारी के विमर्श की कहानी है मेरी भी सुनो डार्विन

पूर्णिया2 महीने पहले
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विचार गोष्ठी के दौरान उपस्थित साहित्यकार। - Money Bhaskar
विचार गोष्ठी के दौरान उपस्थित साहित्यकार।
  • शहर के साहित्यकारों ने मेरी भी सुनो डार्विन के लेखक के प्रयास की सराहना की

कथाकार दीर्घ नारायण की हालिया प्रकाशित कहानी मेरी भी सुनो डार्विन “(पाखी:मई-जून -2021), पर एक कथा विचार गोष्ठी का आयोजन रामबाग स्थित ग्रीन हाउस में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता आकाशवाणी पूर्णिया के पूर्व निदेशक विजय नंदन प्रसाद ने की। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ अभिनेता, रंग निर्देशक उमेश आदित्य ने किया। कहानी का पाठ वरिष्ठ कवि केके चौधरी ने किया। कार्यक्रम के संचालक उमेश आदित्य ने 1942 में यशपाल के प्रथम उपन्यास दादा कामरेड का जिक्र करते हुए कहा कि एस उपन्यास में भी एक स्त्री दो पुरुषों को चाहती है और हमबिस्तर होती है। वहीं प्रसिद्द मार्क्सवादी सिध्धान्तकार अलेक्सेंद्रो कोलोंतई ने अपनी पुस्तक ,थीसिस आन कम्युनिस्ट मोरालिटी इन द स्फीयर आफ मेरिटल रिलेशन में कहा था कि यौन क्रिया को शर्मनाक और पाप मय मानने के बजाय एक ऐसी चीज के रूप में देखा जाना चाहिए जो स्वस्थ जीव की भूख और प्यास जैसी दीगर जरूरतों की तरह ही स्वाभाविक है। अपने वक्तव्य में कथाकार कपिलदेव कल्याणी ने कहा कि कथाकार ने एक सामयिक विषय को अपनी रचना का विषय बनाया है। कथाकार गौरीशंकर पूर्वोत्तरी ने कथा पर अपनी टिप्पणी करते हुए लेखक को ऐसे बोल्ड विषय को सामने लाने के लिए बधाई दी। वरिष्ठ कवि, कथाकार चंद्रकांत रॉय ने कथाकार को अपनी कुछ भूलें सुधारने की ओर इशारा किया। कवि संजय सनातन ने प्रसिद्ध फ़्रांसिसी नारीवादी चिंतक सिमोन द बोउआर को रेखांकित करते हुए कहा कि औरत पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है। यह स्त्री विमर्श की कहानी है। पूर्णिया महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर डॉ.मोहम्मद कमाल ने कहा कि यह कथा उत्तर आधुनिक काल की उन्मुक्त नारी के विमर्श की रचना है। कवि रामनरेश भक्त ने कहानी के उन्मुक्त परिवेश पर सवाल खड़े किए। डॉ. केके चौधरी ने कहा कि आज के नारी सशक्तिकरण के दौर में भारतीय सभ्यता और संस्कारों की दुनिया में लौटना चाहती है।इस दौरान कवयित्री किरण झा, साक्षी द्विवेदी ने भी अपने विचार रखे। विजयनंदन प्रसाद ने कहा कि बेशक कथाकार ने एक अच्छी कहानी का तानाबाना बुना है। कहानी पर कवि गोपाल चन्द्र घोष मंगलम ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम में दिनकर दीवाना, सुमित प्रकाश, सुनील समदर्शी, रचनाकार कैलाश बिहारी, रणजीत तिवारी, ललन कुमार नीलम अग्रवाल, कुंदन कुमार, गोविन्द कुमार, प्रियंवद सहित कई रचनाकार मौजूद थे।

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