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भास्कर इंटरव्यू:अमेरिका की डेटा साइंटिस्ट ने कहा- कोरोना से सरकार समझौता करती दिख रही है, मिड फरवरी तक आएगा पीक

दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल
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भारत ओमिक्रॉन की तीसरी लहर के बीच है। हर दिन मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आपके दिमाग में इसे लेकर कई सवाल उठ रहे होंगे। मसलन इस कोरोना का पीक कब आएगा, वैक्सीन हमें सुरक्षित रखेगी या नहीं, ओमिक्रॉन आगे कितना खतरनाक हो सकता है? इन तमाम सवालों को लेकर भास्कर रिपोर्टर पूनम कौशल ने अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की डेटा साइंटिस्ट भ्रमर मुखर्जी से बात की।

पढ़िए ये खास बातचीत...

भारत में ओमिक्रॉन की लहर कब शुरू हुई थी, अभी हम किस स्थिति में हैं और आगे के लिए क्या संकेत हैं?
दिसंबर की शुरुआत में ही दक्षिण अफ्रीका में ओमिक्रॉन मिलने के बाद अमेरिका और यूरोप में संक्रमण का विस्फोट होने लगा था। पिछली लहरों के दौरान भी ये देखा है कि ये वायरस खामोशी से आता है और फिर तेजी से फैलता है।

इसे रोकने के लिए या प्रभावी रणनीति बनाने के लिए इसे हमें तब पकड़ना होता है जब ये खामोशी से आगे बढ़ रहा होता है। जब रोजाना 6-7 हजार मामले आ रहे थे तब भी हम ठोस कदम उठाने पर जोर दे रहे थे। तब बहुत से लोग ये कह रहे थे कि ये लहर भारत में नहीं आएगी, लेकिन ये लहर दिसंबर में ही भारत में आ चुकी थी।

ये वायरस घातक स्तर तक पहुंच रहा है, इसकी एक बड़ी वजह ये है कि इसे रोकने के कदम तब उठाए जा रहे हैं जब ये बहुत ज्यादा फैल गया है। कोविड के जवाब में भारत की नीतियां भी बहुत अलग-अलग रही हैं। हमने देखा कि सरकार ने 2020 में सख्त लॉकडाउन लगाया, लेकिन 2021 में कुछ नहीं किया। अब हम देख रहे हैं कि सरकार 2022 में एक तरह का हाइब्रिड कांप्रोमाइज कर रही है।

कोरोना की इस लहर का पीक कब आएगा?
भारत में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग पीक आएंगे। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता में मध्य से अंत जनवरी तक पीक आ सकता है। देशभर में पीक फरवरी के मध्य तक आएगा, लेकिन ये मेरा अनुमान भर है।

क्या वैक्सीन हमें वायरस से सुरक्षित रख पाएगी। जो उपलब्ध डेटा है वो क्या कहता है?
जब डेल्टा की लहर आई थी, पिछले साल अप्रैल में, तब भारत की 1 से 2 प्रतिशत आबादी को ही वैक्सीन मिली थी, लेकिन अब लगभग 60 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन मिल चुकी है। यानी, अब वायरस का सामना जो आबादी कर रही है वो पहली और दूसरी लहर के मुकाबले अलग है। कम से कम 90 फीसदी लोगों को एक टीका तो लग ही चुका है।

पिछले साल जून में किए गए सीरो सर्वे के मुताबिक देश की 70 फीसदी आबादी में एंटीबॉडी थे, यानी वो संक्रमण से गुजर चुकी थी। जब हम इन सब चीजों को साथ रखकर देखते हैं तो भारत की इम्यूनिटी चादर बिलकुल अलग दिखाई देती है। अब वायरस जिस आबादी पर हमला कर रहा है वो पहले के मुकाबले अधिक सुरक्षित है। वैक्सीन की वजह से लोग अस्पताल में भर्ती होने से बच रहे हैं और संक्रमण के गंभीर मामलों में भी मौतें कम हो रही हैं।

बहुत से विशेषज्ञ कह रहे हैं कि वायरस अब हल्का है और खतरा कम है, आपको क्या लगता है?
अब बहुत से लोगों को टीका लग चुका है। कम संख्या में लोग अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं। यदि हम इस नजरिए से देखें तो वायरस हल्का लग रहा है, लेकिन जब हम ये कहते हैं कि वायरस हल्का है तो इसका मतलब ये है कि ये कुछ लोगों के लिए तो हल्का हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है।

भारत में भी अस्पतालों में भर्ती होने वाले मामले बढ़ रहे हैं, क्योंकि अधिक संख्या में लोग संक्रमित हो रहे हैं और वैक्सीन भी सौ प्रतिशत प्रभावी नहीं है। ये सच है कि कुल संक्रमितों के मुकाबले में कम संख्या में लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ रही है।

इस लिहाज से देखा जाए तो वायरस हल्का है, लेकिन यदि इसी वायरस को अनियंत्रित तरीके से फैलने दिया जाए तो बीमार पड़ने वाले लोगों की संख्या इतनी बड़ी हो जाएगी कि हमारे अस्पताल भर जाएंगे। इससे हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा सकती है। हम अमेरिका में ऐसा ही होता देख रहे हैं।

