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भास्कर एक्सप्लेनर:कोरोना से ठीक हुए मरीजों को हार्ट-किडनी में प्रॉब्लम और दिमागी बीमारी तक हो रही; इनकी पहचान कैसे करें, बचने के लिए क्या करें

एक महीने पहलेलेखक: जयदेव सिंह
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एक बार हो जाए तो बहुत कुछ लेकर जाता है कोरोना। जो इससे ठीक हो गया, उसे ये दूसरी बीमारियां भी दे रहा है। कई बार इससे उबरने वाला हार्ट अटैक से जान गंवा देता है तो किसी को ब्लैक फंगस की वजह से अपनी आंखें तक गंवानी पड़ रही हैं। कई ऐसे लोग भी हैं, जो कोरोना से ठीक होने के बाद मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं।

आखिर कोरोना से रिकवर होने के बाद किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? इससे ठीक हुए मरीज किन नई बीमारियों के शिकार हो सकते हैं? इनके लक्षण क्या हैं? इनसे बचने के लिए क्या करना चाहिए? पोस्ट-कोविड केयर कब तक करनी चाहिए? और सबसे जरूरी -कोरोना से ठीक हुआ मरीज कब अपनी रुटीन लाइफ और जॉब पर लौट सकता है? आइये जानते हैं...

कोरोना से रिकवरी के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

कोरोना के बढ़ते मामलों के बावजूद देश में रिकवरी रेट काफी बेहतर है। यानी, कोरोना से संक्रमित होने वाले ज्यादातर लोग ठीक हो रहे हैं। हालांकि कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद भी मरीज के शरीर में SARS-COV-2 लंबे समय तक रहता है। कई बार तो करीब 12 हफ्ते तक ये वायरस शरीर में रहता है। कोरोना से जुड़ी नई स्टडी कहती है कि माइल्ड सिम्प्टम वाले कोरोना मरीजों में कुछ लॉन्ग टर्म कॉम्प्लिकेशन हो सकते हैं।

सवाल ये उठता है कि फिर कोरोना मरीज को कब माना जाएगा कि वो पूरी तरह ठीक हो गया है? इसे लेकर एक्सपर्ट्स कहते हैं कि एसिम्प्टोमैटिक या माइल्ड सिम्प्टोमैटिक मरीज 10 से 14 दिन बाद संक्रमण मुक्त माने जाते हैं।

अस्पताल में भर्ती मरीजों के रेकमेंडेशन में भी बदलाव हुआ है। पहले मरीज के डिस्चार्ज के पहले उसका RT-PCR टेस्ट होता था। रिपोर्ट निगेटिव आने पर ही उन्हें डिस्चार्ज किया जाता था, लेकिन अब हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार मरीजों के शरीर में गैर हानिकारक वायरस के कण रह जाने के कारण रिपोर्ट पॉजिटिव आती है। 14 दिन बाद वायरस एक मरीज से दूसरे में नहीं फैलता। इसलिए अब मरीज का ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल 95 या उससे ऊपर जाने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया जाता है।

कोरोना होने के बाद कौन से लॉन्ग टर्म कॉम्प्लिकेशन होते हैं?

हाल के समय में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें कोरोना से ठीक हुए मरीज को हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट हुआ। कई मामलों में तो ऐसे लोगों की जान तक चली गई। वहीं, कुछ मरीजों को कोरोना होने के बाद डायबिटीज की शिकायत हो गई। इसके अलावा SARS-COV-2 वायरस के कारण कई मरीजों की किडनी डैमेज होने के मामले भी सामने आए हैं। हालांकि ज्यादातर मरीजों के साथ ऐसा नहीं होता।

पोस्ट-कोविड सिंड्रोम क्या है और ये कोरोना के बाद होने वाले कॉम्प्लिकेशन से कितना अलग है?

कोरोना पर हुई स्टडीज में ये सामने आया है कि हर चार में से एक कोरोना मरीज पोस्ट कोविड सिंड्रोम से जूझता है। इस तरह के मरीजों को कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आने के चार हफ्ते बाद तक खांसी, कमजोरी, ब्रेन फॉग जैसी शिकायतें रहती हैं।

कुछ मरीजों में सेहत से जुड़े लॉन्ग टर्म कॉम्प्लिकेशन होते हैं। इस तरह के कॉम्प्लिकेशन से बचने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। आइए, इन कॉम्प्लिकेशंस और उनके लक्षण और बचाव के बारे में समझते हैं...

