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ओला के ब्रांड बनने की कहानी:12 हजार करोड़ खर्च करके पहले कैब को लोगों की जरूरत बनाया, फिर शुरू हुई बंपर कमाई; अब ई-स्कूटर पर दांव

2 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी
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  • एक टैक्सी ड्राइवर के साथ झगड़े से निकला ओला कैब का आइडिया
  • ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और UK में भी चलती है भारत की ओला कैब

आपने कभी न कभी ओला कैब से सफर जरूर किया होगा। करीब 60% मार्केट शेयर के साथ ये भारत की सबसे बड़ी कैब एग्रीगेटर कंपनी है। 2010 में IIT बॉम्बे के दो इंजीनियर्स ने इसकी शुरुआत की थी। आज इस कंपनी की वैल्युएशन 330 करोड़ डॉलर, यानी करीब 24 हजार करोड़ रुपए है। 15 जुलाई को ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर की बुकिंग शुरू होने के बाद से ये ब्रांड चर्चा में है। आइए, ओला के 11 साल के सफर को शुरू से शुरू करते हैं...

टैक्सी ड्राइवर के झगड़े से निकला आइडिया

ओला के फाउंडर भाविश अग्रवाल हैं। उन्होंने 2008 में IIT बॉम्बे से बीटेक की पढ़ाई की। कॉलेज के बाद माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च में दो साल तक नौकरी की। इसके बाद उन्होंने एक ऑनलाइन वेबसाइट Olatrip.com शुरू की जो हॉलीडे पैकेज और वीकेंड ट्रिप प्लान करती थी।

एक दिन भाविश ने बेंगलुरु से बांदीपुर के लिए टैक्सी बुक की। रास्ते में टैक्सी ड्राइवर ने ज्यादा किराया देने की बात कही। भाविश ने इनकार किया तो ड्राइवर उन्हें बीच रास्ते छोड़कर चला गया। इस परेशानी से उन्हें एक आइडिया क्लिक किया।

उन्हें महसूस हुआ कि ऐसी समस्या का सामना करोड़ों लोग करते होंगे। भाविश ने अपनी ट्रैवल वेबसाइट को कैब सर्विस में बदलने का फैसला किया। उन्होंने IIT बॉम्बे के ही अंकित भाटी के साथ ये आइडिया शेयर किया। दोनों ने मिलकर 3 दिसंबर 2010 को ओला कैब्स लॉन्च कर दिया।

ओला का पहला ऑफिस एक 10*12 फीट का कमरा था। इसमें भाविश, अंकित और शुरुआती दिनों के साथी काम करते थे।
ओला का पहला ऑफिस एक 10*12 फीट का कमरा था। इसमें भाविश, अंकित और शुरुआती दिनों के साथी काम करते थे।

पेरेंट्स को नहीं, लेकिन इन्वेस्टर्स को पसंद आया आइडिया

शुरुआत में भाविश के पेरेंट्स उनके स्टार्टअप से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि IIT से पढ़ने के बाद 'ट्रैवल एजेंट' बनोगे, लेकिन इन्वेस्टर्स को ये आइडिया पसंद आया। ओला को पहले राउंड की फंडिंग स्नैपडील के फाउंडर कुनाल बहल, रेहान यार खान और अनुपम मित्तल से मिली।

इसके बाद फंडिंग का सिलसिला शुरू हो गया। ओला को अब तक 26 राउंड की फंडिंग में 48 इन्वेस्टर्स से 430 करोड़ डॉलर, यानी करीब 32 हजार करोड़ रुपए की फंडिंग मिल चुकी है। 9 जुलाई 2021 को एक प्राइवेट इक्विटी से 3,700 करोड़ की लेटेस्ट फंडिंग मिली है।

भाविश अग्रवाल का कहना है कि इन्वेस्टर्स तीन चीजें चाहते हैं। क्लियर विजन, सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल और एग्जिक्यूशन प्लान। जिस स्टार्टअप के पास ये चीजें हैं, उसे कभी फंड की कमी नहीं होगी।

ओला के पिछले 11 साल के सफर को फाउंडर भाविश तीन फेज में बांटते हैं...

फेज-1: ये 2011 से 2014 का स्ट्रगल वाला वक्त था। न ज्यादा लोग थे, न ज्यादा पैसे। भाविश खुद प्रचार करने जाते थे। कभी-कभी खुद ड्राइवर भी बन जाते थे।

फेज-2: 2014 से 2017 तक का स्केलिंग वाला वक्त था। कॉम्पिटीटर्स पैसे झोंक रहे थे। ओला ने भी इन्वेस्टर्स तलाशे और पैसे झोंकने शुरू कर दिए। इस फेज में सिर्फ बिजनेस का स्केल बढ़ाने पर जोर था।

फेज-3: ये 2017 के बाद शुरू हुआ कंसॉलिडेशन का वक्त था। इसमें ओला ने बेहतर ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर बनाया। कमाई और मुनाफे पर फोकस किया।

भाविश का मानना है कि भारत की नई जनरेशन कार खरीदना नहीं, उसे एक्सपीरिएंस करना चाहती है। वो इसी क्लियर विजन के साथ आगे बढ़े। उन्होंने शुरुआती 7 साल में इन्वेस्टर्स के पैसे सिर्फ बिजनेस का स्केल बढ़ाने पर खर्च किए। ज्यादा इन्सेंटिव देकर ड्राइवर्स बढ़ाए और छूट देकर कस्टमर बढ़ाए। एक बार जब ओला कैब लोगों की जरूरत में शामिल हो गई, तब उससे कमाई करने के बारे में सोचा।

ओला की अपनी कार नहीं, फिर पैसे कैसे कमाती है?

ओला सिर्फ कैब बुकिंग की सर्विस उपलब्ध कराती है। कंपनी के पास अपनी कोई कार नहीं है। ऐप के जरिए वो कस्टमर्स को कैब और ड्राइवर्स को कस्टमर से जोड़ती है। ऐप पर हुई सभी बुकिंग्स पर किराए का 15% कंपनी कमीशन लेती है।

ओला के सामने चुनौतियां कम नहीं

ओला सीधे तौर पर US की लीडिंग कंपनी ऊबर से मुकाबला करती है। ऊबर की वैल्युएशन 82 बिलियन डॉलर है जो ओला से 25 गुना ज्यादा है। इसके अलावा भारत में अन्य कॉम्पिटीटर्स में मेरू कैब, जूमकार और रैपिडो शामिल हैं। ओला ने अब तक कुल 6 अधिग्रहण किए हैं। उनमें टैक्सी फॉर श्योर, जियोटैग, क्वार्थ, फूडपांडा, रिडलर और पिकअप शामिल हैं।

कैब सर्विस को ग्लोबल बनाने और इलेक्ट्रिक व्हीकल पर फोकस

ओला ने भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और UK में अपनी कैब सर्विस शुरू की है। भाविश अग्रवाल का कहना है कि हमने भारत में एक सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल बना लिया है। अब हम इसे ग्लोबल स्तर पर लेकर जाना चाहते हैं।

कंपनी का दूसरा फोकस मोबिलिटी को इन्वायरनमेंट फ्रेंडली बनाने पर है। भाविश का कहना है कि भारत की ज्यादातर आबादी टू व्हीलर या थ्री व्हीलर वाहनों पर चलती है। अगर इसे इलेक्ट्रिक कर दिया जाए तो इसका बड़ा इम्पैक्ट दिखेगा। हम अगले कुछ साल में 10 लाख इलेक्ट्रिक व्हीकल रोड पर देखना चाहते हैं।

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