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अफगानिस्तान से भागी हजारा लड़की की कहानी:मैं तालिबान के राज में स्कूल तक नहीं जा पाई, पर ब्रिटेन पहुंचकर साइंटिस्ट बन गई; हजारा लोगों को बनाया जा रहा निशाना

2 महीने पहले
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"मेरा नाम हुमैरा रजाई है, मैं मूलरूप से अफगानिस्तान के गजनी प्रांत के जोगरी की रहने वाली हूं। मैं साल 2006 में तेरह साल की उम्र में ब्रिटेन आ गई थी। मैं अब एक मेडिकल साइंटिस्ट हूं और एक बड़ी फार्मा कंपनी में काम करती हूं। इसके अलावा मैं एक मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हूं और अफगानिस्तान के हालात पर नजर रखती हूं।

मैं तालिबान और अफगानिस्तान के हालात से जान बचाकर ब्रिटेन पहुंची थी। यहां मैं अब एक कामयाब इंसान हूं, लेकिन मुझे अफगानिस्तान में पीछे छूट गए अपने दोस्तों की फिक्र रहती है। मैं लगातार उनके संपर्क में रहती हूं।

अब जब एक बार फिर तालिबान का शासन आ गया है तो सबसे ज्यादा खतरे में हजारा समुदाय के ही लोग हैं, जिनका अफगानिस्तान में ऐतिहासिक रूप से शोषण होता रहा है।"

अफगानिस्तान के गजनी प्रांत के जोगरी इलाके में रहने के दौरान AK47 राइफल, उसकी मैगजीन और उसके कारतूस से खेलती हुमैरा रजाई।
अफगानिस्तान के गजनी प्रांत के जोगरी इलाके में रहने के दौरान AK47 राइफल, उसकी मैगजीन और उसके कारतूस से खेलती हुमैरा रजाई।

"मुझे अफगानिस्तान में बिताया बचपन आज भी याद है। मैं एक बच्ची थी, लेकिन उस बहुत कम उम्र में भी मुझे पता था कि मैं हजारा शिया समुदाय से हूं। हम हर समय तालिबान से डरे रहते थे। हम पश्तूनों से डरते थे। पश्तून और तालिबान को देखकर हम खौफ से कांपने लगते थे।

मैं भले ही एक छोटी बच्ची थी, लेकिन ये मेरे दिमाग में बैठ गया था कि हजारा लोगों के साथ भेदभाव होता है क्योंकि हम यही देखते और सुनते थे।

मेरा बचपन तालिबान शासन के दौरान गुजरा था। इसलिए मैं स्कूल नहीं जा पाई थी, क्योंकि तालिबान ने लड़कियों के सभी स्कूल बंद कर दिए थे। दस साल की उम्र तक मेरी कोई शिक्षा नहीं हुई थी। मैं तालिबान के शासन में पैदा हुई थी, मेरी तरह उस दौर की कई और लड़कियां भी स्कूल नहीं जा पाईं थीं।

वो 1998 का दौर था। मुझे धुंधली सी याद है। तालिबान ने सभी हाइवे बंद कर दिए थे। हम हजारा लोगों के गांव तक खाने-पीने का सामान भी नहीं पहुंच पा रहा था। उस साल बहुत से लोग भूख से मर गए थे। हम खाने-पीने के लिए तड़प रहे थे।"

अपनी बड़ी बहन के साथ अफगानिस्तान के अपने गांव में हुमैरा। इनके पिता तालिबान से अपने परिवार को बचाकर ब्रिटेन चले गए थे।
अपनी बड़ी बहन के साथ अफगानिस्तान के अपने गांव में हुमैरा। इनके पिता तालिबान से अपने परिवार को बचाकर ब्रिटेन चले गए थे।

"मेरे पिता 2000 के दशक में एक शरणार्थी के तौर पर ब्रिटेन पहुंचे थे। वो यहीं बस गए थे। छह साल बाद उन्होंने अपने परिवार को ब्रिटेन बुलाया था। मैं, मेरी बहनें और मेरी मां नई जिंदगी शुरू करने के लिए कानूनी तौर पर ब्रिटेन पहुंचे थे। हमारा सफर उन हजारों लोगों से बहुत आसान था जो बेहद मुश्किल हालात में यात्राएं करके अवैध तरीके से पश्चिमी देशों में दाखिल होते हैं।

मैं भाग्यशाली थी कि मैं कानूनी तरीके से वीजा हासिल करके ब्रिटेन पहुंची और यहां मुझे बेहतर जिंदगी मिली। मैं और मेरा परिवार तो अफगानिस्तान से निकल गए थे, लेकिन बहुत बड़ी आबादी वहां तालिबान का जुल्म झेलने के लिए मजबूर थी।