  • ऐसा देखा गया है कि कोरोना संक्रमण मरीज के पैंक्रियाज पर भी असर डालता है। ये शरीर के इंसुलिन लेवल को भी डिस्टर्ब कर देता है। जिन्हें पहले से डायबिटीज होता है उन मरीजों का शुगर लेवल कोरोना से रिकवर होने के बाद बढ़ सकता है। डायबिटीज के कुछ मरीजों को कोरोना के बाद ब्लैक फंगस का भी खतरा रहता है। सवाल ये है कि कोरोना से ठीक हुआ मरीज कैसे पहचाने कि उसे डायबिटीज हो गई है या उसका शुगर लेवल बढ़ गया है। अगर बार-बार प्यास लगे, अक्सर भूख का एहसास हो, धुंधला दिखाई देने लगे, स्किन पर कोई धब्बे दिखाई दें, हाथ-पैर सुन्न पड़ने लगें तो इसे नजरअंदाज नहीं करें। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और ग्लूकोज और ब्लड शुगर टेस्ट कराएं। हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर वीके भारद्वाज कहते हैं कि कुछ लोगों को हाइपरग्लाइसेमिया भी हो जाता है, इसे डॉक्टर फॉल्स शुगर भी कहते हैं। इस तरह के मरीजों के शुगर लेवल में काफी फ्लक्चुएशन देखने को मिलता है।
  • कोरोना के गंभीर मरीजों में कोरोना के बाद हार्ट अटैक आने, ब्लड क्लॉटिंग के भी मामले सामने आए हैं। डॉक्टर भारद्वाज कहते हैं कि कोरोना स्वस्थ आयु वर्ग के लोगों के हार्ट पर भी असर डालता है। इसकी वजह से चेस्ट पेन, पसीना आना, बहुत ज्यादा थकान और सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसा होने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
  • कोरोना होने के बाद कुछ मरीजों को मनोवैज्ञानिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा है। इसमें महिलाओं की संख्या ज्यादा है। ऐसे मरीज जिनका इलाज अस्पताल में होता है, वहां संक्रमितों की हालत और दूसरे मरीजों की मौत देखने वाले मरीज अक्सर तनाव में आ जाते हैं। डॉक्टर भारद्वाज कहते हैं कि कई लोगों को नींद नहीं आने, कुछ मरीजों को ज्यादा नींद आने, माइग्रेन, पेन किलर लेने के बाद भी दर्द नहीं जाना इसके लक्षण हैं। ऐसा होने पर मरीज को मनोवैज्ञानिक से सलाह लेनी चाहिए।
  • कोरोना के कुछ गंभीर मरीजों में किडनी डैमेज होने के मामले भी सामने आए हैं। हालांकि इनकी संख्या बहुत कम है। हाई लेवल प्रोटीन, एब्नॉर्मल ब्लड वर्क और ऑक्सीजन लेवल में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव की वजह से ऐसा हो सकता है। शुगर के मरीजों में इसकी आशंका ज्यादा होती है। टखने और पैर में सूजन होना, बहुत ज्यादा पेशाब आना, पेशाब के रंग में बदलाव होना, बहुत ज्यादा वजन कम होना, खराब पाचन, भूख कम लगना, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर बढ़ जाना किडनी में इन्फेक्शन होने के लक्षण हैं। कोविड होने के बाद अगर इस तरह के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं।

कोरोना होने के बाद लंग्स और हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

कोरोना होने के बाद कंट्रोल्ड डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज खासतौर पर रेस्पिरेटरी एक्सरसाइज करके फेफड़े और हार्ट को स्वस्थ रखा जा सकता है।

कोरोना ठीक होने के बाद मरीज की पोस्ट-कोविड केयर कब तक करनी चाहिए?

पोस्ट-कोविड केयर मरीज के लक्षण और कॉम्प्लिकेशन पर निर्भर करती है। अगर किसी मरीज में कोई पोस्ट-कोविड कॉम्प्लिकेशन और लक्षण नहीं हैं तो उसे पोस्ट-कोविड केयर की कोई खास जरूरत नहीं है। बस उसे हेल्दी लाइफस्टाइल फॉलो करनी होती है। अपने डाइट का ध्यान रखना है, एक्सरसाइज करना है और साथ ही धूम्रपान और शराब के सेवन से बचना है।

कोरोना से ठीक हुआ मरीज कब अपने काम पर लौट सकता है?

ऐसे मरीज जिनमें कोरोना का गंभीर लक्षण नहीं और जो होम आइसोलेशन में हैं, वो लक्षण आने के दस दिन बाद काम पर लौट सकते हैं। जो मरीज गंभीर रूप से संक्रमित हैं और जिन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करने की जरूरत पड़ती है, वो लक्षण आने के 20 दिन बाद काम पर लौट सकते हैं। AIIMS के मैन्युअल के मुताबिक जिन लोगों में संक्रमण के कोई लक्षण न हों, उनका होम आइसोलेशन वायरस के लिए जांच में पॉजिटिव आने के 10 दिन बाद खत्म हो सकता है।

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