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  • Even Though The Law Talks About The Property Rights Of Women, But In Real Life This Right Is The Same As The Human Settlement On Mars.

बात बराबरी की:कानून भले ही महिलाओं के प्रॉपर्टी हक की बात करता है, लेकिन असल जिंदगी में ये हक वैसा ही है, जैसे मंगल ग्रह पर इंसान का बसना

नई दिल्ली4 महीने पहले
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बीते दिनों पाकिस्तान से एक खबर आई। सैनिकों की मुठभेड़ या आतंक से इसका कोई वास्ता नहीं था, लिहाजा खबर बेहद मामूली होकर रह गई। इसमें जायदाद में हिस्सा मांगने वाली बहन को दो भाई बेरहमी से पीटते हैं। हथौड़े और हेलमेट से उसके शरीर पर बार-बार हमला होता है। घायल बहन अस्पताल में है और भाई पुलिस हिरासत में। देखा जाए तो इंसाफ हो चुका। बहन अस्पताल से लौटेगी और जेल से निकले भाई रिश्ते की दुहाई देकर सुलह कर लेंगे। तय होगा कि पर्व-मौकों पर वे बहन के घर फल-कपड़े लेकर जाएं। बदले में बहन को अपनी हक मांगने की बीमारी छोड़नी होगी।

‘गरीबों में भी सबसे गरीब औरत है!’ नब्बे के दशक में हुए 'इन्वेंशन' ने सालों तक किताबों की कैद काटी लेकिन अब ये सच काले नाग की तरह फन काढ़े बैठा है। खुद वर्ल्ड बैंक मानता है कि गरीबी भी लिंगभेद से परे नहीं। उसके मुताबिक, हर 100 लड़कों पर 105 लड़कियां बेहद गरीब हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, गरीबी की खाई चौड़ी होती जाती है। 25 से 34 साल की उम्र के महिला-पुरुष की तुलना करें तो हर 100 पुरुष पर 122 महिलाएं घोर गरीबी झेलने को मजबूर हैं। खासकर विवाहिता और मां बन चुकी औरतों के साथ गरीबी, उनकी साड़ी के पल्लू की तरह चली आती है।

बचपन में नानी कहा करती- ‘काम करोगे तो राज करोगे, जो ठलहा (खाली) बैठे तो फाका’। भोली उम्र में बड़ों की हर बात की तरह ये बात भी सच्ची लगती, लेकिन तब भी कई बातें खटकती थीं। जैसे, नाना सुबह से शाम तक बाजार-यार करते। नानी दिनरात घर के काम। वहीं पैसों के मामले में दोनों के हालात पूरब-पश्चिम बन जाते। नाना सुगंधित पान खाते। कपड़े उनके सफेद चांदनी। गले में सोने की एक जंजीर हरदम पड़ी दिखी। वहीं नानी मामूली साड़ी के लिए भी तीज-दिवाली की बाट जोहती। ननिहाल में हम बच्चों के आने पर छोटे-मोटे तोहफे देने के लिए भी वो नाना से चिरौरी करती।

वे नाना, जिसने जीवन के महज 35 साल ही काम को दिए, वे जन्म से चौबीसों घंटे काम करती मेरी नानी से ज्यादा रईस थे। यानी काम का औरत की अमीरी-गरीबी से कोई वास्ता नहीं। वे काम तो करती हैं लेकिन बगैर पैसों के। संयुक्त राष्ट्र की साल 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, रोज 90 फीसदी औरतें औसतन 352 मिनट वो काम करती हैं, जिसके उन्हें पैसे नहीं मिलते। वहीं पुरुष बिना पैसों के कामों को रोज 51 मिनट देते हैं, जैसे बाजार से फल-तरकारी लाना या फिर बच्चों को स्कूल छोड़ना।

पुरुषों के पास केवल 51 मिनट देकर चैन से रह पाने की गुंजाइश होती है क्योंकि बाकी सारे काम औरत ने ओढ़ रखे हैं। वो बच्चों की देखभाल करती है। घर संवारती है। खाना पकाती है। कपड़े धोती-इस्तरी करती है। अक्सर हाट-बाजार भी करती है। ये सब बगैर किसी शिकायत और बगैर किसी कीमत के। ये वो काम हैं, जिनके हो जाने की बदौलत पुरुष चैन से जी पाता है। इसके बाद भी प्रॉपर्टी की बात चले तो औरत के हाथ अक्सर खाली रहते हैं।

भले ही कानून लगातार महिलाओं के प्रॉपर्टी के अधिकार की बात करता रहे, लेकिन असल जिंदगी में फिलहाल ये हक वैसा ही है, जैसे मंगल पर इंसानी कॉलोनी बसना। मेरे नाना के हिस्से सारे खेत-खलिहान, बड़ा सा घर था। नाना के बाद ये मामाओं, और फिर उनके बेटों के पास जाएगा। नानी, मौसियां या घर की सारी बेटियों के हिस्से केवल भरोसा आएगा- तुम घर में जुते रहो, बदले में तुम्हें खाना, मौसमी कपड़े और गहने मिलेंगे। मेरा ननिहाल, देश की घरेलू झलक ही है।

इंडियन एग्रीकल्चरल सेंसस का डेटा बताता है कि भारत में लगभग 87.3% महिलाएं घर चलाने के लिए खेती-बाड़ी करती हैं, लेकिन जिस फसल के लिए वे हाड़गलाऊ मेहनत करती हैं, वह उनकी नहीं, बल्कि किसी पुरुष मालिक की होती है। फिर चाहे वो गांव का पंच हो या फिर अपना ही पति। केवल 10.34% औरतों के पास अपनी जमीन है। इस जमीन पर भी उनका हक कागजों तक सीमित है। वे मालकिन तो हैं लेकिन जमीन पर अपनी मर्जी की फसल नहीं उगा सकतीं। वो इसे किराए पर नहीं दे सकतीं और न कोई दुकान खोल सकती हैं। तिसपर गाहे-बगाहे लोग टोह लेते हैं कि मौत के बाद जमीन किसके हिस्से जाएगी। कुल मिलाकर होता ये है कि जमीनदार औरत के लिए अपनी ही दौलत दुखता दाढ़ बन जाती है, जिसे निकलवाना ही राहत देता है।

गौर करें तो पाएंगे कि दुनियाभर में जमीन के लिए सारी लड़ाइयां पुरुष ही करते आए। फिर चाहे वो घर का छोटा-सा टुकड़ा हो, या फिर देश की सरहदें। सिकंदर को इतिहास सबसे बहादुर योद्धा की तरह याद करता है। वहीं मिस्र की रानी क्लियोपैट्रा खूबसूरत लोभी औरत कहलाती रही।

सिलसिला चलता रहा। पाकिस्तान में जमीन में हिस्सा मांगने वाली बहन की पिटाई इसी सिलसिले की कड़ी है, लेकिन एक फर्क है। बहन ने हक लेने की हिम्मत दिखाई। औरतें हक मांग रही हैं, फिर चाहे वो पाकिस्तान हो या हिंदुस्तान। थोड़ी ही सही, लेकिन बराबरी के रास्ते पर जनाना पैरों की छाप गहरा रही है। और ठीक भी है। जब आबादी आधी-आधी है, तो हवा और जमीन का बंटवारा बेमेल क्यों हो!

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