वैज्ञानिक समुदाय इस लहर पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है? इस वायरस के बारे में वैज्ञानिक क्या चर्चा कर रहे हैं?
राय बंटी हुई है। एक वर्ग ऐसा है जो कह रहा है कि ये लहर बहुत खतरनाक है, सब बीमार पड़ने वाले हैं। हमें वायरस को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। वहीं, दूसरा वर्ग ऐसा है जो कह रहा है कि ये बहुत खतरनाक नहीं हैं, ओमिक्रॉन प्राकृतिक वैक्सीन है जो लोगों में एंटीबॉडी डेवलप करने जा रही है।

ये समूह मानता है कि ओमिक्रॉन पूरी दुनिया में फैलेगा और फिर ये वायरस खत्म हो जाएगा, लेकिन वैज्ञानिकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि महामारी ओमिक्रॉन के साथ खत्म नहीं होगी। वायरस का नया वैरिएंट सामने आ सकता है, क्योंकि ये नई-नई आबादियों तक पहुंच रहा है और हम ये नहीं जानते हैं कि जो नया वैरिएंट होगा वो हल्का होगा या अधिक खतरनाक होगा। हम ये जानते हैं कि अभी भी हमें वायरस के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है।

क्या लॉकडाउन ही वायरस को रोकने का उपाय है या बिना लॉकडाउन लगाए भी इसे रोका जा सकता है?
हम भले ही 2020 की तरह सख्त लॉकडाउन न लगाएं, लेकिन हमें एक समाज के तौर पर वायरस का सामना अधिक विश्वास के साथ सुरक्षित तरीके से करना होगा। दुनियाभर की सरकारों को बड़े पैमाने पर कदम उठाने होंगे। दुनिया की कम से कम सत्तर फीसदी आबादी को वैक्सीन देनी होगी।

जहां तक भारत का सवाल है, उन लोगों को जल्द से जल्द दूसरी डोज लगानी होगी जो इंतजार कर रहे हैं। जो वर्ग सर्वाधिक प्रभावित हो सकता है उसे बूस्टर डोज दिया जाना चाहिए। इसके अलावा सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि भीड़भाड़ न हो, खासकर इंडोर जगहों पर।

अमेरिका में अब ध्यान लॉकडाउन के बजाय सावधानी से खुले रहने पर दिया जा रहा है। सरकारों को इस बात पर जोर देना चाहिए कि कैसे सुरक्षित तरीके से चीजों को खुला रखा जाए। हमें खुले रहने की तरफ बढ़ना चाहिए ना की बंद रहने की तरफ।

जब संक्रमण कम हो तब चीजें खुली रखी जा सकती हैं। जब डेटा दिखाए कि संक्रमण बढ़ने वाला है तो अधिक सतर्कता और सावधानी बरती जाए। जो डेटा हमारे पास है वो बताता है कि वैक्सीन से लोग सुरक्षित हुए हैं। ऐसे में दुनियाभर की आबादी के टीकाकरण पर जोर दिया जाना चाहिए।

आपकी नजर में वायरस के खिलाफ लड़ाई में सबसे अहम कदम क्या है और सरकारों को क्या करना चाहिए?
वायरस के खिलाफ लड़ने में सबसे अहम भूमिका नेतृत्व की है। हमें विज्ञान और करुणा को साथ लेकर इस वायरस से लड़ना है। वायरस को लेकर राय बंटी हुई है। कुछ लोग लॉकडाउन भी चाहते हैं, लेकिन ऐसी आवाजें भी हैं जो चाहती हैं कि लोगों के जीवनयापन का भी ख्याल रखा जाए।

भारत में सेल्फ टेस्टिंग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सरकार को लोगों को टेस्ट करने के लिए किट मुहैया करानी चाहिए। जब लोगों को पता चलेगा कि वो संक्रमित हैं तो वो स्वयं ही अपने आपको दूसरों से दूर रखेंगे।

जब हम कहते हैं कि ओमिक्रॉन हल्का है, क्या इससे हम ये संकेत नहीं दे रहे हैं कि ये वायरस अपने आप खत्म हो जाएगा और हमें डरने की जरूरत नहीं है?
वायरस को भले ही हल्का माना जा रहा है, लेकिन इससे बचने के कदम तो उठाने ही होंगे। परिवार में यदि कोई एक व्यक्ति बीमार पड़ता है तो उसका ध्यान रखने के लिए बाकी लोग होते हैं, लेकिन अगर सभी बीमार पड़ जाएं तो ध्यान कौन रखेगा?

