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कोरोना पर चौंकाने वाली रिसर्च:रिकवरी के 1 साल बाद भी हर 3 में से एक महिला को कोविड-19 निमोनिया का खतरा, फेफड़े के काम करने की क्षमता घटी

एक महीने पहले
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  • लैंसेट जर्नल में पब्लिश रिसर्च में दावा, 83 मरीजों पर हुआ अध्ययन
  • कहा- रिकवरी के बाद कोविड-19 निमोनिया के मामले महिलाओं में ज्यादा

कोरोना के ज्यादातर मामलों में सीधेतौर पर फेफड़ों पर असर हो रहा है, इसे कोविड-19 निमोनिया का नाम दिया गया है। ब्रिटिश वैज्ञानिकों का कहना है, ऐसा रिकवरी के बाद भी हो सकता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं। रिसर्च करने वाली ब्रिटेन की साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, रिकवरी के बाद हर 3 में से एक महिला को कोविड-19 निमोनिया हो सकता है। रिकवरी के 1 साल बाद भी कोरोनावायरस का असर फेफड़ों पर दिख सकता है। इसके मामले पुरुषों के मुकाबले में महिलाओं में अधिक दिखते हैं।

4 पॉइंट्स में समझिए रिसर्च

ब्लड में ऑक्सीजन पहुंचने की मात्रा घटी
लैंसेट रेस्पिरेट्री मेडिसिन जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, रिकवरी के सालभर बाद भी एक तिहाई मरीजों में कोविड निमोनिया के लक्षण दिखे। फेफड़ों के काम करने की क्षमता घटी। फेफड़ों के जरिए ब्लड में ऑक्सीजन पहुंचने की क्षमता कम हुई। सीटी स्कैन में स्पॉट दिखे। ऐसे लक्षण उनमें अधिक दिखे जिनमें कोविड-19 होने पर हालत अधिक नाजुक हुई थी।

5 फीसदी मरीजों को सांस लेने में दिक्कत
वैज्ञानिकों के मुताबिक, रिसर्च में शामिल मरीजों में से 5 फीसदी लोगों को अभी भी सांस लेने में परेशानी है। साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रो. मार्क जोंस का कहना है, कोविड-19 निमोनिया के मामले कोरोना से पूरी तरह रिकवर हो चुके लोगों में सामने आए हैं। कुछ लोगों में रिकवरी के चंद महीनों के बाद ऐसा हुआ है और कुछ में सालभर के बाद। सालभर के बाद भी कोविड-19 निमोनिया के मामले क्यों सामने आए, इस पर रिसर्च किए जाने की जरूरत
है।

चीन के साथ मिलकर की रिसर्च
साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी ने यह रिसर्च चीन के वुहान में एक टीम के साथ मिलकर की है। रिसर्च कोरोना से रिकवर हो चुके 83 ऐसे मरीजों पर हुई जो कोरोना की गंभीर स्थिति तक पहुंचे थे और रिकवर हुए थे। इनका हर 3, 6, 9 और 12वें महीने में फॉलोअप किया गया और ये परिणाम सामने आए।

सलाह- रिकवरी के बाद भी रूटीन चेकअप जरूरी
वैज्ञानिकों का कहना है, रिकवरी के बाद भी कोविड-19 निमोनिया की रूटीन जांच कराना जरूरी है। इससे भविष्य में मरीजों के इलाज की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही मरीजों के लिए एक्सरसाइज प्रोग्राम भी तैयार करना चाहिए ताकि कोरोना के असर के कारण फेफड़ों पर पड़ने वाले बुरे असर को कम किया जा सके।

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