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राफेल सौदे की फ्रांस में जांच शुरू:दसॉ ने भारतीय मध्यस्थ को दलाली दी; जब 2018 में विवादास्पद तथ्य सामने आए तो फ्रांस और भारत में जांच की मांग को दबा दिया गया: यॉन

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल
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राफेल सौदे से जुड़ा विवाद फिर से टेक ऑफ करने वाला है। भारत को 36 राफेल फाइटर प्लेन बेचे जाने के मामले में भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की न्यायिक जांच फ्रांस में शुरू हो चुकी है। 14 जून से शुरू हुई इस जांच की निगरानी स्वतंत्र जज कर रहे हैं।

आरोप ये है कि राफेल फाइटर प्लेन बनाने वाली कंपनी दसॉ एविएशन ने भारत से ये कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए किसी मध्यस्थ को रिश्वत के तौर पर मोटी रकम दी। फ्रांस ये पता लगा रहा है कि ये पैसा भारतीय अधिकारियों तक पहुंचा था या नहीं। आरोप तो ये भी हैं कि भारत सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस एविएशन को डील दिलाने के लिए दबाव बनाया। फ्रांस इसकी भी जांच कर रहा है।

ये गुप्त जांच फ्रांस में खोजी पत्रकारिता करने वाले मीडिया संस्थान ‘मीडियापार’ की राफेल डील पर की गईं अहम रिपोर्ट्स की वजह से शुरू हुई है। वहीं, फ्रांस के एक NGO ‘शेरपा’ ने भी भारत के साथ राफेल डील में हुए भ्रष्टाचार के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। फ्रांस और भारत के बीच 36 राफेल फाइटर प्लेन की डील हुई। इनमें से 24 विमान भारत आ चुके हैं। ऐसे में वहां चल रही जांच के नतीजे दोनों देशों में राजनीतिक भूचाल ला सकते हैं।

भास्कर ने ‘मीडियापार’ के लिए राफेल डील पर 6 रिपोर्ट्स करने वाले खोजी पत्रकार यॉन फिलिपीन और NGO ‘शेरपा’ की लिटिगेशन ऑफिसर शॉनेज मंसूस से बात की। इसमें हमने फ्रांस में चल रही गुप्त जांच की इनसाइड स्टोरी जानने की कोशिश की। हम इसे 2 हिस्सों में ला रहे हैं। पहले भाग में पत्रकार यॉन फिलिपीन से हुए 14 सवाल और उनके जवाबों को जस का तस पढ़ें...

सवाल: आपको राफेल डील पर शक कब हुआ, आपने अपनी जांच कब शुरू की?
जवाब:
हमने तीन साल पहले 2018 में भारतीय मीडिया में आई खबरों के बाद यहां फ्रांस में अपनी जांच शुरू की। उस समय राफेल सौदे को लेकर भारत में बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था। खासकर रिलायंस ग्रुप की दसॉ के साथ साझेदारी पर सवाल उठ रहे थे। हालांकि हमारी जांच शुरू करने से पहले ही यह सौदा विवादों में आ चुका था।

सवाल: आपका सूत्र कौन था, क्या आपको गुप्त सूचना मिली या दसॉ में कोई सूत्र था?
जवाब:
हम अपने सोर्स का नाम कभी नहीं लेते हैं और न ही उसके बारे में कोई खुलासा करते हैं। आपसे क्या, किसी से भी नहीं करूंगा।

सवाल: इस सौदे के किन तथ्यों को जानकर आपको सबसे ज्यादा ताज्जुब हुआ और फिर शक पुख्ता हो गया?
जवाब:
ये कहना मुश्किल है, क्योंकि इस सौदे में कई हैरान करने वाले तथ्य हैं। मैं सबसे ज्यादा घटनाक्रम के सिलसिले से हैरान हुआ। अगर आप 2007 से लेकर 2018 तक इस सौदे की पूरी कहानी पढ़ेंगे तो पाएंगे कि सौदेबाजी के इन सालों के दौरान संदिग्ध गतिविधियां होती रहीं। आप देखेंगे कि दसॉ ने भारतीय मध्यस्थ को दलाली दी। जब 2018 में इस सौदे को लेकर सबसे पहले संदेह पैदा हुआ और विवादास्पद तथ्य सामने आए तो फ्रांस और भारत, दोनों देशों में ही जांच की मांग को दबा दिया गया।