परोक्ष रूप से पूरा अफगानिस्तान तालिबान से प्रभावित है। तालिबान हिंसा के जरिए आबादी को नियंत्रित करते हैं। तालिबान के शासन में पुरुष अधिक हिंसक हो जाते हैं। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा भी बढ़ जाती है। महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती और इलाज न मिलने के चलते बहुत सी महिलाओं की जान चली जाती है। अफगानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान शिशु मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी।

मेरे जहन में तालिबान का खौफ ऐसा बैठ गया था कि मैं महिलाओं और बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थी। इसलिए मैं मेडिकल के फील्ड में आई और एक साइंटिस्ट बनी। अब मैं जो भी काम करती हूं उसका सीधा असर महिलाओं और बच्चों की जिंदगी पर पड़ता है।

मैंने अपनी पूरी शिक्षा ब्रिटेन में हासिल की है। जब मैं तेरह साल की उम्र में यहां पहुंची थी तब मुझे अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं आता था। मेरे लिए शुरुआती शिक्षा मुश्किल थी। बचपन में अपनी पढ़ाई पूरी न करने की वजह से मुझे शुरुआत में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन मैंने जल्द ही रफ्तार पकड़ ली और अब मेरे पास यूनिवर्सिटी की तीन डिग्रियां हैं। मेरे पास मेडिकल रिसर्च में PhD भी है। मैंने एक दवा पर काम किया है, जो महिलाओं को प्रीयोक्लैमसिया नाम की एक बीमारी से बचाती है।

शिक्षा ने मेरे पूरे जीवन को बदल दिया है। इसने मुझे उस क्षेत्र में काम दिया है जिसे लेकर मेरे भीतर दीवानगी है। मैं महिलाओं और बच्चों की जान बचाना चाहती थी और अभी मैं वही काम कर रही हूं। मैं ये काम सिर्फ इसलिए कर पा रही हूं क्योंकि मैं शिक्षा हासिल कर पाई, लेकिन अफगानिस्तान में मेरे जैसी दसियों लाख लड़कियों से शिक्षा हासिल करने का अधिकार छीना जा रहा है। वो समाज में अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही हैं।

मैं ब्रिटेन में हूं, लेकिन मुझे वो दौर याद करके आज भी डर लग रहा है। मैं सोच रही हूं कि अब हजारा समुदाय का क्या होगा। मैंने अफगानिस्तान में जिन लोगों से भी बात की है, उनका और उनके परिजनों का जीवन किसी न किसी तरह तालिबान के शासन से प्रभावित है। अधिकतर हजारा लोगों ने अपने आप को एक तरह से नजरबंद कर लिया है।

मैं एक मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हूं और मैं अफगानिस्तान में, खासकर काबुल में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहती हूं। तालिबान के निशाने पर यही लोग हैं। खासकर महिला अधिकार कार्यकर्ता। तालिबान इन लोगों का दमन करना चाहते हैं। मुझे जब मदद की गुहार लगाते इन लोगों के संदेश मिलते हैं तो मैं बेचैन हो जाती हूं। मैं सभी की मदद भी नहीं कर पा रही हूं।

मैं हजारा नस्लीय समूह से हूं और ये समूह हमेशा ही तालिबान के निशाने पर रहा है। यही नहीं, अफगानिस्तान में सरकारों ने भी इस समूह को हाशिए पर ही रखा है। तालिबान के उस दौर के शासन में मेरे कुछ दोस्त मारे गए थे। मेरे कई रिश्तेदारों और परिचितों के परिवार बुरी तरह प्रभावित हुए थे। मेरे अपने परिजन तालिबान की हिंसा की शिकार हुए हैं। इसके अलावा ऊर्जा और सपने से भरे कई हजारा नौजवान भी तालिबानी हिंसा का शिकार हुए हैं। वो अफगानिस्तान के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे, लेकिन उन्हें बेवक्त मार दिया गया।

तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने से पहले काबुल में जो कई बड़े हमले किए उनमें खासतौर पर हजारा छात्रों को निशाना बनाया गया। वो नहीं चाहते कि हजारा लोग पढ़ें और आगे बढ़ें।

बीते बीस सालों में अफगानिस्तान में बहुत कुछ बदल गया है। अफगानिस्तान में अधिकतर आबादी 25 साल से कम उम्र की है। इस आबादी ने तालिबान की हिंसा और प्रतिबंधों को नहीं देखा है। अफगानिस्तान की तमाम समस्याओं के बावजूद इस आबादी ने आजादी देखी है, बराबरी देखी है, खुली हवा में सांस ली है, लेकिन अब अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद इस आबादी के सपने बिखर गए हैं। इस युवा आबादी के लिए तालिबान के प्रतिबंधों में रहना मुश्किल होगा।

