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  • It Was Only 6 Months After I Joined The Army That The War Of Kargil Broke Out, The Last Time Was Found At The Railway Station For Just A Few Moments.

कैप्टन विजयंत की कहानी उनके पिता की जुबानी:आखिरी बार चंद लम्हों के लिए विजयंत से स्टेशन पर मिला था; वे जहां शहीद हुए वह जगह मेरा तीर्थ, हर साल वहां जाता हूं

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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मैं आर्मी ऑफिसर रहा, मेरे पिता और दादा भी आर्मी में रहे। लेकिन मुझे पहचान मेरे बेटे से मिली, उसकी शहादत से मिली। आज कहीं भी जाता हूं तो मेरा परिचय बेटे के नाम और उसकी बहादुरी से कराया जाता है। एक पिता के लिए इससे बढ़कर और बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है? कर्नल वीएन थापर यह बताते हुए करगिल की यादों में खो जाते हैं। आज से 22 साल पहले करगिल की जंग में उनके बेटे कैप्टन विजयंत थापर ने शहादत दी थी। तब विजयंत महज 22 साल के थे।

बाई बोर्न सोल्जर थे विजयंत
विजयंत का जन्म 26 दिसंबर 1976 को पंजाब में हुआ। उनसे पहले उनकी तीन पीढ़ियां आर्मी में रही। परवरिश भी उसी माहौल में हुई। वे अपने दादा और पिता से जवानों की बहादुरी के किस्से सुनते थे। जंग की चर्चा करते थे। अक्सर अपने पिता की कैप पहनकर और बेंत लेकर एक फौजी की तरह मार्च करते रहते थे। वे बाई बोर्न और बाई च्वॉइस दोनों ही तरह से सोल्जर थे। उनके रगों में सैनिक का खून था और वे खुद भी सैनिक ही बनना चाहते थे। उन्होंने कोई और ऑप्शन रखा ही नहीं था।

साल 1998 में पहले ही अटेंप्ट में विजयंत ने CDS एग्जाम पास किया और आर्मी में उनका सिलेक्शन हो गया। 2- राजपुताना राइफल्स में वे कमीशन्ड हुए। अभी उन्हें पास आउट हुए महज 6 महीने ही हुए थे कि करगिल की जंग छिड़ गई। विजयंत मोर्चे पर तैनात हो गए।

अपनी मां और पिता कर्नल वीएन थापर के साथ कैप्टन विजयंत थापर और उनके भाई।
अपनी मां और पिता कर्नल वीएन थापर के साथ कैप्टन विजयंत थापर और उनके भाई।

कर्नल वीएन थापर कहते हैं कि तब मैं आगरा में पोस्टेड था। चूंकि फोन से बातचीत कम होती थी इसलिए मुझे इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि विजयंत करगिल की लड़ाई में शामिल हैं। मुझे अखबार में छपी उनकी एक तस्वीर से इस बात की जानकारी मिली कि वे जंग में शामिल हैं। चूंकि मैं फौजी हूं इसलिए जंग की बात मेरे लिए नई नहीं थी, लेकिन बेटा उसमें शामिल है इसको लेकर थोड़ी चिंता जरूर रहती थी।

करगिल की पहली सबसे बड़ी जीत के नायक थे विजयंत
कर्नल थापर बताते हैं कि करगिल की जंग में तोलोलिंग की लड़ाई सबसे अहम रही। उसकी चोटियों पर पाकिस्तान ने कब्जा जमा रखा था। दुश्मन हजारों फीट की ऊंचाई पर थे और हमारी फौज नीचे। वे पत्थर से भी वार करते तो हमें ज्यादा नुकसान पहुंचता। भारत के लिए हर हाल में उसे खाली कराना जरूरी था।

सबसे पहले 18 ग्रेनेडियर्स को इसकी कमान सौंपी गई। उन्होंने कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। उस जंग में हमारी फौज को काफी नुकसान उठाना पड़ा। दो दर्जन से ज्यादा जवान शहीद हो गए। कई जवान चोटिल हो गए।

साल 1998 में पहले ही अटेंप्ट में विजयंत ने CDS एग्जाम पास किया, 2- राजपुताना राइफल्स में वे कमीशन्ड हुए।
साल 1998 में पहले ही अटेंप्ट में विजयंत ने CDS एग्जाम पास किया, 2- राजपुताना राइफल्स में वे कमीशन्ड हुए।