फ्रांस की सरकार ने भारत पर इस सौदे से एंटी करप्शन क्लॉज को हटाने के लिए भारी दबाव बनाया। इतना ही नहीं, और अधिक संदेह तब हुआ, जब ये तथ्य सामने आया कि मोदी सरकार ने दसॉ पर रिलायंस समूह के साथ साझेदारी करने के लिए दबाव बनाया, ताकि उसे फायदा पहुंचाया जा सके। भारत की सरकारी कंपनी HAL की जगह रिलायंस एविएशन को दसॉ पर थोप दिया गया। सौदेबाजी की अंतिम वार्ता के दौरान, दसॉ के मध्यस्थ ने भारतीय रक्षा मंत्रालय से गुप्त दस्तावेज हासिल किए। इनमें दसॉ और फ्रांस सरकार के साथ विमान के दामों को लेकर बातचीत कर रही टीम के बारे में जानकारी थी। हम कल्पना कर सकते हैं कि इतनी संवेदनशील जानकारी हासिल करने से फ्रांस और दसॉ को फायदा ही हुआ होगा।

सवाल: न्यायिक जांच में भ्रष्टाचार और राजनीतिक प्रभाव के आरोपों की भी जांच होगी, हम यहां किस तरह के भ्रष्टाचार और प्रभाव की बात कर रहे हैं?
जवाब:
इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है। पश्चिमी देशों की बड़ी कंपनियां कभी भी सीधे किसी देश के अधिकारियों को पैसा नहीं देती हैं। वो मध्यस्थों के जरिए पैसा पहुंचाती हैं। हमें आज ये पक्के तौर पर पता है कि दसॉ ने करोड़ों यूरो मध्यस्थों को विदेशी खातों के जरिए गुप्त दलाली के रूप में दिए। ये पैसा सिंगापुर और मॉरीशस के रास्ते बेहद संदेहास्पद कंपनियों के जरिए पहुंचाया गया।

अब जांच के दौरान ये पता चलेगा कि ये पैसा किसके पास गया। क्या ये पैसा मध्यस्थ ने अपने पास रखा या फिर भारतीय अधिकारियों को भी पहुंचाया। अगर भारतीय अधिकारियों को पहुंचाया तो कैसे पहुंचाया, कोर्ट के सामने इस पैसे का रूट पता करने की चुनौती होगी और मुझे लगता है कि ये पता करना मुश्किल होगा क्योंकि ये पैसा विदेशों में खोले गए कई अकाउंट और कंपनियों के बीच इधर-उधर होता रहा है।

सवाल: दसॉ ने करीब 70 कंपनियों के साथ समझौते किए हैं। आपको सिर्फ अनिल अंबानी की कंपनी के साथ किए गए समझौते पर ही शक क्यों हो रहा है?
जवाब:
हमने अपनी जांच के दौरान इसके कारणों का खुलासा किया है। भारत में तीन साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अंबानी की नजदीकी पर ही चर्चा हो रही थी।

भारत और फ्रांस के बीच जो 126 विमानों की खरीद का मूल समझौता हुआ, इसके टेंडर में लिखा था कि दसॉ का भारत में मुख्य पार्टनर HAL होगी। ये भारत की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी है। फिर अचानक प्रधानमंत्री मोदी ने ये घोषणा की कि भारत सिर्फ 36 विमान खरीदेगा और ये सभी फ्रांस में ही बनेंगे। जबकि पिछले समझौते के तहत अधिकतर विमानों को HAL को भारत में ही असेंबल करना था।

