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बेंगलुरू में चौंकाने वाला दुर्लभ मामला:जन्म के समय नवजात की न सांसें चलीं न धड़कन, कूलिंग थैरेपी से डॉक्टर्स ने बचाई जान; 11 मिनट बाद ले पाया पहली सांस

बेंगलुरूएक महीने पहले
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  • बेंगलुरू के रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल का मामला, 2 फीसदी बच्चों में दिखती है ऐसी दुर्लभ स्थिति

बेंगलुरू के रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां हाल में जन्मे एक नवजात में दुर्लभ बीमारी को मात दी है। जन्म के समय नवजात न तो सांस ले रहा था। न ही धड़कन चल रही थी और न ही रोया। जन्म के 11 मिनट तक शरीर में किसी तरह का मूवमेंट भी नहीं दिखा। डॉक्टर्स ने हार नहीं मानी और कूलिंग थैरेपी की मदद से नवजात की जान बचाने में सफल रहे।

हालत नाजुक थी
हॉस्पिटल के कंसल्टेंट डॉ. प्रदीप कुमार के मुताबिक, जन्म के तुरंत बाद होने वाली जांच (APGAR score) में पता चला नवजात की हालत बेहद नाजुक है। सबसे पहले रिससिटेशन तकनीक से 1 मिनट के अंदर उसका दिल धड़कना शुरू हुआ और धड़कन सामान्य हुई। लेकिन उसे पहली बार सांस लेने में 11 मिनट का वक्त लगा।

क्या है APGAR score
यह एक तरह की जांच है जो नवजात के जन्म के तुरंत बाद की जाती है। इस जांच की मदद से बच्चे का हार्ट रेट, मांसपेशियों की मजबूती समेत शरीर में स्थिति देखा जाता है। यह जांच दो बार की जाती है, जन्म के 1 मिनट बाद और 5 मिनट बाद।

इसलिए बनती है ऐसी स्थिति

डॉ. प्रदीप कुमार के मुताबिक, बच्चा एक दुर्लभ स्थिति से जूझ रहा था। ऐसे मामले मात्र 2 फीसदी बच्चों में सामने आते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे हायपॉक्सिक इस्केमिक एनसेफेलोपैथी स्टेज-2 कहते हैं। डॉक्टर्स की टीम ने थैराप्यूटिक हाइपोथर्मिया मेथड की मदद से नवजात का इलाज किया। इसे कूलिंग थैरेपी भी कहते हैं।

डॉ. प्रदीप कहते हैं, नवजात में ऐसी स्थिति प्रेग्नेंसी के दौरान मां में ब्लड सर्कुलेशन की कमी से बनती है। मां में ब्लड सर्कुलेशन की कमी का असर गर्भनाल के जरिए बच्चे पर पड़ता है और उसमें ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुषमा कल्याण का कहना है, नवजात को 72 घंटे तक ठंडे माहौल में रखा गया। इसके बाद अगले 12 घंटे तक तापमान धीरे-धीरे बढ़ाया गया। इस दौरान उसके शरीर की हर एक्टिविटी पर नजर रखी गई। एमआरआई जांच में स्थिति सामान्य मिलने के बाद बच्चे को डिस्चार्ज किया गया।

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