इसके बाद तोलोलिंग जंग की जिम्मेदारी 2-राजपुताना राइफल्स को मिली। कैप्टन विजयंत उस टीम को लीड कर रहे थे। जून के दूसरे हफ्ते में विजयंत अपनी टीम को लेकर तोलोलिंग की लड़ाई के लिए निकल पड़े। 11-12 जून की रात उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर दुश्मनों पर धावा बोल दिया। पाकिस्तान के कई बंकर तबाह कर दिए। कई दुश्मन मार गिराए। कुछ हमारे भी जवान शहीद हुए। 13 जून को आखिरकार भारत ने तोलोलिंग पर तिरंगा फहरा दिया। यह भारत की पहली बड़ी और अहम जीत थी।

दुश्मन ऊंची चोटियों पर थे, वे आसानी से हमारी फौज के मूवमेंट को देख सकते थे
तोलोलिंग पर फतह हासिल करने के बाद विजयंत की टीम को नॉल एंड नोल हिल और थ्री पिम्पल्स से दुश्मनों को खदेड़ने का टास्क मिला। दुश्मन यहां कब्जा जमाए बैठे थे। चट्टानों की ओट में बने बंकर, दोनों ओर तीखे ढलान, हजारों फीट गहरी खाई और एकदम सीधी चढ़ाई। यह बेहद मुश्किल मिशन था।

जम्मू कश्मीर में रुखसाना के साथ कैप्टन विजयंत थापर। आतंकियों ने रुखसाना के माता-पिता की हत्या कर दी थी।
जम्मू कश्मीर में रुखसाना के साथ कैप्टन विजयंत थापर। आतंकियों ने रुखसाना के माता-पिता की हत्या कर दी थी।

तारीख 28 जून 1999, चांदनी रात होने की वजह से ऊंची पहाड़ियों पर तैनात दुश्मन उन्हें आसानी से देख सकते थे, अटैक कर सकते थे। विजयंत सिर पर कफन बांधकर अपनी प्लाटून के साथ मिशन पर निकले। दुश्मन लगातार अटैक कर रहे थे, इधर से भारतीय जवान भी मजबूती से उनका मुहंतोड़ जवाब देते हुए आगे बढ़ रहे थे।

शहादत से पहले जीत की बुनियाद रख गए थे
कर्नल वीएन थापर कहते हैं कि जब विजयंत अपनी टीम के साथ दुश्मन के मोर्चे के करीब पहुंच गए तो उनके कमांडेंट कर्नल रवींद्रनाथ ने 50 मीटर पीछे आने के लिए कहा, लेकिन विजयंत ने यह कहते हुए मना कर दिया कि अब दुश्मन को मारे बगैर एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे। वे आगे बढ़ गए, पाकिस्तान के कई बंकर तबाह कर दिए।

यह तस्वीर कैप्टन विजयंत थापर के अंतिम संस्कार की है। वे 29 जून को करगिल युद्ध में शहीद हुए थे।
यह तस्वीर कैप्टन विजयंत थापर के अंतिम संस्कार की है। वे 29 जून को करगिल युद्ध में शहीद हुए थे।

रात के करीब 2 बज रहे होंगे। विजयंत दुश्मन की पोस्ट से सिर्फ 15 मीटर की दूरी पर थे। कुछ देर के लिए दोनों तरफ से फायरिंग थमी, विजयंत को लगा कि दुश्मन पर अटैक करने का यह सबसे बेहतर मौका है। उन्होंने जैसे ही पोजिशन ली, दुश्मन की गोली उनके सिर को आर-पार कर गई। विजयंत शहीद हो गए, लेकिन आखिरी सांस लेने के पहले उन्होंने जीत की बुनियाद रख दी थी। अगले कुछ ही घंटों में भारतीय फौज ने वहां तिरंगा फहरा दिया।

कर्नल थापर के पास 29 जून को आर्मी हेडक्वॉर्टर से फोन आया और विजयंत की शहादत की खबर मिली। वे कहते हैं कि यकीनन एक पिता के रूप में मेरे लिए सबसे बड़ी क्षति थी, लेकिन एक फौजी के नाते इससे बड़ी उपलब्धि और कुछ हो भी नहीं सकती। जिस काम के लिए तरसते हुए हम फौजी रिटायर्ड हो जाते हैं उसे विजयंत ने महज 22 साल की उम्र में हासिल कर लिया। मुझे अपने बेटे की कुर्बानी पर गर्व है। मरणोपरांत विजयंत को वीर चक्र सम्मान मिला था।

15 अगस्त 1999 को विजयंत को मरणोपरांत वीर चक्र सम्मान मिला था। उनकी दादी को सम्मान भेंट करते तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन।
15 अगस्त 1999 को विजयंत को मरणोपरांत वीर चक्र सम्मान मिला था। उनकी दादी को सम्मान भेंट करते तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन।