अचानक प्रधानमंत्री मोदी ने कह दिया कि टेंडर समाप्त कर दिया गया है। टेंडर का खत्म हो जाना बेहद महत्वपूर्ण तथ्य है, क्योंकि इससे दसॉ की HAL के साथ पार्टनर बने रहने की बाध्यता भी खत्म हो गई। HAL समझौते से बाहर हो गई और उसकी जगह अनिल अंबानी के रिलायंस समूह ने ले ली।

हमारे पास दसॉ और रिलायंस के बीच हुए गुप्त समझौते की कॉपी है। दस्तावेज के मुताबिक भारत में जो 16.9 करोड़ यूरो निवेश होने थे, उनमें से रिलायंस को सिर्फ 4% इन्वेस्टमेंट करना था। सिर्फ इतना निवेश करके ही रिलायंस 50% की हिस्सेदार बन गई।

समझौते में लिखा है कि जॉइंट वेंचर में रिलायंस का प्रमुख काम प्रोजेक्ट और सर्विसेज की भारत सरकार के सामने मार्केटिंग करना होगा। इससे साफ होता है कि इसका मकसद रिलायंस के प्रभाव का इस्तेमाल कर नया प्रोजेक्ट लेना था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने टेंडर को रद्द करने की घोषणा से सिर्फ दो हफ्ते पहले रिलायंस और दसॉ के बीच समझौता हुआ। नए नियमों के तहत दसॉ ने HAL को समझौते से बाहर किया और रिलायंस को ऑफशोर पार्टनर बना लिया। ये बेहद हैरान करने वाला तथ्य था और इसे छुपाया गया।

सवाल: आपने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रिलायंस समूह ने एक फिल्म कंपनी में भी पैसा लगाया, इस बारे में कुछ और बताएंगे?
जवाब:
ये जानकारी सबसे पहले भारतीय अखबारों ने ही प्रकाशित की थी। 2016 में अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होने से कुछ दिन पहले अनिल अंबानी की रिलायंस ने 16 लाख यूरो उस फिल्म को बनाने के लिए दिए, जिसे फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद की प्राइवेट पार्टनर और अभिनेत्री जूली गेये प्रोड्यूस कर रही थीं। जूली अब भी ओलांद के साथ ही हैं। बाद में रिलायंस समूह दसॉ का प्रमुख ऑफशोर पार्टनर बन गया। इससे भी शक पैदा होता है।

सवाल: आपको क्या लगता है कि इस जांच के केंद्र में कौन होगा? जज के सामने कौन-कौन पेश हो सकता है?
जवाब:
मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है। ये जांच पूरी तरह गुप्त है। हमें इस जांच के बारे में कुछ नहीं पता है। हमें बस ये पता है कि ये जांच शुरू हो गई है। सिर्फ जज ही जानते हैं कि वो किन लोगाें को अपने सामने बुलाएंगे।

सवाल: आपने अपनी रिपोर्ट में ये भी कहा है कि दसॉ का रिलायंस के साथ साझेदारी करने का कोई इरादा नहीं था, उस पर राजनीतिक दबाव था। इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब:
रिलायंस के पास एयरोस्पेस में कोई अनुभव नहीं है। रिलायंस साझेदारी में बड़ा पैसा भी नहीं लगा रही थी। 2018 में जब हमने ओलांद का इंटरव्यू किया था, तब उन्होंने कहा था कि अंबानी को फ्रांस और दसॉ पर भारत सरकार ने थोपा था। उनके शब्दों में कहें तो फ्रांस के पास पार्टनर चुनने को लेकर कोई विकल्प नहीं था। जो दस्तावेज सामने आए हैं, वो बताते हैं कि ओलांद ने जो कहा था वो सही था।

सवाल: इस पूरी जांच के दौरान क्या आपको कभी कोई धमकी मिली या किसी तरह का डर लगा?
जवाब:
नहीं, मुझे अभी तक कोई धमकी नहीं मिली है, न ही कभी डर लगा।