ओमिक्रॉन बहुत संक्रामक है। यदि परिवार का कोई एक सदस्य संक्रमित होता है तो बाकी परिजन के संक्रमित होने का खतरा अपने आप बढ़ जाता है। हम सभी एक समय संक्रमित होने का खतरा नहीं उठा सकते हैं।

यदि सभी स्वास्थ्यकर्मी, कर्मचारी, या घरों में काम करने वाले संक्रमित हो जाएं तो स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था बिखर जाएगी। स्वस्थ लोगों के संक्रमित होने पर अस्पताल में भर्ती होने की आशंका कम है।

जब हम भारत की बात करते हैं तो क्या आपको लगता है कि हमारे पास ओमिक्रॉन और कोविड लहर के बारे में सार्वजनिक तौर पर पर्याप्त जानकारी और डेटा उपलब्ध है?
भारत में हमारे पास जो डेटा है वो बहुत साधारण है। हमें मंत्रालय से रोजाना संक्रमण के मामलों, ठीक होने वाले लोगों और मौतों का डेटा मिलता है, लेकिन अभी हमें सर्वाधिक जरूरत अस्पताल में भर्ती होने वाले मामलों को ट्रैक करने की है। कुछ राज्य तो अस्पतालों में भर्ती होने का डेटा देते हैं, लेकिन सभी राज्य ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कोविड से संबंधित अस्पताल में भर्ती होने वालों का डेटा मुहैया नहीं है।

हमारे पास अस्पतालों से जुड़ा जो डेटा है भी वो बड़े शहरों का है। हमें नहीं पता कि महामारी ग्रामीण क्षेत्र में किस स्तर पर फैल रही है, क्योंकि हमारे पास ट्रैक करने के लिए पर्याप्त डेटा नहीं है। हमें लगता है कि मौतों की सही संख्या दर्ज नहीं की गई है।

मुझे लगता है कि जितना बेहतर और अधिक डेटा हमारे पास होगा, उतने ही सही निर्णय हम ले सकेंगे। जनता में भरोसा भी बढ़ सकेगा। उदाहरण के तौर पर इजराइल, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स ने ऐसा डेटा सिस्टम बनाया है जिससे वैक्सीन के प्रभावी होने ना होने का आंकलन किया जा सकता है। भारत को भी राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर डेटा सिस्टम बनाने की जरूरत है।

आपकी नजर में ओमिक्रॉन की इस लहर की प्रतिक्रिया में हम क्या गलती कर रहे हैं? आप भारत की प्रतिक्रिया का आंकलन कैसे करेंगी?
शुरुआत में ये असमंजस था कि ओमिक्रॉन हल्का है। वैज्ञानिक समुदाय और नीति निर्माताओं की तरफ से भी मिश्रित संदेश दिए जा रहे थे। स्पष्टता नहीं थी। बहुत से लोग कह रहे थे कि इससे हर्ड इम्यूनिटी बनेगी और महामारी खत्म हो जाएगी, लेकिन अब हमें पता चल गया है कि ऐसा नहीं होगा।

हमारे सामने जो डेटा है उससे पता चल रहा है कि ओमिक्रॉन महामारी को खत्म नहीं करेगा। हो सकता है हमें बूस्टर डोज लगाने पड़ें। हो सकता है आगे नया वैरिएंट आए और उसके लिए हमें नया रेस्पांस सिस्टम बनाना हो। हमें अस्पताल डेटा को ट्रैक करना होगा। उस डेटा के हिसाब से रेस्पांस सिस्टम डेवलप करना होगा। हमें ये निर्धारित करना होगा कि जब हमारे अस्पतालों में 50 फीसदी बिस्तर भर जाएंगे तो हम क्या करेंगे। जब सौ फीसदी भर जाएंगे तो हम क्या करेंगे। एक स्पष्ट योजना होनी चाहिए और जनता को इसके बारे में पता होना चाहिए। यदि हमें कुछ नहीं पता है तो वो भी जनता को पता होना चाहिए।

बच्चों पर वायरस का क्या असर हो सकता है, डेटा क्या कहता है?
ओमिक्रॉन की लहर में बच्चों को संक्रमण हो रहा है, लेकिन जहां तक मौतों से जुड़े डेटा का सवाल है, उन बच्चों में भी कम मौतें दिख रही हैं जिन्हें टीका नहीं लगा है। ये डेटा हौसला बढ़ाने वाला है। दूसरे देशों का डेटा बताता है कि बच्चों पर असर हल्का रहा है, लेकिन हमें हर तरह से खतरे को कम करना है और हर जान को बचाना है। ऐसे में हमें सावधानियां तो बरतनी ही होंगी।

पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, चुनाव आयोग ने फिलहाल कुछ दिनों के लिए राजनीतिक रैलियों को रोका है, आपकी क्या सलाह है?
ये साफ है कि जहां भीड़ होगी वहां संक्रमण का खतरा अधिक होगा। राजनीतिक दलों को वर्चुअल और डिजीटल कैंपेन पर जोर देना चाहिए। अमेरिका में कोविड की दूसरी लहर के बीच चुनाव हुआ था। लोगों को घर से मतदान करने का विकल्प दिया गया था। चुनाव लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं, लेकिन ये सोचा जाना चाहिए कि कैसे सुरक्षित तरीके निकाले जाए। वो राजनीति सबसे खराब राजनीति होगी जो महामारी को बढ़ावा दे।