बस चंद लम्हों के लिए आखिरी बार स्टेशन पर मिले थे
कर्नल वीएन थापर बताते हैं कि करगिल की जंग से कुछ दिन पहले हमारे पास विजयंत का फोन आया कि उसकी ट्रेन तुगलकाबाद स्टेशन से गुजरेगी। जब हम वहां मिलने पहुंचे तो वह ट्रेन आ चुकी थी। विजयंत ने हमें ढूंढा, लेकिन हम नहीं मिले। इसके बाद वे गाड़ी बुक करके हमारे नोएडा के घर के लिए रवाना हो गए। जब मैं घर पहुंचा तो पता चला कि वे यहां से लौटकर दादी से मिलने चले गए हैं। मैं दोबारा हांफता हुआ स्टेशन पहुंचा। हम उसके लिए एक केक लेकर गए थे। अभी उसने केक काटा ही था कि गाड़ी चलने लगी। ये हमारी उससे आखिरी मुलाकात थी। तब मैंने उसे एक कैमरा गिफ्ट किया था। उसकी शहादत के बाद जो तस्वीरें सामने आई वे सब उसी कैमरे में मिली थीं।

जहां विजयंत शहीद हुए, वह जगह मेरे लिए तीर्थ की तरह है

रिटायर्ड कर्नल थापर हर साल उस जगह पर जाते हैं जहां उनके बेटा शहीद हुआ था। विजयंत ने अपने आखिरी खत में पिता से यहां आने के लिए आग्रह किया था।
रिटायर्ड कर्नल थापर हर साल उस जगह पर जाते हैं जहां उनके बेटा शहीद हुआ था। विजयंत ने अपने आखिरी खत में पिता से यहां आने के लिए आग्रह किया था।

कर्नल थापर बताते हैं कि आखिरी जंग के लिए निकलने से पहले कैप्टन विजयंत ने परिवार के नाम एक खत लिखा था। यह खत उनकी शहादत के बाद उनके एक साथी के जरिए हमें मिला। विजयंत को इस बात का अंदेशा हो गया था कि शायद वे जंग से वापस नहीं लौटेंगे। इसलिए उन्होंने खत लिखकर अपने एक साथी को सौंप दिया था। उस खत में लिखा था...

डियर पापा, मम्मी, बर्डी और ग्रैनी

जब तक आप लोगों को मेरा यह खत मिलेगा, मैं दूर ऊपर आसमान से आप लोगों को देख रहा होऊंगा। मुझे कोई शिकायत, अफसोस नहीं है। और अगर मैं अगले जन्म में फिर से इंसान के रूप में ही पैदा होता हूं तो मैं भारतीय सेना में ही भर्ती होने जाऊंगा और अपने देश के लिए लडूंगा। अगर हो सके तो आप जरूर उस जगह को आकर देखना, जहां आपके कल के लिए भारतीय सेना लड़ रही है। जहां तक यूनिट की बात है नए लड़कों को इस शहादत के बारे में बताया जाना चाहिए।

मुझे उम्मीद है मेरा फोटो मेरे यूनिट के मंदिर में करनी माता के साथ रखा जाएगा। जो कुछ भी आपसे हो सके करना। अनाथालय में कुछ पैसे देना। कश्मीर में रुखसाना को हर महीने 50 रुपए भेजते रहना। और योगी बाबा से भी मिलना। बर्डी को मेरी तरफ से बेस्ट ऑफ लक। देश पर मर मिटने वाले इन लोगों का ये अहम बलिदान कभी मत भूलना। पापा आप को तो मुझ पर गर्व होना चाहिए। मम्मी आप मेरी दोस्त से मिलना, मैं उससे बहुत प्यार करता हूं। मामाजी मेरी गलतियों के लिए मुझे माफ कर देना। ठीक है फिर, अब समय आ गया है जब मैं अपने साथियों के पास जाऊं। बेस्ट ऑफ लक टू यू ऑल। लिव लाइफ, किंग साइज।

आज भी विजयंत के पिता हर साल उस जगह पर तिरंगा फहराने जाते हैं जहां उनके बेटे ने दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे, अपनी कुर्बानी दी थी। उनके लिए वह जगह एक तीर्थ की तरह है। वे अभी भी रुखसाना का खर्च उठाते हैं। जब विजयंत कुपवाड़ा में पोस्टेड थे तब रुखसाना उनसे मिली थी, जिसके मां बाप की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। कर्नल थापर ने अपने बेटे की लाइफ को लेकर द लाइफ ऑफ अ करगिल हीरो नाम से एक किताब भी लिखी है। इसमें विजयंत के जीवन से जुड़ी हर कहानी और किस्से शामिल हैं।

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