सवाल: आपके देश फ्रांस में इस जांच को लेकर किस तरह का माहौल है?
जवाब:
यहां फ्रांस में इस जांच को लेकर कोई खास माहौल नहीं है। यहां ये राजनीतिक मुद्दा नहीं है। सरकार ने इस पर कोई खास टिप्पणी नहीं की है। विपक्ष ने भी इसे मुद्दा नहीं बनाया है। हमें लगता है कि ये मुद्दा फ्रांस के नेताओं के लिए शायद बेहद संवेदनशील है और इसीलिए वो इस पर बात नहीं कर रहे।

सवाल: क्या आपने कभी भारतीय अधिकारियों या जांच एजेंसियों से संपर्क किया, और किया तो उनकी प्रतिक्रिया क्या रही?
जवाब:
हमने भारतीय रक्षा मंत्रालय और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सवालों की लंबी फहरिस्त भेजी थी। अपने सूत्रों से हमें पता चला कि इन पर मंत्रालय और ED में चर्चा भी हुई, लेकिन हमें कोई जवाब नहीं मिला। हमने भारत से जवाब हासिल करने की भरसक कोशिश की। भारतीय अधिकारियों ने बाद में मेरा फोन उठाना और मैसेज का जवाब देना ही बंद कर दिया।

सवाल: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस सौदे में भ्रष्टाचार के पर्याप्त सबूत नहीं हैं, क्या आपको भी यही लगता है?
जवाब:
नहीं, मुझे तो लगता है कि भारत में इस मामले में जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। फ्रांस के सामने जो सबूत रखे गए हैं, उनके आधार पर जांच शुरू हो गई है। ये वही तथ्य हैं जिन्हें भारत में भी रखा जा सकता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा था कि इस मामले में पर्याप्त सबूत नहीं हैं, तब से अब तक कई नए तथ्य सामने आ चुके हैं। ‘मीडियापार’ कई नए तथ्य पब्लिश कर चुका है।

हमें लगता है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के सामने जब सभी तथ्य रखे जाएंगे तो निर्णय अलग होगा। हैरत की बात ये है कि हमें जो दस्तावेज मिले हैं, उनमें से कई ED की केस फाइल से हैं। यानी जिन दस्तावेजों के आधार पर फ्रांस में मुकदमा शुरू हुआ है, वो भारत की जांच एजेंसियों के पास पहले से ही हैं। हमें लगता है कि भारत के प्रवर्तन निदेशालय ने इन दस्तावेजों की पूरी तरह से जांच नहीं की। इससे ऐसा लगता है कि ED की तरफ से कोर्ट में ये दस्तावेज पेश ही नहीं किए गए।

सवाल: क्या आपको लगता है कि इस विवाद में दो देशों की सरकारें शामिल हैं, ऐसे में इसका पूरा सच कभी सामने ही न आ पाए…
जवाब:
देखिए सच सामने आना हमेशा मुश्किल ही होता है। यहां हम एक बेहद संवेदनशील मामले पर बात कर रहे हैं। इसमें सैन्य कांट्रैक्ट है, जो क्लासीफाइड है। ये करीब आठ अरब यूरो की डील है। इस केस में कई शीर्ष अधिकारियों के नाम शामिल हैं।

इसमें भारत के प्रधानमंत्री, फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रों और पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का नाम सामने आया है। यहां से वहां तक के बड़े कारोबारी शामिल हैं। जब मामला इतना संवेदनशील हो, तब पूरा सच सामने लाने में समय लगता है, कई बार ये सामने ही नहीं आ पाता है।

सवाल: हमने कई दफा देखा है कि ऐसी खोजी रिपोर्ट्स करने वाले पत्रकारों पर मानहानि के मुकदमे हुए हैं। क्या आपके पास कोई नोटिस आया है, क्या आप कानूनी तौर पर तैयार हैं?
जवाब:
हम कानूनी तौर पर पूरी तरह से तैयार हैं, लेकिन अभी तक ‘मीडियापार’ के खिलाफ इस मामले को लेकर कोई शिकायत नहीं हुई है। न ही कोई कानूनी कार्रवाई की गई है। हमें मानहानि का कोई नोटिस भी नहीं मिला है।

कल पढ़ें: NGO ‘शेरपा’ की लिटिगेशन ऑफिसर शॉनेज मंसूस से खास बातचीत...