सबसे बड़ा खतरा अफगानिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को है। हमें आशंका है कि एक पूरा ब्लैकआउट होगा और अफगानिस्तान से जानकारी मिलनी मुश्किल हो जाएगी। अफगानिस्तान में एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसके लिए तालिबान और उसके शासन के तरीके को स्वीकार करना आसान नहीं होगा।

अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। उनका प्रोपेगैंडा शानदार है। वो अच्छा पब्लिक रिलेशन भी कर रहे हैं, लेकिन मुझे या मेरे जैसे लोगों को, जिन्होंने तालिबान के दौर को देखा और उनकी हिंसा को देखा है, उनके लिए तालिबान पर यकीन करना आसान नहीं है।

हमने देखा है कि वो कितने हिंसक और बर्बर हैं। वो मूलत: एक आतंकवादी समूह है। उनकी पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार और हिंसा पर आधारित है। वो दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी नेटवर्क है। उन्होंने अफगानिस्तान में सत्ता ताकत और हिंसा के दम पर हासिल की है। कोई कुछ भी कहे, मेरे लिए उन पर भरोसा करना आसान नहीं है। "

(भास्कर संवाददाता पूनम कौशल से बातचीत पर आधारित)

आइए अब तस्वीरों में देखते हैं कि अफगानिस्तान से भागने के बाद कैसे हुमैरा की जिंदगी पूरी तरह बदल गई

अफगानिस्तान से ब्रिटेन पहुंचने के बाद हुमैरा रजाई ने मेडिकल साइंस से BSc, स्टेम सेल्स एंड रिजनरेटिव मेडिसिन से MSc करने के बदा फार्मा में PhD की है।
अफगानिस्तान से ब्रिटेन पहुंचने के बाद हुमैरा रजाई ने मेडिकल साइंस से BSc, स्टेम सेल्स एंड रिजनरेटिव मेडिसिन से MSc करने के बदा फार्मा में PhD की है।
मेडिकल साइंस में PhD कर चुकी हुमैरा ट्रेनिंग के दौरान एक मॉडल के कानों की जांच करती नजर आ रही हैं। उनका कहना है कि तालिबान के राज में ऐसे जीवन की कल्पना भी मुश्किल है।
मेडिकल साइंस में PhD कर चुकी हुमैरा ट्रेनिंग के दौरान एक मॉडल के कानों की जांच करती नजर आ रही हैं। उनका कहना है कि तालिबान के राज में ऐसे जीवन की कल्पना भी मुश्किल है।
ब्रिटेन से फार्मा में PhD पूरी होने के बाद कन्वोकेशन में अपनी साथी स्टूडेंट के साथ डिग्री लेने पहुंचीं हुमैरा रजाई।
ब्रिटेन से फार्मा में PhD पूरी होने के बाद कन्वोकेशन में अपनी साथी स्टूडेंट के साथ डिग्री लेने पहुंचीं हुमैरा रजाई।
हुमैरा आज कई तरह के NGO के साथ मिलकर काम कर रही हैं। ऐसे ही एक प्रोजेक्ट के तहत वो दक्षिण अफ्रीका में गरीब बच्चों के लिए चलाए जा रहे एक स्कूल में पहुंचीं।
हुमैरा आज कई तरह के NGO के साथ मिलकर काम कर रही हैं। ऐसे ही एक प्रोजेक्ट के तहत वो दक्षिण अफ्रीका में गरीब बच्चों के लिए चलाए जा रहे एक स्कूल में पहुंचीं।
हुमैरा रजाई दुनिया के तकरीबन सभी प्रमुख देशों में जा चुकी हैं। इस तस्वीर में वो दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में बानपो रिवरसाइड पार्क में बने फ्लोटिंग लैंडमार्क कन्वेंशन सेंटर में नजर आ रही हैं।
हुमैरा रजाई दुनिया के तकरीबन सभी प्रमुख देशों में जा चुकी हैं। इस तस्वीर में वो दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में बानपो रिवरसाइड पार्क में बने फ्लोटिंग लैंडमार्क कन्वेंशन सेंटर में नजर आ रही हैं।
पश्चिमी यूरोप के देश नीदरलैंड्स की राजधानी एम्सटर्डम में मौजूद हुमैरा। वो आज दुनिया के कई देशों में लोगों की भलाई के कामों में जुटी हैं।
पश्चिमी यूरोप के देश नीदरलैंड्स की राजधानी एम्सटर्डम में मौजूद हुमैरा। वो आज दुनिया के कई देशों में लोगों की भलाई के कामों में जुटी हैं।
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